मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 

 

 

 

 

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रअसल कविता में पूरी तरह डुबने पर भी कविता बेमानी लग रही है। कृत्या उत्सव में मिस्र से अहमद आये थे, जिनकी कविता में प्रेम का रंग काफी गाढ़ा था, लेकिन उनके अपने देश में लौटने से पहले ही उस प्रेम की जमीन में सुलगती आग की चिनगारी पूरे विश्व में छा गई... एक अजीब सी बेचेनी होने लगी जबकि लाखों की संख्या में लोगों की भीड़ सरकों पर दिखाई दी....... जब तक कि खबरे भारतीय समाचार पत्रों पर आतीं, उससे पहले ही अहमद को खबर मिलने लगी थी कि उसके देश में आग लगने वाली है। अहमद के पत्रकार दोस्त जेल में जा चुके थे.... और जब तक कि खबरों का बाजार गरम होता, अहमद अपने देश लौट चुका है.... कहाँ है वह, कैसे है वह.... किसे मालूम......बस इतना जानती हूँ कि प्रेम की भाषा में कविता कहने वाला वह कवि कायर नहीं है, उसे अपनी जलती जमीन में जाने में भी कोई परेशानी नहीं हुई।...
मिस्र जल रहा है, अरब के अन्य देश भी चपेट में आ रहे हैं, क्या यह आग क्षणिक है? क्या समस्या है? इतनी बड़ी जन क्रान्ति बिना किसी तैयारी के यूँ ही तो नहीं हो सकती...
जन आक्रोश को देख कर बेटी पूछती है, क्या यह स्थिति हमारे देश में भी आ सकती है.....
मैं सोच नहीं पाती....हम कितने क्षुद्र होते जा रहे हैं...  क्या इस तरह की क्रान्ति के बारे में सोच भी सकते हैं...
रति सक्सेना

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मेरे भीतर
तुम्हारी बारिश
पैदा करती है एक रंग सब प्रेमियों के लिए
चौंधियाता इंद्रधनुश
ठीक तुम्हारी छातियों के मध्य
किसी यौद्धा की खींची हुई सीधी लकीर की तरह
तुम्हारी रोशनियां चमकती है किसी चित्रकार की पेलैट के समान
जिसमें झलकता है चमकता आनंद और सृजन सुख।
*
वो प्रकाश को देह में समाहित करती है ,दर्द चुपके से निचे पैर में चला जाता है
वो दीवार रंगती है ,और मिटाती है ,फिर रंगती है और फिर मिटाती है .
दीवार अपने आप बढती है जैसे यदि जाड़े की पत्तियां बढती हैं ,अकेलेपन से बाहर .
वो चाहती है रंगना एक चौहद्दी (या घेरा )दीवार के चारो ओर
यादों को बांधने के लिए ,तब रोपना चाहती है फूल,घास और चिड़िया .
रोपती है बसंत ,ग्रीष्म ,शरद ,और रोपती है पर्वत और समुद्र ---
*
जोते हुए जहरीले खेत दिखें
या गंध आए क्षितिजों पर लिख दिए गए नासूरों की
या स्वाद शब्दों के फलों का
पुनरूपयोग की संभावनारहित साइबर का स्पर्श
बेसुरर सा संगीत हो
हमारी अंतहीन कल्पना के एक खास आने वाले कल का

भूलने की
छः कोणीय दीवार का इंतजार
अवचेतन में करते हैं हम

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रिल्के के पत्रो के कुछ अंशः

"अपने आन्तरिक एकान्त को तुम्हें इस बात से दूभर नहीं बनाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर का कुछ बाहर आ जाने को लालायित है। यदि तुम शान्ति से स्थिरता पूर्वक विचार करो तो यही इच्छा दूर- दूर तक तुम्हारे एकान्त का विस्तार करने का माध्यम बनेगी।
ज्यादातर लोग अपने समाधान पाने के लिए सुगम से सुगमतर रास्तों की ओर उन्मुख होते हैं, पर हमारी आस्था दुर्गम के पक्ष में होनी चाहिए, क्यों कि प्राणवन्त चीजें एक इसी तर्ज पर चलती हैं। प्रकृति जगत में हर चीज विकसती है, अपनी रक्षा भी करती है, और हर तरह का विरोध सहने के बाद अपने स्वत्व में भी बनी रहती है। हमारा ज्ञान सीमित जरूर है, पर यह बात अटल है कि जो कुछ कठिन है हमारे साथ बना रहता है, हमारा परित्याग नहीं करता। अकेला होना अच्छा सी क्योंकि एकान्त दुस्साध्य है, और जो कुछ दुस्साध्य है , हमारे लिए इच्छित है।

"प्रेम में होना अच्छी बात है, क्यों कि प्रेम दुर्गम है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को प्यार कर सके, यह संभवतः सबसे कठिन काम है, जो हम लोगो के जिम्मे है-एकदम आधारभूत काम-अन्तिम प्रमाण और परीक्षा,बाकी सब कुछ तो वहाँ पहुँचने की तैयारी है। .............

 
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अनुभव
मुझसे कहा गया कि
"हमे अपने अनुभव से सीखना चाहिए"
मैंने गढ़े हुओं को खोदा,
और अवशेष बाहर निकाले
ओह! नरम और कड़े
एक नया जन्तु तैयार
पाँच लाख वर्ष पहले खत्म हो चुका था जो

झरना
मैं‍‍ ‍--
कैसे गाते हो तुम हरदम
प्रतिध्वनित होती लय में

झरना--
देखो, मेरी जिन्दगी पत्थरो से भरी है
ना गाऊँ तो कैसे पिघलेंगे वे?

चक्रवात
मैं तो बस घूमर हूँ सूखी पत्ती का प्रेम- तूफान

लेकिन यह तूफान अलग किस्म का है
दूर है पर अलग नहीं
नीचे झुकता है, चिन्ता की रेखाओं की तरह
और लौट आता है पेड़ का हिस्सा बनते हुए

खिड़की
क्या होना चाहिये
भीतर‍ बाहर
यह सब मैं जानती हूँ
लेकिन यहाँ
न भीतर कुछ, न बाहर कुछ
किस लिए

वह
कहा जाता है कि
जब वह छोटी थी,
अपनी प्यारी गुड़िया को आग में झौंक दिया था
देश के लिए
कोई आश्चर्य नहीं कि
बड़े होने पर उसने
देश को ही झौंक दिया आग में
अपने लिए
इस्माइल
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उठ बैठ प्रिया
मत सोती रह
तुझे उठाता मैं प्रेमी
बींधता हृदय
काम के भीर तीर से
यह मेरा काम तीर
प्रतिष्ठत इसके पर
संकल्पों के कुल्मल से
कामना की नोक लगा
तीखा कर धार- धार
भेदता तेरा हृदय
पुरातन पर वाले
तीक्ष्ण काम बाण से
सुखाता हूँ तेरा दिल
तू शुचिता
हृदय विद्धा !
चली आ, चली आ
मृदुल मन
क्रोध रहित
मधुर वचन
चली आ मेरे समीप
पाया मैंने तुझे
माता, पिता से
मेरे कर्म में रत रह
मेरे चित्त में पहुँच
अनुकरण कर,
चली आ, चली आ
अरी प्रिया मत सोती रह
चली आ कामना ले मन में...!
हे मित्रा वरुणौ !
हृदय वश में करो इसका
भूल कर जग
रहे मेरे वश में बस
अथर्ववेद.....3/25/1-6
*******
प्रिया आ
मत दूर जा
लिपट मेरी देह से
लता लतरती ज्यों पेड़ से
मेरे तन के तने से
तू आ टिक जा
अंक लगा मुझे
कभी ना दूर जा
पंछी के पर कतर
जमी पर उतार लाते ज्यों
छेद करता मैं तेरे दिल का
प्रिया आ, मत दूर जा
धरती और अंबर को
सूरज ढ़क लेता ज्यों
तुझे अपनी बीज भूमि बना
आच्छादित कर लूँगा तुरन्त
प्रिया आ, मन में छा
कभी ना दूर जा
आ, प्रिया !
अथर्ववेद 6/8/1,2,3
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VOL - VI/ ISSUE-VIII

(फरवरी- 2011
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


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