
कृत्या प्रकाशन की पुस्तकें
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कविता का जगत न केवल व्यापक है बल्कि बहुतेरे अर्थों में बहुआयामी
भी है। इसके रसास्वादन से लेकर इसकी सामाजिक-सांस्कृतिक और
राजनीतिक उपस्थिति सीमित ही सही पर अपने होने को गाहे-बगाहे सिद्ध
करती रहती है। अपनी अलग-अलग भाषाओं, परिवेश और समयकाल से उपजे
विषयों और विषयांतरों को समेटे कविता अपने होने की भूमिका का अबोला
निर्वाह करती रहती है। ठीक वैसा ही प्रयास यह पत्रिका अपने तई अपने
स्तर पर पिछले कुछ वर्षों से करती आ रही है। यह मेरे लिए एक बड़ी
उपलब्धि की तरह है कि मैं इसका संपादन करूं। यह औपचारिक ही सही,
मगर यहां मैं रति सक्सेना जी को इसके लिए धन्यवाद देना चाहूंगा।
इन दिनों कविता का फ़लक हालांकि व्यापक हो गया है लेकिन उसका प्रभाव
नाममात्र ही है। इसे इसकी मात्र नियति की तरह न देखते हुए इसकी
उपस्थिति की तरह देखा जाना चाहिए। कम ही सही परन्तु इसका प्रभाव
कहीं न कहीं तो होता ही है। इसी कम प्रभाव में कविता अपना उजाला
प्रकट करती है।
राकेश श्रीमाल
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कह रहा था मैं कुछ
ठीक उसी तरह जैसे बांसुरी के इक छोर पर कहती है हवा
और जो देर तक गूंजता रहता है
मन की बावड़ी में
जिसकी सीढ़ी पर बैठे-बैठे
भीग जाती हैं आँखें
यह किसका रुदन है
अरुण देव
*
हम बचे रहेंगे
हमने ही बनाए वे रास्ते
जिनपर चलने से
डरते हैं हम
हमने ही किए वे सारे काम
जिन्हें करने से
अपने बच्चों को रोकते हैं हम
हमने किया वही आज तक
बिमलेश त्रिपाठी
*
यह देश बाजीगरों और जोगियों का
सच ही है यह मान्यता
हम वाकई है इन बाजीगरों
जोगियों के चेले
ये हमारे गुरु
गुरु घंटाल
तो पग-पग पर है करतब
चमत्कार
और उन्हें सामूहिक नमस्कार
हरि मृदुल
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दुर्गाप्रसाद गुप्त का कविता-संग्रह 'जहाँ धूप आकार लेती ह' एक
आश्चर्य की तरह हमारे सामने उपस्थित है। एक ऐसा सुखद आश्चर्य कि यह
विश्वास पुख़्ता होता है कि एक आलोचक/आचार्य के सीने में भी दिल नाम
की चीज बाक़ायदा होती है। इन कविताओं से कोई चाहे तो यह निश्कर्ष
प्राप्त करने में सहायता ले सकता है कि एक आलोचक जब कविता लिखेगा
तो वह कैसा दिखेगा? यथार्थ से निबटने का उसका तरीक़ा क्या होगा?
अपने अनुभवों, उनसे निकली वैचारिकता, इस वैचारिकता के बिम्बायन
इत्यादि-इत्यादि का उसका स्वरूप क्या होगा? यह तो तय है कि कविता
लिखते समय एक आलोचक अपने मूल आलोचकीय रूप से एक नितान्त भिन्न रूप
में प्रस्तुत होता है। बावजूद इसके कि कवि-कर्म भी अन्ततः एक
जीवनालोचन या यथार्थालोचन ही होता है, कविता लिखना आलोचना लिखने से
एकदम भिन्न कार्य है। दरअसल इन दोनों के प्रस्थान-बिन्दु ही
अलग-अलग हैं। यह सचमुच एक दिलचस्प खोज का विषय हो सकता है -शंभु गुप्त
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कुछ
शहरों को याद करते हुये
अब रातें अपना काम करेंगी
झरनों की तरह मेरे ऊपर गिरेंगी
और मुझे भटकायेंगी जैसे बतायेंगी
कि यह शहर तुम्हारे लिये नया है
कभी -कभी नीम या पीपल दिखेगा दिलासा देता
फिर गलियाँ धीरे-धीरे मुझे अपनायेंगी
कहीं कोई झील, घाटियाँ, पुल,
कोलाहल से भरे चैरस्ते और उदासी
झाड़ियाँ, मैदान, एक तरफ खिले हुये फूल
गिरती ओस और टूटती पत्तियाँ
हर शहर में एक स्त्री का स्थापत्य छिपा है
इधर इस साँवली सड़क का मैं क्या करूँ
जिसने मुझे बाँहों में भर लिया है
तारों की परछाइयाँ मुझ पर सुलगती गिर रही हैं
मेरे माथे पर उनके चुंबनों की बौछार है
कुमार अंबुज
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काश!
जानती मैं
तुम्हारी इस यात्रा से पहले मेरे स्वामी!
कि तुम आओगे-
तट की लाल मिट्टी से तुम्हारे लिए
रँग कर रखती वस्त्रों का एक जोड़ा!
ओ मेरे प्रिय,
बीत चुके हैं कितने दिन
तुम्हारे चले जाने के बाद
सोचती हूँ मैं ही चल कर खोजूँ तुम्हें
नहीं रह सकती और अकेली अब मैं!
कह देना प्रियतमा से
लालायित हूँ मिलने को मैं
सड़क किनारे घास पर टहलता हुआ हर रोज
जब तक धुंधलाकर शाम
स्याहं नहीं हो जाती शीत के झुलसे मैदान-सी।
कुदारा के मैदान में
होगिजोकु की
मुरझाई डालों पर
वसंत के आगमन की प्रतीक्षा में-
उगुइसु ने गीत गाया है क्या?
पीले गुलाब
फिर से खिलेंगे जल्दी ही,
खिले फूलों की परछाई दिखेगी
कामुनाबि झरने की धारा में
सुनाई देती है जहाँ मेढकों की सुरीली तान अभी।
'मान्योशु' जापानी कविता
अनुवाद रीतारानी पालीवाल
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