दुर्गाप्रसाद गुप्त का कविता-संग्रह 'जहाँ धूप आकार लेती ह' एक आश्चर्य की तरह हमारे सामने उपस्थित है। एक ऐसा सुखद आश्चर्य कि यह विश्वास पुख़्ता होता है कि एक आलोचक/आचार्य के सीने में भी दिल नाम की चीज बाक़ायदा होती है। इन कविताओं से कोई चाहे तो यह निश्कर्ष प्राप्त करने में सहायता ले सकता है कि एक आलोचक जब कविता लिखेगा तो वह कैसा दिखेगा? यथार्थ से निबटने का उसका तरीक़ा क्या होगा? अपने अनुभवों, उनसे निकली वैचारिकता, इस वैचारिकता के बिम्बायन इत्यादि-इत्यादि का उसका स्वरूप क्या होगा? यह तो तय है कि कविता लिखते समय एक आलोचक अपने मूल आलोचकीय रूप से एक नितान्त भिन्न रूप में प्रस्तुत होता है। बावजूद इसके कि कवि-कर्म भी अन्ततः एक जीवनालोचन या यथार्थालोचन ही होता है, कविता लिखना आलोचना लिखने से एकदम भिन्न कार्य है। दरअसल इन दोनों के प्रस्थान-बिन्दु ही अलग-अलग हैं। यह सचमुच एक दिलचस्प खोज का विशय हो सकता है कि जब एक लेखक आलोचना में प्रवृत्त होता है तो उसकी प्राथमिकताएँ क्या होती हैं, वह बात को कहाँ से, कैसे शुरू करता है और जब वही व्यक्ति कविता लिखना शुरू करता है तो उसकी प्राथमिकताएँ क्या हो जाती हैं? क्या उसका रवैया इन दोनों ही मुकामों में एकदम भिन्न और विपरीत होता है या ये दोनों ही उसकी मूलभूत लेखकीय और मानवीय चिन्ताओं का -चाहे भिन्न शिल्प में ही सही- निरन्तरता में एक विस्तार है? क्या इन दोनों का ही कोई एक समान धरातल भी कोई होता है?

इस दृष्टि से जब हम दुर्गाप्रसाद गुप्त की इन कविताओं पर विचार करते हैं तो कई ऐसे भिन्न किन्तु आशस्तिदायक निश्कर्ष प्राप्त होते हैं कि यह लगता ही नहीं कि हम एक किसी आलोचक-जैसे 'अवांछनीय' व्यक्ति से रू-ब-रू हैं! हिन्दी में एक कवि को सात ख़ून माफ़ हैं, लेकिन आलोचक यदि थोड़ा भी टस से मस हुआ तो ऐसा हाहाकार मच जाता है कि जैसे वह किसी का चीर-हरण कर रहा हो। उसकी ‘हदें’ जैसे सुनिश्चित कर दी जाती हैं जिन्हें अन्तिम समय तक उसे निभाना पड़ता है। मूलभूत रूप से यह मान कर चला जाता है कि चूंकि यह एक आलोचक है अतः इसे एक असफल कवि होना ही चाहिए! चाहे उसकी कविताएँ कुछ अच्छे से अच्छे सफल कवियों से बेहतर ही क्यों न हों! यह एक मध्यकालीन रूढ़ि है जो आज तक हमारे यहाँ धड़ल्ले से चल रही है। इस रूढ़ि को तोड़ना बहुत ही मुश्किल है और कभी-कभी ही, लगभग अपवाद रूप में ही, यह टूट पाती है। बहरहाल। दुर्गाप्रसाद गुप्त की कविताओं में वह ताक़त है कि यह रूढ़ि टूट सके। वे हमें एक समर्थ और सरोकार-सम्पन्न कवि के रूप में तेजी से  आकर्षित करते हैं।

मेरा ख़याल है कि सरोकार-सम्पन्नता इन कविताओं का वह दुर्लभ गुण है जो इधर कहीं-कहीं ही पाया जाता है। इन दिनों अधिकांश कविताएँ लगभग ऐसी लिखी जा रही हैं जो या तो आत्मास्फालन की पर्याय हैं या आत्मानुभव का आख्यान हैं या किसी सत्ताभिमुखता-विशेष की सेवा में हैं। यह सचमुच ही एक हैरत की बात है कि कविता इस समय जीवित चली आ रही है! कविता से सरोकार या तो ग़ायब हैं या वे अन्यथाकृत हैं। सरोकारों के रूप में सनसनी-सी अक्सर यहाँ-वहाँ सुनाई दे जाती है। दुर्गाप्रसाद गुप्त के सरोकार किसी सनसनी के रूप में नहीं बल्कि एक अकुण्ठ और सरल-सहज बाल-सुलभता के साथ व्यंजित होते हैं। यह बाल-सुलभता इधर एक बहुत ही दुर्लभ स्थिति हो चली है। अपनी एक ‘बिना बचपन वाला चेहरा’ शीर्शक कविता में दुर्गाजी यह यों ही नहीं लिखते कि-‘‘जीवन के विस्तार तक दिखता बिना बचपन वाला चेहरा/ कैसा होगा?’’;जहाँ धूप आकार लेती है; पृ0-72। यहाँ हम नवें दशक की कविता को याद करें, जिसमें शिशुता को कवि का एक आवश्यक सहजात अभिलक्षण माना गया है। कुमार अंबुज से लेकर उनकी पीढ़ी का लगभग हर महत्वपूर्ण कवि अपने अन्दर बड़े शौक के साथ इस शिशुता को अपनी अमूल्य थाती समझ सीने से चिपकाए चलता है। बिना इस बचपने के कविता तो क्या ढंग से ज़िन्दगी भी नहीं जी जा सकती! यह बचपना ही है जो आदमी को कठिन से कठिन परिस्थिति में भी सहज और सरल बनाए रखता है। जब तक आदमी में यह है, सपना देखने की उसकी स्वाभाविकता बनी रहती है। यह दरअसल इधर की एक विरल अभिव्यक्ति ही तो है, जब दुर्गाजी कहते हैं कि-"धरती का सौन्दर्य मेरे लेखे मेरे सपनों का सौन्दर्य है/ जिसके बिखरने की पीड़ा में/ चाहता हूँ चीखना सपने में, कि/ ग़ायब हो जाती है आवाज़, और/ गूंगा हो जाता हूँ मैं अपनी सरलता में।";वही; पृ0-29।

कोई चाहे तो आरोप लगा सकता है कि आज के इस भीषण संक्रमित समय में लिखी गई इन कविताओं में व्यंग्य या विट लगभग नदारद है। एकाध कविताओं में यह हो तो हो, अन्यथा अधिकांशतः यथार्थ को एकदम सादा और लगभग सरलीकृत तरीके से कह दिया गया है। इस आरोप में दम हो सकता है क्योंकि अधिकांश कविताओं में जो एक प्रकार की सूक्तिपरकता और निर्षात्मकता-सी मिलती है, उसने इनकी टटकी रचनात्मकता को; जिसकी कि संभावना यहाँ- हो सकती थी, कुण्ठित करके रख दिया है। इन कविताओं का जो संक्शिप्तता का शिल्प है, वह भी संभवतः इसी कारण है। कविता जैसे अन्दर ही अन्दर घुट कर रह जाती है और कवि के साथ एक संक्शिप्त वार्तालाप-सा कर शान्त हो लेती है। यह संभवतः आलोचकीयता का असर है और थोड़ा-थोड़ा अध्यापकीयता का भी। इसे हालाँकि एक वैकल्पिक शिल्प के बतौर भी लिया जा सकता है लेकिन दरअसल यह कविता का नहीं, विमर्श का शिल्प है। इस अर्थ में ये कविताएँ ज़रूरी हो सकती हैं। एक तरह से देखा जाए तो यह वैमर्शिकता इन कविताओं की जान है और केन्द्रीय सत्व है। वैमर्शिकता में समय केन्द्र में होता है, जैसा कि इन कविताओं में हम देखते हैं।

समय के हिसाब से देखा जाए तो ये कविताएँ एक चिन्तातुर सहृदय बुद्धिजीवी का टुकड़ों-टुकड़ों में एक लम्बा विमर्श प्रतीत होती हैं। हाँ, यह अवश्य है कि ये सारे टुकड़े आगे चलकर एकान्वित और समेकित हो लेते हैं। यहाँ दरअसल हर टुकड़े में इतना दबाव और तीक्ष्णता है कि वह एक बड़ी चिन्ता का अनिवार्य हिस्सा लगता है। इसलिए ये कविताएँ कई बार समय-समय पर अपने समकाल पर किया गया एक क्रमिक चिन्तन लगती हैं। यहाँ समय के केन्द्र में एक व्यक्ति के रूप में स्वयं कवि है जो कि अत्यन्त ही स्वाभाविक है। यह व्यक्ति इस देश का एक सामान्य गृहस्थ है। एक सामान्य गृहस्थ इतना चिन्तातुर या चिन्तनशील हो सकता है, वह ज़माने के भेड़ियाधसान में, बहती गंगा में हाथ धोने में नहीं है बल्कि लोगों की इसी प्रवृत्ति से परेशान है; यह बड़ी बात है। वह जैसे सहमा-सकुचा-सा खड़ा ज़माने की चाल देखता है और अफ़सोस के साथ कह उठता है-"जब मौसम बदलने की संभावना नहीं दिखाई देती, तो/ मौसम के साथ हो जाते हैं लोग/ तब भला मौसम क्यों बदले";वही; पृ0-।

यहाँ कवि की चिन्ता जिस बात को लेकर है, वह यह है कि लोग मौसम के बदलने की संभावना का इन्तज़ार तो करते हैं। वे चाहते तो हैं कि मौसम बदले। लेकिन सब जानते हैं कि केवल चाहने से कुछ नहीं होता; कुछ चाहने के लिए कुछ करना भी होता है। पहल करनी होती है। हम कुछ करेंगे नहीं, कोई पहल नहीं करेंगे, कोई संघर्ष नहीं करेंगे और चाहते रहेंगे कि मौसम बदल जाए, तो ऐसा दरअसल कब होता है! अतः कवि परेशान इस बात से है कि इस भीषण समय से सब परेशान तो हैं लेकिन इसे बदलने की कोशिशें नगण्य हैं। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही है कि लोग आत्महत्या पर उतर आएँ! लेकिन आत्महत्या तो किसी मर्ज़ की दवा होती नहीं है, अतः ध्वनि निकलती है कि आत्महत्या भी तो करनी ही पड़ती है, वह भी तो अपने-आप नहीं हो जाती। अतः जब कुछ किए बिना काम नहीं चलना तो फिर आत्महत्या ही क्यों की जाए; कुछ पहल-जैसा क्यों न किया जाए ताकि मौसम कुछ बदले! कवि का मन्तव्य साफ़ है। उसका असल सरोकार है कि यह मौसम बदले! मौसम के साथ होना स्थितियों के समानुकूलन में होना है। कवि एक व्यक्ति के स्थितियों के समानुकूलन का विरोध करता है। और आज के सत्ताभिमुखता के ज़माने में यह कहना माने रखता है। और साफ़-साफ़!

इस तरह की साफ़गोइहाँ इन कविताओं में भरी पड़ी हैं। संक्शिप्तता के शिल्प की कुछ सीमाएँ मैंने ऊपर नोट की हैं तो यहाँ उसकी कुछ शक्तियों को भी नोट करना ज़रूरी है। जैसे यही कि यह शायद संक्षिप्तता की ही प्रक्रिया है कि कवि यहाँ अपने सरोकारों पर दृढ़ता से टिका हुआ है। कवि जैसे कविता लिखने के लिए कविता नहीं लिख रहा बल्कि कुछ अपनी बहुत मूल्यवान् बात कहने के मक़सद से कविता लिख रहा है। अपनी विचारधारा और अपने जीवनानुभव का एकीकृत निचोड़-जिसे हम ‘सरोकार’ कहते हैं-पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है। यह उत्कटता संक्षिप्तता के कारण ही है। विस्तार में कई बार बात इतनी फैल जाती है कि बात कहने-सुनने का मज़ा तो आता रहता है, लेकिन बात क्या है, यह समझ नहीं आता। और यदि समझ आ भी जाए तो ज़रूरी नहीं कि वह कोई सरोकार ही हो। क्योंकि बात के लिए बात बनाना हिन्दी कवियों में आजकल ख़ूब प्रचलित है। यह मुख्यधारा की एक लाइलाज़ बीमारी बन गई है। दुर्गाप्रसाद इससे मुक्त हैं, तभी अपने सरोकारों पर टिके हैं।

दरअसल इसी संक्षिप्तता के चलते दुर्गाप्रसाद कई बार ऐसी गंभीर और दूर तक मार करने वाली बात कह जाते हैं कि आश्चर्य होता है। जैसे कि उनकी एक कविता है-‘शांति’। यह कविता हिटलर पर लिखी गई है। हिटलर दुनिया का एक विशिश्ट चरित्र है। यह चरित्र जैसे भी ताक़त में आता हो लेकिन इसका अन्त अत्यन्त भयावह है। कवि यहाँ समकालीन हिन्दू फासीवाद पर स्पश्टतः केन्द्रित है। हिन्दू साम्प्रदायिकता पर और भी कई कविताएँ दुर्गाप्रसाद ने लिखी हैं। जैसे कि ‘केवल एक सत्य’, ‘कहाँ है हमारा देश’ आदि। लेकिन सीधे-सीधे इन्हें साम्प्रदायिकता-विरोध की कविताएँ कहना भारी पड़ेगा। साम्प्रदायिकता दरअसल इनसे ध्वनित या व्यंजित होती है। सम्प्रदायवाद-विरोध एक कवि के रूप में ही नहीं एक अध्यापक और बुद्धिजीवी के रूप में भी दुर्गाजी का एक बड़ा सरोकार है। इसके प्रमाण के तौर पर हम प्रसिद्ध इतिहासकार अर्जुनदेव के साथ इतिहास के भगवाकरण की बीजेपी और आरएसएस को कोशिशों पर तथा प्रसिद्ध पत्रकार और विचारक रामशरण जोशी के साथ आज की विभिन्न समस्याओं पर की गई उनकी लम्बी बातचीत ली जा सकती है। ये दोनों ही बातचीत बहुत लम्बी हैं और इनमें इस समय के लगभग सभी जलते-उबलते सवालों से जूझा गया है। इन साक्षात्कारों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता साक्षात्कारों-कर्ता की प्रश्नों को उठाने की वह खोजी और गहन आत्मीय प्रविधि है, जो हिन्दी में कभी-कभी और कहीं-कहीं ही मिलती है। उत्तर देने वालों ने जो और जिस तरह उत्तर दिये, वह एक अलग सन्दर्भ है, लेकिन सवाल जिस तरह यहाँ पूछे गए हैं, वह सबसे महत्वपूर्ण चीज है। इन प्रश्नों से दुर्गाजी के सरोकारों का अन्दाज़ा प्रामाणिकता के साथ लगाया जा सकता है। यदि मैं यह कहूँ कि प्रकारान्तर से ये ही प्रश्न इन कविताओं का भी सार-तत्व है तो शायद मैं ग़लत नहीं हूँ। साम्प्रदायिकता के अलावा एकधु्रवीय साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद, नवपूंजीवाद-बाज़ारवाद, बेहिसाब मध्यवर्गीय उपभोगवाद, सत्ता की जनविरोधी राजनीति, बदहाल ग्रामीण जीवन, मनुष्य की सृजनशीलता में बाधक चारों तरफ़ का वर्तमान माहौल लेकिन फिर भी अपनी उत्कट जिजीविषा और माहौल को अपने हिसाब से ढाल लेने की संघर्शशीलता में अप्रतिहत इस देश का आम आदमी; ये सब तथा इनके अलावा भी और बहुत सारी चीजें इन साक्षात्कारों में हैं। ;दृष्टव्य; दुर्गाप्रसाद गुप्त की 'सृजन का राग’ शीर्षक पुस्तक। इन साक्षात्कारों के प्रश्न ही जैसे कविता बनकर इस संग्रह में चारों तरफ़ छितरे पड़े हैं। और दरअसल ये प्रश्न नहीं, प्रश्नों के रूप में रचनाकार की चिन्ताएँ हैं जो लगातार उसे बेचैन किए हैं। हिन्दी-कविता में ऐसी बेचैनी अरसे बाद है। जैसा कि मैंने पहले कहा, ये प्रश्न थोड़े विदग्ध और लाक्शणिक शिल्प में भी हो सकते थे और कविताएँ थोड़ी और रचनात्मक हो सकती थीं लेकिन अब जो नहीं है, उसकी बात क्या की जाए, जो सामने है, उसकी बात हम करें। और जो सामने है, वह यह है कि वर्तमान और इतिहास की अनेकानेक घटनाओं की अन्तर्ध्वनियाँ इस कवि की पकड़ में गहरे हैं। जैसे यही कि इतिहास में यदि कोई हिटलर पैदा होता है तो उसकी नियति भी पहले से ही निश्चित है। वह या तो मारा जाता है या ख़ुद अपने को मार लेता है। उसके ख़ुद के अन्तर्विरोध उसे इस मुक़ाम पर ले आते हैं-‘‘उसकी आत्महत्या यह ध्वनित करती है/ कि शांति और स्वतंत्रता को नहीं है कोई ख़तरा, क्योंकि/ जब भी पैदा होता है इनसे कोई ख़तरा,/ तो हिटलर मार दिया जाता है, या फिर वह कर लेता है आत्महत्या!’’;जहाँ धूप आकार लेती है; पृ0-33।

साम्प्रदायिकता, सब जानते हैं कि अकेले नहीं आती। पिछली साम्प्रदायिकता हो सकता है, अकेले आती रही हो, केवल धर्म और सत्ताकांक्षा को साथ लेकर। लेकिन तब वह आसानी से पकड़ में भी आ जाती थी। अब उसने अपना हुलिया बहुत-कुछ बदल लिया है और अब वह बहुत छद्म तरीके से आ रही है। अब वह 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' के एकदम नए संस्करण में है। और इस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में क्या-क्या तो नहीं है! यह नवपूंजीवाद और नवसाम्राज्यवाद के साथ गलबाँही में है, इसका एक रूप आधुनिक बाजार भी है, नए उपभोक्तावाद के साथ इसकी अच्छी पटरी बैठती है, इसमें पुराना ब्राह्मणवाद भी कूट-कूटकर भरा है, यह इतना अनेकमुखी है कि इसे ख़ुद नहीं पता कि किस मुँह में क्या है? यह इतनी ज़ुबानों में बोलता है कि इसे ख़ुद नहीं पता कि इसने कब क्या कहा और क्यों कहा? हालाँकि पता इसे सब-कुछ रहता है, लेकिन यह एक अदा है कि देखो मैं कितना अनौखा हूँ! जो हो! काम की बात यह कि दुर्गाप्रसाद संक्षेप और संकेत में ही सही लेकिन इन सारी चीजों को एक-एककर बाक़ायदा छूते चले हैं।

बाज़ार, दुर्गाजी की इन कविताओं का सबसे केन्द्रीय कथ्य बनकर उभरता है। एक तरह से बात लौट-फिर कर बाज़ार पर आ टिकती है। कुछ कविताए तो सीधे-सीधे बाज़ार पर हैं। जैसे कि-'देश जो कि बाज़ार है', 'कविता का तर्क', 'बाज़ार', समाधान तो जनता ही तलाशती है ', 'महानगर: दो', 'दौर-ए-दौरा'  स्मृति-आख्यान’, आदि। कुछ कविताओं में बाज़ार प्रकारान्तर से आता है। जैसे कि -‘कहीं उम्मीद नहीं दिखती थी उन्हें’, ‘असुविधा’, ‘कुछ नहीं था उस बरस’, ‘घर का बज़ट’ आदि। इन दोनों ही तरह की कविताओं में बाजार जैसे मुंह फाड़े हमें लीलने को उत्सुक है। इन कविताओं में सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यहाँ कवि हिन्दी के आम चलन के अनुसार 'हाय बाज़ार-हाय बाज़ार’ करता हुआ रो-पीट नहीं रहा है, बल्कि उससे संघर्श के प्रति भी प्रतिश्रुत है। हिन्दी में अमूमन देखा यह गया है कि कवि ने बाज़ार पर एक धाँसूू-सी कविता लिखी, उसे किसी प्रतिष्ठित-सी पत्रिका में भेजा; जहाँ से कुछ रोकड़ा भी उपलब्ध हो और शाम होते ही चल दिए बाज़ार की रंगीनियों और चमक-दमक का मज़ा लेने! बाज़ार के खि़लाफ़ लिखने का चूंकि चलन है, अतः अपने खाते में इस पर दो-चार कविताएँ तो होनी ही चाहिए! कविता लिखी और ज़िम्मेदारी ख़त्म! कवि अपनी जगह और बाज़ार अपनी जगह सही-सलामत! अब बाज़ार की सेहत पर क्या फ़र्क पड़ना है, ऐसे कवियों और ऐसी कविताओं से? वह तो उल्टे ऐसे ही यथास्थितिवादी कवियों की फ़िराक में रहता है और बाक़ायदा इन्हें पुरस्कृत करता है। बाज़ार या उसे आगे बढ़ाने वाली एजेंसियाँ दरअसल उन लोगों से भय खाती हैं, जो उससे लड़ने का संकल्प लेते हैं। ऐसी कविताएँ उन्हें परेशान करती हैं जो तर्क करती हैं और तर्क से उसके अन्दरूनी खोखलेपन को तार-तार करने की कोशिश करती हैं। दुर्गाजी की ऐसी ही एक कविता है-‘कविता का तर्क’। इस छोटी-सी कविता में कवि ने आज से कुछ समय पहले का हमारे यहाँ के बुद्धिजीवियों का ख़ाका-सा खींचा है। हमारे यहाँ जब बाज़ारवादी बदलाव शुरू हुए थे, तब लोगों की कैसी स्थिति थी, यह लगभग यहाँ तार-तार कर दिया गया है। उस समय कुछ लोगों को इन बदलावों पर भरोसा नहीं हो रहा था, इसलिए वे भौंचक थे, कुछ लोग सब-कुछ से एकदम तटस्थ थे, कुछ लोग जो हो रहा था, उस पर नज़रें गड़ाए थे और मंथन कर रहे थे कि यह सब क्या हो रहा है, कुछ लोग इन्तज़ार कर रहे थे कि दुनिया बदले तो हम भी तुरत-फुरत उसके साथ बदल लें, कुछ लोग अनिश्चय में थे कि बदलें कि न बदलें, कुछ यह तय करने में मुब्तिला थे कि बदलें तो ज़रूर लेकिन कितना बदलें? तात्पर्य यह कि हर तरफ़ हलचल थी। लेकिन इस पूरी हलचल में कोई यह नहीं सोच रहा था कि इस बाज़ार का प्रतिरोध भी किया जा सकता है! निश्चय ही ये सारे के सारे लोग मध्यवर्गीय तबकों के लोग रहे होंगे। कवि जैसे तत्कालीन मध्यवर्ग पर भी इस कविता में केन्द्रित है। आज बाज़ार का जो इतना प्रसार हो गया है कि वह हमारे शयनगृहों तक पहुँच गया है तो यह सब एक दिन में नहीं हो गया और चुपचाप या हमारे अनजाने में भी नहीं हुआ। हमने बाक़ायदा उसका स्वागत किया है। कवि इसी बिन्दु पर ख़ुद को केन्द्रित करता है कि उस समय आखिर किसी के दिमाग़ में यह क्यों नहीं आया कि-‘‘कविता की भी एक दुनिया होती है,/ जहाँ वह अपनी और मनुष्य की लड़ाई बाज़ार से लड़ती है।’’ ;वही; पृ0-46।

कविता कोई हथियार नहीं है, यह सब जानते हैं। लड़ाई का उसका तरीक़ा भिन्न है और उसकी भी एक सीमा है। लेकिन जो लोग उसकी इस सामथ्र्य को जानते थे, उन्हें भी उस समय शायद इस पर भरोसा नहीं था। कवि कविता की इसी ताक़त की याद हमें दिलाता है। और हम जानते हैं कि कविता की यह ताक़त दरअसल हमारी वैचारिक सामूहिक सामाजिक ताक़त है। बाज़ार ने सबसे बड़ा करिश्मा यह कर दिखाया है कि मनुश्य और उसकी संवेदनाओं का वस्तुकरण कर डाला है। कविता के पास सबसे बड़ी पूंजी यही तो होती है-मनुष्य और उसकी संवेदना। मनुश्य और मनुश्य के बीच के पारिवारिक-सामाजिक सम्बन्ध। हमला इसी पर हुआ। इसमें सबसे ज़्यादा योग दिया हमारे मीडिया ने। दुर्गाजी ने रामशरण जोशी से पूछा-‘‘अगर हम सरकारी नीतियों को छोड़ें, मीडिया ने भ्रम को यथार्थ के रूप में और फिर उसे मिथ में बदल दिया। इसे आप क्या कहेंगे? फिर मीडिया ग्रामीण नागरिक समाज की अवधारणा को कैसे विकसित करने देगा? क्योंकि वह तो बाज़ार नागरिकता और बाज़ार-राष्ट्र निर्मित करने की प्रक्रिया में मनुष्य और उसकी संवेदनाओं के वस्तुकरण करने की प्रक्रिया में लगा हुआ है?’’;सृजन का राग; पृ0-175। मीडिया तो ख़ैर पूंजीवाद की गिरफ़्त में रहता आया है लेकिन क्या इधर के कवि और कविता भी पूंजी की गिरफ्त में आ गईं? दुर्गाजी एक नामालूम-सी स्थिति में से कितना बड़ा कथ्य निकाल कर प्रस्तुत कर देते हैं, देखकर आश्चर्य होता है। यह शायद संक्शिप्तता के शिल्प का ही करिश्मा है। दुर्गाजी की एक कविता ‘इतना तो लोग जानते ही हैं’ के मार्फ़त कवियों और कविता से यह पूछने का मन करता है कि क्या हिन्दी के आचार्यों की तरह उनका भी ‘आचरण’ की बज़ाय ‘शक्ति’ में विश्वास पैदा हो गया था, उस समय?-‘‘ऐसे लोग किसी का आदर्श नहीं बन सकते/ आदर्श बनने के लिए नैतिक आचरण देखते हैं लोग/ अनैतिक आचरण से उपजी शक्ति नहीं, और/ आचार्य हैं कि आचरण में नहीं, शक्ति में विश्वास करते हैं।’’;जहाँ धूप आकार लेती है; पृ0-60।

बाज़ार से लड़ना हॅंसी-खेल नहीं। बाज़ार आज जो तानाशाह हुआ है तो उसके पीछे हमारे लाभ और लोभ के नए कथित जीवन-मूल्यों का खाद-पानी रहा है-"जब लाभ और लोभ ही जीवन मूल्य बन जाएँ, तब/ पूरी सभ्यता को एक बाज़ार बन जाने से-/ कोई रोक नहीं सकता।";वही; पृ0-53। नए बाज़ार का दुश्चक्र भयावह है। लाभ और लोभ के ज़रिये पहले यह हमें हमारी अपनी ही इच्छा और सहमति से, जैसे हमारे आत्मसम्मान और स्वाभिमान को पूरा-पूरा स्पेस दे रहा हो, अपनी तरफ़ खींचता है, या यों कहें कि हम इसकी तरफ़ खिंचते चले जाते हैं और जब हम धीरे-धीरे इसकी पूरी तरह गिरफ़्त में आ जाते हैं तब यह अपने असल रूप में पहचान में आता है लेकिन तब तक हम इसके इतने कायल हो चुके होते हैं कि यह हमें अपनी उंगलियों पर नचाने लगता है, तब हमारे हाथ में कुछ नहीं रहता; हम एक पराजित योद्धा की तरह इसके रहमोकरम पर हो आते हैं-"लेकिन/ यह एक हैरतअंगेज़ बात है, जिसमें/ बाज़ार की जीत होती है, और/ आपकी हार!";वही।

दुर्गाप्रसाद गुप्त ज़िद के साथ बाज़ार के प्रतिरोध में खड़े हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि इस देश की बहुसंख्यक आम जनता बाज़ार के इस मायाजाल का ज़ल्दी ही कोई न कोई तोड़ निकालेगी-‘‘पर वह नहीं जानता कि-/ समाधान तो ख़बरों के माध्यम से जनता ही तलाशती है।’’;वही; पृ0-57।

आखि़र यह जनता क्या है और उसके पास ऐसा क्या है, जिससे बाज़ार भय खा सकता है? दुर्गाप्रसाद गुप्त के लिए जनता का अर्थ है, सामाजिकता, सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्ध, इन सम्बन्धों की ऊर्जा, जो अभी भी बहुत-कुछ जीवित है, जो आसानी से मरती नहीं है। यह ऊर्जा हमारे लोभ और लाभ का एकमात्र विकल्प है। जिस दिन यह विकल्प पुनरुज्जीवित होगा, बाज़ार सिमटने लगेगा, क्योंकि यह टिका ही हमारे लोभ और लाभ की बैसाखियों पर है। रामशरण जोशी से इण्टरव्यू करते हुए एक जगह उन्होंने पूछा-‘‘यदि संस्कृतियाँ आपस में स्वस्थ आदान-प्रदान करें तो कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन परजीवी संस्कृति और मूल्य हमारे वास्तविक संस्कृति और समाज के मूल्य तो बन नहीं पाते, उल्टे हम विभाजित मनःस्थिति के शिकार हो जाते हैं। फिर तीसरी दुनिया के बारे में पश्चिम द्वारा तरह-तरह के मिथक गढ़े जाने को क्या कहेंगे?";सृजन का राग; पृ0-166-67। यह असल चिन्ता है। हमारी वास्तविक संस्कृति और समाज। यह संस्कृति और समाज, जैसा कि मैंने पहले कहा, सामाजिक-पारिवारिक सम्बन्धों, सामूहिकता आदि के रूप में अभिव्यक्त होती है। बाज़ार का विकल्प यही सामाजिकता-पारिवारिकता है। दुर्गाजी की एक हैरतअंगेज़ कविता है-‘कैंसर’। हैरतअंगेज़ इसलिए कि इसमें माई है, जिसे कैंसर है। उसे नहीं पता कि उसके पास अब कितना समय बचा है। वह पल-पल मौत की तरफ़ अग्रसर है। लेकिन अपनी इस संभावित मौत को बरतरफ़ कर वह घर-भर की चिन्ता से परेशान है। उन्हें पता है कि अब उनके हाथ में कुछ रह नहीं गया है, लेकिन उनकी इस संवेदना का क्या किया जाए जो कैंसर पर भी भारी पड़ रही है-‘‘कैंसर की पीड़ा से नहीं,/ वास्तव में घर की समस्याओं से घिरी थीं वे,/ इसलिए नहीं कि भवितव्य क्या होगा?/ इसलिए कि/ वर्तमान से दुखी/ उस अनागत को देख रही थीं वे,/ जिसके लिए/ सांत्वना की भाशा चुक गई थी उनके लिए/ जैसे चुक जाता है इलाज कैंसर से!’’;जहाॅं धूप आकार लेती है; पृ0-19द्ध। यही वह तत्व है जो बाज़ार जैसी चीजों का विकल्प हो सकता है।

बाज़ार के विकल्प के तौर पर दुर्गाप्रसाद गुप्त के पास बहुत सारी चीजें हैं। इनमें सबसे बड़ी चीज है, घर। घर यानी कि पारिवारिक रिश्ते, इन रिश्तों की उूश्मा, इनका स्थायित्व आदि-आदि। घर यानी कि एक व्यक्ति की वैयक्तिकता, उसकी स्वाधीनता, उसका आत्मसम्मानपूर्ण और सम्भावनाशील अस्तित्व। घर यानी कि एक सह-अस्तित्वपूर्ण सामूहिकता। ऐसा घर ही आगे समाज और राश्ट््र का मार्ग प्रशस्त करता है।

बाज़ार ने सबसे पहला हमला घर पर ही किया था। पारिवारिक रिश्तों में इधर एक जो बेहयाई, व्यक्तिवाद, आत्मकेन्द्रितता आदि-आदि आए हैं, व्यक्ति को एक व्यक्ति से एक वस्तु में रिड्यूस कर देने की जो एक परियोजना-सी चली है, घर को जो रिश्तों के समुच्चय से उपभोग का केन्द्र बनाने की मुहिम-सी चलाई गई है, यह सब बाज़ार के विस्तार और उसकी संक्रामकता के तहत ही हुआ है। स्वदेशी सरकार से लेकर बुद्धिजीवियों तक सभी ने इसमें बराबर सहयोग किया है। एक ऐसी स्थिति में जब कि सारा परिदृश्य बाज़ार की बलिबेदी पर न्यौछावर हो, घर को बचाना सचमुच एक मशक्कत ही तो है, जिसका परिणाम बिल्कुल भी निश्चित नहीं है।

दुर्गाप्रसाद गुप्त जैसा कि हमने देखा है, बाज़ार की रणनीति को ख़ूब समझते हैं। इस रणनीति के बरअक्स वे घर की रणनीति खड़ी करते हैं। प्रेम, स्मृति, स्वप्नशीलता, आग्रह, उदासी, सुख-दुःख, हॅंसना-रोना, नींद, संघर्श, पागलपन, ज़िद, नाराज़गी, याचना, भावुकता आदि-आदि घर की रणनीति के अवयव कहे जा सकते हैं। सचमुच यदि कोई तय कर ले कि वह घर की रणनीति को असफल नहीं होने देगा तो बाज़ार की हिम्मत नहीं कि वह उसे डिगा सके! यह अतिकथन-सा होते हुए भी एक सामान्य वाक्य है, ज़रूरत सिर्फ़ इस बात की होती है कि हम तय करें कि हमें जाना किधर है? बाज़ार निश्चय ही आपको आपके घर से आपके बाल पकड़कर घसीटता चैराहे पर लाने को उद्यत है, अब यह आपके ऊपर है कि आप में प्रतिरोधी क्शमता कितनी है। प्रतिरोध के आगे संक्रमण परास्त होता है, यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। दुर्गाप्रसाद गुप्त इस मामले में अडिग रूप से तने खड़े हैं।

घर की रणनीति दरअसल घर की ही सुरक्शा नहीं करती, आगे चलकर वह समाज और राष्ट्र की सुरक्शा की ओर भी बढ़ती है। यह एक ख़ामख़याली कही जा सकती है लेकिन यह एक विहित प्रक्रिया है। आप घर और समाज को नहीं बचा पाए तो राष्ट्र को भी नहीं बचा पाएँगे। दरअसल पिछले दिनों घर और समाज का अर्थ इतने संकुचित रूप में निकाला गया है कि ये दोनों क्रमशः व्यक्तिवाद और जातिवाद के पर्याय-से बन गए थे। यह सामन्ती मानसिकता का असर था। यह मानसिकता अब भी ज़ारी है और अब भी इसका यही अर्थ है। यह अर्थ तो बाज़ार का बेतरह स्वागत करता है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा, दुर्गाप्रसाद गुप्त जैसे कवि, जो बिना सरोकार के कलम तक नहीं उठाते, के यहाँ ये एक नई वैचारिकता के साथ प्रस्तुत होते हैं। यहाँ घरू पात्र जिस रूप में हैं, उसमें और अन्य चरित्र, जो इन कविताओं में आते हैं, उनके स्वरूप में कोई मूलभूत अन्तर नहीं है। यह कवि का कोई जनवादी आग्रह नहीं है बल्कि यह उसके स्वभाव का हिस्सा है। मसलन, यहाँ जो कैंसर से पीड़ित माँ है, उसमें और ‘उदासी का गीत’ की इन स्त्रियों में भला क्या फ़र्क है जो मज़दूरी से जब वापस लौटती हैं तो सोचती हैं कि-"उनकी ज़िंदगी में जो घर है,/वह उन्हीं से चलता है,";वही; पृ0-13द्ध। इस कविता की ये अन्तिम पंक्तियाँ माँ पर और इन कामगार स्त्रियों पर एक समान लागू होती हैं-"इस सृश्टि में/कोई भी औरत दुख और उदासी का/कोई निशान नहीं छोड़ती अपने पीछे/इसे ले जाती हैं हमेशा-हमेशा अपने साथ"’ ;पृ0-14। इसी तरह ‘बहन’ शीर्शक कविता में जो संघर्शशीलता और सम्भवनशीलता है, एकदम वही संघर्शशीलता और सम्भवनशीलता संग्रह की पहली कविता ‘निर्जन में संगीत’ में हमें देखने को मिलती है। ‘बहन’ में एक जगह आता है कि "चाह पूरी न कर पाने की विवशता/और व्यथा को/अब अच्छी तरह समझने लगी हो तुम, और/उन संघर्षों को भी.... जिनमें हम तुम और सभी शामिल हैं।";पृ0-16। ‘निर्जन में संगीत’ में आता है कि ‘फटेहाल ज़िंदगी जीने वाले गायक’ ‘किसी फूटे मटके के मुँह पर रबड़ बाँध थाप दे लेते हैं’, उसे वाद्ययंत्र बना ‘संगीत की सृष्टि’ कर लेते हैं, जिस संगीत से कि ‘जीवन का उल्लास’ उपजता है; तो इन दोनों स्थितियों में कोई ज़्यादा अन्तर है, ऐसा मुझे नहीं लगता। इन दोनों सन्दर्भों में सबसे बड़ी समानता जो है, वह सम्भवतः यह है-"शायद/नाउम्मीद नहीं लगती कोई भी जगह उन्हें-संगीत के लिए।";पृ0-9। नाउम्मीदी दरअसल वहाँ भी थी जब इन भाई-बहनों की बहुत छोटी उम्र में इनके ‘अभावों में कराहते हुए दादा’ और ‘खांस-खांसकर दादी मां ने दम तोड़ा’ था और ‘माई के शोक में डूबे हुए बाबू जी की अकाल मृत्यु हुई थी’;पृ0-16। इस नाउम्मीदी से दोनों जगह एक-सा लड़ा जा रहा है और आगे बढ़ा जा रहा है। यह समानता इन कविताओं से फूटती वह वैचारिकता है, या कहें कि वैचारिकता की वह प्रक्रिया है कि जिसके तहत कहा जाता है कि यहाँ मार्क्सवाद किताबों से नहीं बल्कि जीवन से फूट रहा है। ऊपर ‘बहन’ कविता की एक जो यह पंक्ति उद्धृत की गई है कि ‘उन संघर्शों को भी.... जिनमें हम तुम और सभी शामिल हैं।’ इसमें हम-तुम के साथ ये जो सभी हैं, वह जीवन से निष्पन्न हुए इस मार्क्सवाद का प्रमाण है। पारिवारिक सम्बन्धों पर हिन्दी में ढेरों-ढेर कविताएँ लिखी गई हैं। ख़ास तौर से माँ, बहन, पत्नी आदि पर ख़ूब लिखा गया है। लेकिन इनमें से ज़्यादातर कविताएँ या तो निरी भावोच्छ्वास हैं या पुरुष-मानसिकता से लैस उपनिवेशवादी! यह सचमुच आश्चर्यजनक है कि भारत जैसे पारिवारिक सम्बन्धों की लम्बी श्रृंखला वाले समाज में पारिवारिक सम्बन्धों पर सटीक और सहज स्वायत्त कविताओं का इस क़दर अभाव है! दुर्गाप्रसाद गुप्त पारिवारिकता का जो समाजीकरण करते यहाँ हमें दिखाई देते हैं, वह वैचारिक दृश्टि से एक अच्छा संकेत है। यहाँ व्यक्तिगतता एक अग्रगामी सामाजिकता में पर्यवसित होती बाक़ायदा देखी जा सकती है। व्यक्तिगतता का यह अग्रगामी सामाजिकता में पर्यवसित होना बाज़ार का अप्रतिहत विकल्प हो सकता है। आगे यही सामाजिकता राश्ट््रीयता में तब्दील होती है।

‘दशरथ मांझी’ शीर्शक कविता दुर्गाप्रसाद गुप्त की एक ऐसी कविता है, जो उनकी ही नहीं, हिन्दी की इधर की ढेरों कविताओं पर भारी पड़ती है। कविता बहुत सरल और सहज शिल्प में बहुत नामालूम और नान-लाउड तरीक़े से लिखी गई है। दुर्गाजी चाहते तो न जाने क्या-क्या तूमार यहाँ खड़ा कर सकते थे। लेकिन जैसा कि उनका कवि-स्वभाव है, वे, अन्दर चाहे कितनी भी खलबली और उद्विग्नता हो, अपनी बात, बहुत शान्त और समझाइश के शिल्प में ही कहेंगे। जलजलों और उठापटक को झेलने और जज़्ब करने का गज़ब माद्दा दुर्गाप्रसाद गुप्त में है। कविता किसी सनसनी या सार्जेंट के आदेश की तरह सामने नहीं आती बल्कि एक बहुत ही आत्मीय मित्र या सहेली की तरह बाहें फैलाए गले मिलने को आतुर-सी दिखाई देती है। दशरथ मांझी का चरित्र और आख्यान अपने-आप में ही इतना विस्फोटक था कि कविता में सनसनी और आक्रामकता आप से आप आ जाती। हम जानते हैं कि पहाड़ को उड़ाने, उसके बीच से रास्ता निकालने में डाइनामाइट के विस्फोट की ज़रूरत होती है। दशरथ मांझी के पास भौतिक रूप का डाइनामाइट चाहे न रहा हो, लेकिन उसके दिमाग़ में जिस तरह उस पहाड़ को नेस्तनाबूद करने का विचार पैदा हुआ, वह क्शण और वह प्रक्रिया किसी डाइनामाइट से कम नहीं थी! एक ऐसा काम, जिसे करना तो बहुत दूर की बात, सोचना ही, सरकारों को भारी और नामाक़ूल पड़ता हो; एक एकदम ही साधारर्ण आर नामालूम-सा व्यक्ति न केवल सोचे बल्कि उसे क्रियान्वित भी कर दिखाए; मौज़ूदा ठस और पहल न करने की होड़ वाले इस राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में; यह एक हिमाक़त ही तो है। पता नहीं , ऐसा हुआ या नहीं, लेकिन मेरा अनुमान है कि इस हिमाक़त और हठधर्मिता के लिए दशरथ मांझी पर क़ानून को हाथ में लेने की तरह सरकार और ठेकेदारों के काम को अपने हाथ में ले लेने का आरोप ज़रूर लगा होगा! क्या हुआ, इस पहाड़ की दूरी की वज़ह से उसकी जीवन-संगिनी ज़ल्दी और समय रहते अस्पताल नहीं पहुँच पाई तो! ऐसा तो होता ही रहता है, अनन्त काल से हो रहा है और अनन्त काल तक होता रहेगा! ऐसी छोटी-छोटी और बेमतलब की ज़रूरतों पर सरकार ध्यान देने लगी तो उसकी बड़ी-बड़ी परियोजनाओं का क्या होगा? और फिर, दशरथ मांझी जैसी प्रजा का क्या है, कोई वीआईपी इस आफ़त से गुज़रा होता तो फिर भी काई बात थी! दशरथ मांझी जैसों की बीबियाँ ो मरती ही रहती हैं! और फिर क्या यह, इस पहाड़ को चक्कर लगाकर पार करना, ही उसकी जीवन-संगिनी के अस्पताल देर से पहुँचने का एक मात्र कारण था? हो सकता है, इसके पीछे ख़ुद दशरथ की ही कोई लापरवाही रही हो! यानी कि चित भी मेरी, पट भी मेरी और अंटा मेरे बाप का! आज़ाद भारत की कथित लोककल्याणकारी सरकारों का यह असल चरित्र है। दशरथ मांझी जैसे लोग सरकारों के इस हरामीपन को सम्भवतः जानते थे इसलिए उन्होंने जो फ़ैसला लिया कि वे खुद अब इस पहाड़ से जूझेंगे, तो यह कोई ग़लत फ़ैसला नहीं था। दशरथ मांझी का यह उदाहरण बताता है कि नवजागरण और क्रान्तिकारी परिवर्तन की महत्वकांक्षा के मूल्य आम जनता में अभी मरे नहीं हैं चाहे हमारे कथित शासक-वर्ग ने सोद्देश्य उन्हें तिलांजलि दे दी हो! ‘दशरथ मांझी’ शीर्शक यह अकेली कविता दुर्गाप्रसाद गुप्त का आज के इस किंकर्तव्यविमूढ़ूता वाले नाकस समय का लाज़वाब वैकल्पिक ज़वाब है। बुद्धिजीवी लोग रोते रहें समय के संक्रमित और संकटग्रस्त होने का बेतरह रोना; दशरथ मांझी अकेले ने उन्हें यह बताकर बुरी तरह बौना बना दिया है कि यह है, न केवल समय बल्कि सरकारों के भी संक्रमित और संकटग्रस्त होने की स्थिति का अपार सम्भावनाओं वाला विकल्प; बशर्ते तुम्हारी माँ ने तुम्हें इतना दूध पिलाया हो!

इस कविता में तीन चीजें उभर कर सामने आती हैं। दुःख, संघर्श और स्वप्न। ये पहले एक व्यक्ति की थीं लेकिन धीरे-धीरे सबकी हो लेती हैं। मेरा ख़याल है कि दुर्गाप्रसाद गुप्त के इस कवि-कर्म का यह एक त्रिभुज है जो समय के रेखागणित को नए सिरे से परिभाषित करने की क्शमता रखता है। दुःख, संघर्ष और स्वप्न ये तीनों मौज़ूदा बाज़ार को पसन्द नहीं। वह इन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता है। ये तीनों ही आदमी की व्यक्तिगतता से सामाजिकता की यात्रा की सबूत हैं। आज का बाज़ार, जबकि, व्यक्ति को वस्तु बनाने की फ़िराक में रहता है; उसके सामाजिक बनने पर तो वहाँ हड़कम्प ही मच जाता है। दुःख, संघर्ष और स्वप्न ये तीनों आज के हमारे सबसे बड़े विकल्प हो सकते हैं। इन कविताओं की रूह इन्हीं के इर्द-गिर्द चक्कर काटती दिखाई देती है।

दुःख, संघर्ष और स्वप्न इन तीनों के रसायन से जिस एक नई और नायाब चीज की संरचना होती है, वह है- पागलपन! पागलपन यानी कि एक तरह की हद दर्ज़े की भावुकता, उद्विग्नता, तद्वत्ता, संवेद्यता आदि-आदि। ऐसी भावुकता, उद्विग्नता, तद्वत्ता और संवेद्यता यानी कि यह पागलपन व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक के हमारे दायित्वों का ईमानदार संवाहक होता है, हो सकता है। कवि यह यों ही नहीं कह रहा कि ‘‘जो पागल होते हैं, वे ही सच को भी जानते हैं’’;पृ0-34। कवि कहता है कि हमारे यहाँ इस समय जो झूठ का बोलबाला है, तो इसका कारण यही है कि हमने पागल होना छोड़ दिया है; और पागल भी आधा-अधूरा नहीं बल्कि एक पूरा और मुकम्मल पागलपन! ऐसा पागलपन ही देश को सच्चाई के रास्ते की ओर ले जाता है-"जिस देश में पागलखाने नहीं बढ़ते/ वहाँ सच की उम्मीद भी नहीं बढ़ती।";वही। अब यहाँ यह अलग से कहने की ज़रूरत नहीं है कि इस पागलपन से अच्छे-अच्छे आततायी और आक्रमणकारी घबराते हैं। आगे चलकर बाज़ार भी इससे घबराने लगे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं!

वैसे देखा जाए तो, बाज़ार कोई बुरी चीज नहीं है। बाज़ार हमारे जीवन का एक सहजात हिस्सा होता है। बाज़ार से समाज, संस्कृति, भाषा इत्यादि का निर्माण होता है। लेकिन यह पिछला बाज़ार था। अब यह जो नया बाज़ार आया है, वह बाज़ार से ज़्यादा एक एजेंसी है। बाज़ार के नाम पर यह नवपूंजीवाद का विस्तार है, जो संकटग्रस्त पूंजीवाद की संजीवनी बनकर आया और ख़ासकर तीसरी दुनिया के देशों में इसे पनाह मिली। हमने जैसे पलक-पाँवड़े बिछा दिए इसके स्वागत में। यह जहाँ-जहाँ गया इसने लोगों के अब तक चले आते जीवन को पटरी से उतार दिया क्योंकि इसकी अपनी एक अलग पटरी है, जिस पर चलने को यह विवश करता है। यह पटरी क्या है? वह पटरी है-संवेदनहीनता। दुर्गाजी ‘देश जो कि बाज़ार है’ शीर्षक कविता में लिखते हैं-"बाज़ार चीजों को खरीदता और बेचता ही नहीं है/ वह चीजों के साथ हमारे आत्मीय संबंधों को भी परिभाशित-/ करने लगा है/ वह चाहता है कि उसकी तिज़ारत में हमारे सुख-दुख भी शामिल हों/ ताकि हमें भी लगे कि बाज़ार हमारे साथ और हमारे ही लिए है/ गगग बाज़ार के 'लाइव शो' में बदहाली और खुशहाली सब-/ ‘रीमिक्स’ हो नाचती हैं देश के लिए, देश जो कि अब बाज़ार है।’’;वही; पृ0-32। इस भयावह बाज़ार का सामना हमें अपनी स्मृति, सपनों, संवेदनाओं, मनुश्यता के स्थायी मूल्यों, जड़ों आदि का पुनराख्यान और शोधन करके करना होगा। इसके बिना इसका प्रतिरोध संभव नहीं। बाज़ार हमारी सपने देखने की आदत पर ही कुठाराघात कर रहा है। दुनिया की एकध्रुवीयता हमारी स्वप्नशीलता को ही छीन रही है। लेकिन इस कवि का मानना है कि ये स्वप्न ही हैं जो हमें जिलाए रखते हैं। अगर हम अपने सपनों के प्रति आश्वस्त हैं तो दुनिया की कोई भी ताक़त हमें परास्त नहीं कर सकती-"किसी के स्वप्नों को न तो खारिज किया जा सकता है, और/ न ही असुरक्षित।" ;वही; पृ0-59। ध्यान देने की बात यहाँ यह है कि कवि यहाँ केवल अपने देश के बारे में नहीं, समूची तीसरी दुनिया कही जाने वाली जनसंख्या के प्रति चिन्तित है। कवि की यह चिन्ता अन्यत्र गद्य में भी एक प्रश्न की तरह इस प्रकार प्रकट होती है-‘‘तीसरी दुनिया के लोग अपने समाजों की वस्तुस्थिति को परखने, उसके अन्तर्विरोधों को पहचानने और अपनी मूल्य-दृष्टि के हिसाब से समाधान तलाशने एवं विकास की दिशा तय करने के बजाय पश्चिम की नकल में ही अपना भविष्य देखते हैं, अब इसे क्या कहा जाए? क्या तीसरी दुनिया के समाज अपनी संस्कृति और परम्परा के सामर्थ्य और क्षमता से अनजान हैं?";रामशरण जोशी से साक्षात्कार; सृजन का राग; पृ0-168।

शंभु गुप्त

 

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