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मेरी
बात
कृत्या ने छह मास पूरे कर लिए। सातवाँ अंक आप के कंप्यूटर पर आने
के लिए तैयार है। बिना किसी आर्थिक,तकनीकि, या और किसी तरह की मदद
के केवल एक कंधे पर सवार होकर कृत्या यहाँ तक कैसे पहुँची, यह एक
चमत्कार से कम नहीं है। कुछ साहित्य प्रेमियों ने रचनात्मक सहयोग
दिया, कुछ ने हौसला आफजाई की। अनेक साहित्य दिग्गजों को फोन द्वारा
सूचना दी गई, पर किसी ने कृत्या पर निगाह डालना तक मुनासिब नहीं
समझा। फिर भी कृत्या निकलती जा रही है, हर महिने अपने समक्ष आने
वाली पहाड़ सी बाधाओं को पार करती चलती चली जा रही है़। संभवतः यह
जीवन शक्ति ले रही उन गिने चुने पाठकों से जो तमाम मुसीबतों को
झेलते हुए कृत्या को पढ़ते हैं, या फिर उन गिने- चुने साहित्यकारों
की वजह से जो व्यक्तिगत परिचय से परे कृत्या से सिर्फ इसलिए जुड़े
हैं कि यह एक साहित्यिक उद्देश्य की पूर्ति कर रही है़ । इन में
अधिकतर से तो कभी मिलना तक नहीं हुआ है, जैसे जम्मु से अग्निशेखर,
हिमाचल से अजेय, रूस से अनिल जनविजयन, और पंजाब से परमिन्दर जी।
उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे में बैठे प्रकाश मिश्र जी अभी तक
कृत्या को देख तक नहीँ पाएँ हैं किन्तु बिना नागा हर महिने अच्छी
कविताओं का पुलिन्दा भेज देते हैं, बिना किसी शिकायत या बिना किसी
तकाजे के। शायद ये ईमानदार कोशिशे ही कृत्या को जीवित बनाए रखे
हैं। कृत्या के अंग्रेजी विभाग में एक साक्षात्कार है जिसमें
अमेरिका के प्रसिद्ध कवि बिली कालिंस ने एक सवाल के जवाब में कहा
हैःNovelists, playwrights, painters and others may hold in their
heads the expectation of fame, but not poets. Having chosen that
road, all one can dream of is the jealousy of one's rivals.
Celebrity is unexpected and almost unseemly--it forces one to
wear a constant look of chagrin, if that is possible. Unless you
are Byron, who was the first poet to become a star. At its
worst, fame means being known by strangers--enough to bring on
waves of paranoia.इस उक्ति को देखते हुए तो लगता है कि कृत्या जो
मिला, जितना मिला वह काफी है। और इस मुट्ठी भर प्रेम के सहारे वह
आगे बढ़ने का सोच सकती है। हालाँकि घर का पता बदलने की स्थिति आ गई
है, यानी कि अब अगले अंक से कृत्या को www.kritya.in पर ही पढ़ा जा
सकेगा। आशा है कृत्या के पाठक इन समस्याओं को नजरअन्दाज करते हुए
सहयोग बनाए रखेंगे।

कृत्या के इस अंक के लिए अनेक स्तरीय रचनाएँ प्राप्त हुई हैं,
कविता के पृष्ठ पर हिन्दी कविता के साथ- साथ पंजाबी कविताएँ भी
उपलब्ध हैं। कविता के बहाने में प्रकाश मिश्र जी के लेख आधुनिक
यूरोप की कविता को आगे बढ़ाया गया है ,साथ ही अग्निशेखर जी के तल्ख
विचारों का व्यक्त करता हुई " इस कठिन दौर में कविता"नाम से
टिप्पण्णी भी है।
हमारे अग्रज खण्ड में कश्मीर की चतुर्थ विभूति " रूप भवानी" के साथ
हमारा कश्मीरी साहित्य के प्रति किया गया एक अनुष्ठान पूर्ण हो
गया।
प्रिय कवि खण्ड के लिए अनिल जनविजयन ने ओसिप मन्देलश्ताम की
कविताओं के अनुवाद को उपलब्ध करवाया है। वे निसन्देह कविता
प्रेमियों को भायेंगे।
पाठक मित्रों से अनुरोध है कि वे कृत्या के प्रति अपने विचार भेजे
, जिससे पत्रिका के स्वरूप निरंतर को संवारा जा सके।
रति सक्सेना
*
कृत्या के इस अंक में अपने
सभी स्तंभों सहित पेश हैं, इस बार हम श्रीप्रकाश मिश्र जी गंभीर
लेख " आधुनिक यूरोप की कविता" को धारावाहिक रूप में प्रस्तुत कर
रहें है। यह लेख धारावाहिक इसलिए है कि नेट पर पढ़ने में सुविधा हो।
आशा है कि इस अंक के प्रति भी पाठक की धारदार प्रतिक्रया मिलेगी।
*
नोट-
पिछले अंको की तरह इस अंक के समस्त चित्र युवा कलाकार विजेन्द्र विज द्वारा बनाए
गए हैं। विजेन्द्र ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने कम समय में
अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है । विजेन्द्र ने कंप्यूटर और
डिजिटल आर्ट में भी महारत हासिल की है। विजेन्द्र की कलाकृतियाँ
अन्तर्राष्टीय स्तर पर खरीदी जाती हैं। विज के चित्रों की अनेक
प्रदर्शनियाँ हुईं हैं । विजेन्द्र में प्रतिभा और लगन के साथसाथ
नम्रता भी है जिसके के कारण कला में आगे बढ़ने की संभावना बढ़ती जाती
है । विज ने अपनी कलाकृतियाँ कृत्या को समर्पित की हैं , इनकी
बिक्री से कृत्या के रखरखाव के लिए मदद मिलेगी । जो कलाप्रेमी इन
कृतियों को खरीदना चाहते हैं वे कृत्या के संपादक से संपर्क कर
सकते हैं । विजेन्द्र से सीधा सम्पर्क करने का पता है
STUDIO VIJ'S
06, Madhuban Building, 54-55 Nehru Place
New Delhi, IN 110019
*::स अंक के सारे रेखाचित्र चित्रकार
प्रभाकर के कलाकार पुत्र रोशन ने बनाएँ हैं। हमे आशा और विश्वास
है कि इस अंक के सारे रेखाचित्र चित्रकार
प्रभाकर के कलाकार पुत्र रोशन ने बनाएँ हैं। हमे आशा और विश्वास
है कि रोशन भी पिता की तरह नाम कमाएँगे।
अलंकरण हेतु चित्रों का निर्माण संपादक
द्वारा किया गया है।
रति सक्सेना
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