भरत तिवारी

दो...

तुम और मैं

साथ हुआ करते थे

दिन के हर पहर में खुश

तब हमेशा के किये जन्मों का साथ था

याद है पीर बाबा की मज़ार से वापसी

तुमने या फिर शायद मैंने कहा था

सात जन्मो का साथ माँग लिया है !

वो धागा अब भी “इन्तेज़ार” करता होगा

उसका भी और तुम्हारा मेरा भी रंग लाल था

रिश्ते खून के रंग से नहीं बनते, उसे क्या मालूम

“इन्तेज़ार” तो हम भी करते ही रहेंगे

उन दिनों का जो अब नहीं आयेगें

“इन्तेज़ार” साहेब आप भी कमाल के हैं उम्मीद की डोर को टूटने नहीं देते आप



तीन...

त्योहारों का “इन्तेज़ार”

कमाल का काम करता है

रगों में खून की दौड़ को बढाता रहता है

होली कब की है ज़रा देखना कैलेण्डर

होली है !

फिर वीरान गलियाँ

वो करती हैं “इन्तेज़ार”

कब अगला साल आएगा और फिर से वो लाल हरी बैगनी पीले रंगों से रंग जायेंगी

मेरे सारे त्यौहार तो तुम ही हो, कब आओगे



चार...

इस ड्राइवर का क्या करूँ

कामवाली समझती ही नहीं

अभी तक अखबार नहीं डाल गया

माथे पर दो रेखाएँ तो इन्होने ही पक्की करी हैं

इनके ‘इन्तेज़ार’ में एक बड़ी अच्छी बात होती है

इन्तेज़ार खत्म होने के पाँच सात मिनट बीते

हम भूल जाते है कि अभी थोड़ी देर पहले किस मनोस्थिति में थे

ज़िंदगी वापस अपनी रफ़्तार को पकड़ के भगा ले जाती है हमें

बाकी के ‘इन्तेज़ार’ कर रहे होते हैं हमारा ‘इन्तेज़ार’

और मैं तुम्हारा हमेशा की तरह...



पाँच..

तुम ने एक बार मुझे छुआ है

ऊँगली की पोर से

उस हिस्से भर से जिससे गिटार का तार

धुन अधूरी है

एक सुर भर था वो स्पर्श

जिंदगी के गीत को “इन्तेज़ार” है तुम्हारे अनगिनत स्पर्शों का

छः...

तुमको पत्र लिखना

टूटे फूटे लेकिन दिल की बात कहते शेर

कागज़ से भरी कमरे की फर्श

शाम से हुई सुबह

तुम तक उसको पहुचाना

गणित के सारे समीकरणों से मुश्किल

फिर एक लंबा “इन्तेज़ार”

शायद इन्ही सारी प्रक्रियाओं से तुम्हे भी गुजरना होता होगा

आखरी पत्र का “इन्तेज़ार” नहीं गया अब तक और अजीब भी नहीं लगता



सात...

घर पास होता था

बारिश की बूंदे शुरू होते ही

साइकिल पे सवार भीग रहा मैं

तुम छत पे सावन मनाते थे

दूर हो के भी हम साथ भीग लिया करते थे



दूरी देश की सीमा लाँघ गयी

उम्र समय की

बारिश अब साथ नहीं होती

छत और साईकिल को “इन्तेज़ार” है

उनकी खातिर ही कभी भीगते हैं एक बार और कभी

 


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