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ओसिप मन्देलश्तामः

रूसी कविता के रजत काल, यानि कि
बींसवीं सदी के पूर्वार्ध की रूसी कविता
ओसिप
एमिल्येविच मन्देलश्ताम के उल्लेख के बिना अधूरी मानी जाती है।
अन्ना अख्मातवा, बरीस पास्तेरनाक और मरीना स्वेताएवा जैसे कवियों
के साथ मन्देलश्ताम का उल्लेख आवश्यक माना जाता है। मन्देलश्ताम की
कविता अपने समय की चेतना व संवेदना की कविताएँ हैं। जीवन के प्रति
अनुराग होते हुए भी उनकी कविताओं में जीवन स्थितियों के प्रति
विचित्र आक्रोश है। 15 जनवरी 1891 में पोलैंड के वर्सावा नगर में
एक यहूदी परिवार में जन्में ओसिप का जीवन उतार चढ़ाव से भरपूर था ।
राजनीतिक कारणों से उन्हें निर्वासन की सजा भी मिली। जीवन भर प्रेम
व घ्रणा का अनोखा स्वाद चखते हुए अन्ततः यातना शिविर में मृत्यु
प्राप्त हुई। यद्यपि उनके मृत शरीर को एक अलग कब्र तक हासिल नहीं हुई
किन्तु कविता के क्षेत्र में वे आज तक जीवित हैं।
मन्देलश्ताम की कविताएँ बिम्ब, प्रतीक व भाषा की दृष्टि गंभीर व
विशिष्ट हैं। अतः अनुवादक के लिए चुनौती भी। कवि अनुवादक
अनिल जनविजय
के प्रयास से ये दुर्लभ अनुवाद प्राप्त हुए हैं, अनुवादक के दोनों
भाषाओं के ज्ञान और कविता पर पकड़ ने इन अनुवादों को हिन्दी पाठकों
के लिए पठनीय बना दिया है, इस में कोई संदेह नहीं ।
*
लो, खुश रहो उठाकर तुम, इस हथेली से मेरी
सूरज के एक टुकड़े सी, मीठे मधु की यह ढ़ेरी
हमसे कही यह बात पेर्सेफोना*की मधुमक्खी ने॔
कोई खोल नहीं सकता पहले से खुली नाव को
कोई सुन नहीं सकता समूर में लिपटी छाँव को
भय घिरे जीवन को कोई डरा नहीं सकता
हमारे लिए तो अब चुम्बन ही बचे हैं शेष
छोटी छोटी झबरी सी मधुमक्खियों के अवशेष
अपने उस छत्ते से उड़ कर मर रहीं हैं जो
रात के झीने झरमुट में सरसरा रही हैं वे
ताइगा**के घने वन में घर बना रही हैं वे
समय, पराग और गंध ही भोजन है उनका
लो, जरा मुझसे भैय्या, उपहार यह जंगली ले लो
सूखी मृत मक्खियों की , अदृश्य ये मंगली*** ले लो
मधु बदल गया मेरा अब सूरज के टुकड़े में
**नवम्बर**1920
* यूनानी मिथक परम्परा में मृत्युलोक की देवी
**शंकुवृक्षों के सघन साइबेरियाई वन क्षेत्र
***माला
**
भटक रही है आग भयानक वहाँ उस ऊँचाई पे
लग रहा है जैसे कोई तारा चमक रहा है
ओ निर्मल तारे भैया, ओ भटक रही अग्नि
देख यहाँ पर भाई तेरा, पित्रापोल* मर रहा है
जल रहे सपने धरती के वहाँ उस ऊँचाई पे
एक हरा तारा सा कोई झलमल झमक रहा है
ओ जल के , ओ आसमान के भाई तारे
देख यहाँ पे भाई तेरा पित्रापोल मर रहा है
उड़ रहा है यान बड़ा सा वहाँ ऊँचाई पे
फैला अपने पंख गगन में वह बहक रहा है
ओ सितारे भैया आकर्षक , ओ दीप्त हरे तारे
देख यहाँ तेरा भाई निर्धन पित्रापोल मर रहा है
काली निवा नदी पर छाया वसन्त पारदर्शी
अमर बना देगा तुझे वह, अमृत सा बह रहा है
यदि सितारा है तू , तो पित्रापोल नगर है तेरा
देख जरा, तेरा भाई यहाँ , पित्रापोल मर रहा है
*1918
*निवा नदी के किनारे बसे लेनिनग्राद या पितेरबुर्ग या
पीटर्सबर्ग नामक नगर का एक साहित्यिक नाम। पुश्किन से
लेकर आज तक के विभिन्न रूसी कवियों ने अपनी कविता
में इसे पित्रापोल के नाम से पुकारा है।
***
( अन्ना अख्मातवा के लिए )
सुनता हूँ तुम्हारा उच्चारण भास्वर
लगे जैसे बाज कोई सीटी बजाता है
मुझे लगता है जीवन्त तुम्हारा स्वर
बिजली चमके गगन में, मन मुस्कुराता है
क्या है-कहती हो तुम, मन बहक जाता है
का ए - मैं दोहराता हूँ , मन गुदगुदाता है
कहीं दूर सुन पड़ती है फिर आवाज तुम्हारी-
इस धरती से आखिर कुछ मेरा भी नाता है
प्रेम के पंख होते हैं-लोगों का कहना है
पर सौ गुना ज्यादा होते हैं मृत्यु के पंख
मन-आत्मा सदा करें संघर्ष इन दोनों से
और शब्द उड़ें वहीं , जहाँ गूँजे आत्म-कंठ
रेशम सी चिकनाई है मंद स्वरों में तेरे
और हवा की गूँज बहुत है फुसफसाहट में
अंधों की तरह लेटे हैं हम अंधेरे में गहरे
पीकर अनिद्रा का काढ़ा इस लम्बी रात में
1918
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कसान्द्रा
( अन्ना अख्मातवा के लिए )
याद करता हूँ कसान्द्रा मैं जब वे सुन्दर क्षण
तेरे होंठों का स्वाद और आँखों का दीवानापन
उत्सवी लगे मुझे अपनी रातों का जागरण
परेशान होता हूँ हालाँकि, करके तेरा स्मरण
और दिसम्बर, उन्नीस सौ सत्रह का यह साल
खो दिया है सब कुछ हमने, बहुत बुरा है हाल
किसी -एक को जनता ने लूटा, किया हाल-बेहाल
दूजे ने लूटा खुद को ही, लुटा दिया सब माल
कभी जब होगी यहाँ, इस राजधानी में निर्लज्ज
निवा-नदी किनारे पे, स्कीफ-उत्सव* की सजधज
कर्कश संगीत बजेगा, होगा फूहड़ नृत्यों का जोर
सुन्दरी के सिर से खींचेंगे, चुन्नी कुछ पापी घोर
यही है जीवन, तो इस जीवन को मेरा धिक्कार
वन बड़ा -सा लगता है मुझे, यह देश, यह संसार
प्यार किया मैंने तुझे, पर विजय लगे यह लूली
चुभता है जाड़ा इस वर्ष, यह लगे है जैसे सूली
दूर वहाँ चौराहे पर, जहाँ खड़ी है गाड़ी फौजी
देखा मैने वह आदमी, जो लगता है मनमौजी
उन्मत्त भेड़ियों के मुँह देखो, लगा है लाल खून
चीख रहे हैं वे जोर से आजादी, समता, कानून
पर शान्त है तू कसान्द्रा, घर में लेटी बीमार
और मै बेहद बैचेन प्रिया, क्यों बदल रहा संसार
आकाशगंगा में आया होगा, सूरज न जाने कब
सैंकड़ों वर्ष पहले भी उससे, ज्योति पाते थे सब
31 दिसम्बर 1917
* पहली से तीसरी शताब्दी के बीच काले सागर के
उत्तरी तटवर्ती इलाके में रहने वाली जातियों को स्कीफ
कहा जाता है।
*****
पाँच
( ओल्गा अरबेनिना के लिए )
ईर्ष्यालु शुष्क -होंठों पर मेरे, सिर्फ तेरी ही बात
दूसरों की तरह, सुन्दरी, मै भी चाहूँ तेरा साथ
बिन तेरे यह हवा मुझे भी, अब लगती है दास
शब्द शान्त नहीं करते, मेरे सूखे होंठों की प्यास
अब मुझे ईर्ष्या नहीं तुझसे, मैं चाहूँ तुझको यार
तू बधिक है, मैं बलि का बकरा बनने को तैयार
न तू है, यार, खुशी मेरी, न तुझसे कोई अनुराग
पर तेरे बिन रुधिर में जैसे लग जाती है आग
क्षण-भर को ठहर जरा फिर मैं तुझको समझाऊँ
आनन्द मिले न संग तेरे, रम्भा, मैं पीड़ा ही पाऊँ
कोमल चेहरा जब तेरा लज्जित -रक्तिम हो जाए
ओ रूप-गर्विता, तेरी कशिश मुझको बहुत लुभाये
आ जल्दी से तू पास मेरे, डर लागे तेरे बिन
तू कमसिन है , जान मेरी, मैं चाहूँ तुझे पल-छिन
बस इतनी ही इच्छा है कि तू आ जा मेरे पास
अब मैं ईर्ष्या नहीं करूँगा, दिलाता हूँ विश्वास
1920
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मृत्यु ( एक )
जा रही है बेमन से, अनुपम मीठी है चाल
सदाबहार तरूणी है वो, उम्र है सोलह साल
उसकी भूख सहेली है, गृहयुद्ध -मित्र किशोर
जा रही तेजी से वह, दोनों को पीछे छोड़
उसे लुभाये इस देश में सीमित -सी आजादी
जबरदस्ती पैदा की गयी कमी और बरबादी
वसन्तकाल में चेरी फूले, फूले मौत आजाद
चाहे रुकना इसी देश में सदा को यमराज
4 मई 1937
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मृत्यु ( दो )
गीली धरती की सहोदरा, उसका एक ही काम
रुदन यहाँ होता रहे, हर दिन सुबह-शाम
रात दिन जीवित लोगों का करती वह शिकार
मृतकों के स्वागत में खोले मृत्युलोक के द्वार
स्त्री वह एसी इत्वरी* कि उससे प्रेम अपराध
जिसे जकड़ ले भुजपाश में, उसका होता श्राद्ध
देश में मेरे फैल गये हैं अब उसके दूत अनेक
छवि है उनकी देवदूत की और डोम का गणवेश
जनकल्याण की बात करें वे, वादा करें सुख का
कसमसाकर रह जाता जन, ये फंदा है दुःख का
यंत्रणा देते हमें उत्पीड़क ये, उपहार में देते मौत
देश को मरघट बना रही है, जीवन की वह सौत
4 मई 1937
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अभिसारिका ( हिन्दी में)
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