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अबोला निर्वाह

कविता का जगत न केवल व्यापक है बल्कि बहुतेरे अर्थों में बहुआयामी
भी है। इसके रसास्वादन से लेकर इसकी
सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक उपस्थिति सीमित ही सही पर
अपने होने को गाहे-बगाहे सिद्ध करती रहती है। अपनी अलग-अलग
भाषाओं, परिवेश और समयकाल से उपजे
विषयों और विषयांतरों को समेटे कविता अपने होने की भूमिका का अबोला
निर्वाह करती रहती है। ठीक वैसा ही
प्रयास यह पत्रिका अपने तई अपने स्तर पर पिछले कुछ वर्षों से करती
आ रही है। यह मेरे जैसे छोटे कवि के लिए
एक बड़ी उपलब्धि की तरह है कि मैं इसका संपादन करूं। यह
औपचारिक ही सही, मगर यहां मैं रति सक्सेना जी को इसके लिए
धन्यवाद देना चाहूंगा।
इन दिनों कविता का फ़लक हालांकि व्यापक हो गया है लेकिन उसका प्रभाव
नाममात्र ही है। इसे इसकी मात्र नियति
की तरह न देखते हुए इसकी उपस्थिति की तरह देखा जाना चाहिए। कम ही
सही परन्तु इसका प्रभाव कहीं न कहीं तो होता ही है। इसी कम
प्रभाव में कविता अपना उजाला प्रकट करती
है। उसी उजाले को बनाये रखने की कोशिश कृत्या के माध्यम से सतत की
जा रही है।
आगामी अंकों में कोशिश रहेगी कि कविता की नवोन्मेष पीढ़ी भी
वरिष्ठों के साथ-साथ पाठकों को उपलब्ध
हो सके। हिन्दी में कवितायें तो बहुत और बड़े स्तर पर लिखी जा रही
है लेकिन यह भी किसी से छिपा नहीं है कि
वे कविता की कद-काठी की तरह होती है, असल कविता नहीं। इस पर
बहस और विचार विमर्श आपके साथ सतत जारी रहेगा।
मराठी के वरिष्ठ कवि श्री नारायण सुर्वे को सादर नमन।
राकेश श्रीमाल
इस अंक के लिए मुखौटे के कलाकार हैं DEVILAL PATIDAR, आपकी
कला आपका परिचय दे रही है।
पत्र-संपादक
के नाम
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