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कृत्या ने छह मास पूरे कर
लिए। सातवाँ अंक आप के कंप्यूटर पर आने के लिए तैयार है। बिना किसी
आर्थिक,तकनीकि, या और किसी तरह की मदद के केवल एक कंधे पर सवार
होकर कृत्या यहाँ तक कैसे पहुँची, यह एक चमत्कार से कम नहीं है।
कुछ साहित्य प्रेमियों ने रचनात्मक सहयोग दिया, कुछ ने हौसला आफजाई
की। अनेक साहित्य दिग्गजों को फोन द्वारा सूचना दी गई, पर किसी ने
कृत्या पर निगाह डालना तक मुनासिब नहीं समझा। फिर भी कृत्या निकलती
जा रही है, हर महिने अपने समक्ष आने वाली पहाड़ सी बाधाओं को पार
करती चलती चली जा रही है..
रति सक्सेना
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सुबह
विस्फोटक
खबरों को
समर्पित है
उजले साँवले
जीवन की
बात सोचो
शम्भू बादल
सोच में पाँव के निशान हैं
या मेरे नाखून
जो मैंने बचाव हेतु
धरती की छाती पर गाड़ दिए थे
सोचो...सोचो..और....सोचो
सोच में कैद है
सोच में भय है
लगता है धरती के साथ बँधा हुआ हूँ
जा फिर दूर जा
टूट कर क्या होगा
वृक्ष नहीं तो राख सही
राख नहीं तो रेत सही
रेत नहीं तो भाप सही
अच्छा फिर शान्त रहो
मैं कब बोलता हूँ
ये तो मेरे पत्ते हैं
हवा में तैरते हैं
सुरजीत पातर
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कितना
कठिन दौर है जिससे हम गुजर रहें हैं। समूची मानव सभ्यता की
उपलब्धियों और संभावनाओं पर गिद्ध उड़ रहे हैं। कहीं भी और कभी भी
कुछ भी घटता है और हम असहाय देखते रह जाते हैं। संक्रमित भूमंडलीय
हवा चल रही है। यह आँधी है। पेड़ जड़ों से उखड़ रहे हैं। संस्कृतियों
के स्रोत सूख रहे हैं। dir="ltr">
अग्निशेखर dir="ltr">
इसी
से निकल कर इमैजिस्ट ग्रुप की कविताएँ आईं। यह ग्रुप मानता था कि
कविता के लिए स्पष्ट और कठोर बिम्ब बहुत जरूरी होता है। इससे रचित
बिम्ब विधान का मतलब है वस्तुओं , भावनाओं , विचारों, चिंतन,
मनोस्थिति, कर्म कोई भी एन्द्रिक या या पराऐन्द्रिक अनुभूति की
भाषाई अभिव्यक्ति , उसका भाषाई प्रतिनिधान, उसका मनव्यापि छवि होना
जरूरी नहीं।
श्रीप्रकाश मिश्र
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ईर्ष्यालु शुष्क -होंठों पर
मेरे, सिर्फ तेरी ही बात
दूसरों की तरह, सुन्दरी, मै भी चाहूँ तेरा साथ
बिन तेरे यह हवा मुझे भी, अब लगती है दास
शब्द शान्त नहीं करते, मेरे सूखे होंठों की प्यास
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जा रही है बेमन से, अनुपम मीठी है चाल
सदाबहार तरूणी है वो, उम्र है सोलह साल
उसकी भूख सहेली है, गृहयुद्ध -मित्र किशोर
जा रही तेजी से वह, दोनों को पीछे छोड़
ओसिप मन्देलश्तामः
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मैं शुद्ध अन्तर में
धारण किए हूँ तत्
निर्मल रूप विद्याधर
ओम् गुरु हैं
परम गुरु ललद्यत मेरी
हृदय में
शिव रूप है माधव
(मेरे पिता)
परम ब्रह्म
सोहम् हो
***
मैं अब
न तो जड़ हूँ
न चेतन
न मैं चार वर्ण ही
न ही हूँ जगत मैं
चराचर में जो समाया
वही हूँ
सत्य से परे हूँ
असत्य से परे हूँ
विछिन्न हूँ मैं
धारा प्रवाह हूँ
समाधि से सूक्ष्म
परं ब्रह्म
सोहम्
रूप भवानी
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