अरुण देव

1

लय का भीगा कंठ


कह रहा था मैं कुछ

ठीक उसी तरह जैसे बांसुरी के इक छोर पर कहती है हवा

और जो देर तक गूंजता रहता है

मन की बावड़ी में

जिसकी सीढ़ी पर बैठे-बैठे

भीग जाती हैं आँखें

यह किसका रुदन है

कौन सी भाषा में हिचकियाँ बुदबुदाती हैं अपने पश्चाताप

जाने क्या कहा हवा ने

और क्या तो सुना बाँस के उस खोखले टुकड़े ने

जहां कब से बैठा था वह सघन दुःख

जो इस धरती का है

किसी दरवेश, फकीर, संत का है

कि प्रेम रत जोड़ो के सामूहिक वध पर

विलाप करते उस कौंच का है

जो रो रहा है तबसे

जब अर्थ तक पहुचने के लिए

शब्दों के पुल तक न थे

और तभी से भीगा है

लय का कंठ

और जिसे कहने की कोशिश में रूँध जाता है मेरा गला.


(अरुण देव की अन्य कविताएँ)


बिमलेश त्रिपाठी की कविता


हम बचे रहेंगे


हमने ही बनाए वे रास्ते

जिनपर चलने से

डरते हैं हम

हमने ही किए वे सारे काम

जिन्हें करने से

अपने बच्चों को रोकते हैं हम

हमने किया वही आज तक

जिसको दूसरे करते हैं

तो बुरा कहते हैं हम

हमने ही एक साथ

जी दो जिंदगियां

और इतने बेशर्म हो गए

कि खुद से अलग हो जाने का

मलाल नहीं रहा कभी

वे हम ही हैं

जो चाहते हैं कि

लोग हमें समय का मसीहा समझें

वे हम ही हैं

जिन्हें इलाज की सबसे अधिक जरूरत

समय नहीं

सदी नहीं

इतिहास और भविष्य भी नहीं

सबसे पहले खुद को ही खंगालने की जरूरत

खुद को खुद के सामने खड़ा करना

खौफ से नहीं विश्वास से

शर्म से नहीं

गौरव से

और कहना समेकित स्वर में

कि हम बचे रहेंगे

बचे रहेंगे हम....।

(विमलेश त्रिपाठी की अन्य कविताएँ)


हरि मृदुल की कविता


करतब

चौड़ी सड़क के किनारे लगी भीड़ को
उत्सुकता से देखा तो पाया कि
उस्ताद और जमूरे किस्म-‐किस्म के करतब दिखाकर
लोगों की वाहवाही पा रहे हैं

हमने हर करतब पर तालियां बजाईं
जब कि हर बार हमारी आंखों में धूल झौंकी गई
हालांकि यहां कोई धोखा नहीं था
सिर्र्फ पापी पेट का सवाल था

यूं देखने को मिले है इस बीच
ऐसे-‐ऐसे करतब कि
जैसे हम एक अंधेरी खोह में ढकेेल दिये गए
घटनाओं को इस कुशलता से पलट दिया गया कि
रात को दिन और दिन को रात कहा जाने लगा

ऐसी जालसाजी
ऐसी खतरनाक बाजीगरी

यह देश बाजीगरों और जोगियों का
सच ही है यह मान्यता
हम वाकई है इन बाजीगरों
जोगियों के चेले
ये हमारे गुरु
गुरु घंटाल

तो पग-पग पर है करतब
चमत्कार
और उन्हें सामूहिक नमस्कार

नेताओं के करतब तो जी भर देख लिए
बस क्या
अभी तो कई करतब और देखने को मिलेंगे
मसलन
न्यायाधीशों के करतब

(हरि मृदुल की अन्य कविताएँ)


नरेन्द्र व्यास

१.
एहसास
नहीं जान पाया मैं
तुम्हारे होने पर
ना होने का एहसास
ढूंढता हूँ अब
कमरे के आईने पर
लगी तुम्हारी
उस बिंदी में
अब, जबकि
तुम नहीं हो

अभी भी नहीं
लगता मुझसे
मेरे कमीज़ का
टूटा बटन
नहीं पिरो पाता
उसमे 'धागा'
जिसका एक सिरा
अब भी जुडा है
तुम्हारे वजूद के
एहसासों से
 
(नरेन्द्र व्यास की अन्य कविताएँ)


कुमार विश्वबंधु की लम्बी कविता


मंडीनामा -- कुमार विश्वबन्धु


( एक )

मरते दिल का हाल बेचो

बिकता ही अकाल बेचो

भूत-प्रेत-बेताल बेचो


पश्चिम का जंजाल बेचो

अपने हर सवाल बेचो

सब कुछ है अब माल बेचो


अपनी रोटी-दाल बेचो

बेचो अपनी खाल बेचो

कच्चे-पक्के बाल बेचो

फूले -पिचके गाल बेचो
 

जो चाहोगे बिक जायेगा

दिन,महिने औ साल बेचो

मोजे और रुमाल बेचो
 

मिक्सी के सुर- ताल बेचो

सेक्सी-सेक्सी चाल बेचो

होगे मालामाल बेचो

( लम्बी कविता के बाकी अंश)
 


दिमित्री पेपादोपालस (Dimitris Papadopoulos) की कविता

उसने सीखा


उसने अपनी उदासी
गुलाब को दे दी
आँसू को वैसे ही माना
जैसे कि बरसाती बून्द
गुलाब की पंखुड़ियों पर

एक परछाई
उसने नजर उठाई
आज की रात
तुम वसन्त से होगे
उसने उससे कहा--

तुम पसन्द करो शायद
 

अनुवाद ‍ रति सक्सेना

( दिमित्री पेपादोपालस की कविताएँ )


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ