इस कठिन दौर में कविताएँ
अग्निशेखर
कविता तथा कविता कर्म, दोनो ही कवि व समाज
के बीच की कड़ी हैं। कठिन काल में इस कड़ी का मजबूत होना कविता की
आवश्यकता है, किन्तु कभी -कभी विरोधी स्थितियों से गुजरते हुए कवि
आत्मालोचन के दौर में कविता नकारात्मक पक्ष से रूबरू होता है तो
निराशात्मक रवैया स्वाभाविक है, किन्तु यह निराशा आशा का आरंभ भी
हो सकती है। अग्निशेखर का यह वक्तव्य हमें कठिन समय से गुजरने में
सहायक होगा, इस संभावना के साथ यह टिपण्णी पेश है।
संपादक
कितना कठिन दौर
है जिससे हम गुजर रहें हैं। समूची मानव सभ्यता की उपलब्धियों और
संभावनाओं पर गिद्ध उड़ रहे हैं। कहीं भी और कभी भी कुछ भी घटता है
और हम असहाय देखते रह जाते हैं। संक्रमित भूमंडलीय हवा चल रही है।
यह आँधी है। पेड़ जड़ों से उखड़ रहे हैं। संस्कृतियों के स्रोत सूख
रहे हैं। नदियों में प्रदूषण है। कहते हैं कि इक्कीसवीं सदी में
पानी को लेकर ही विश्व युद्ध होगा। संसार की आधी से ज्यादा जीवन्त
भाषाएँ दिवंगत हो जाएँगी। साहित्य, कला, संस्कृति बाजार की चीजे हो
जाएँगी/हो चुकीं हैं/हो रहीं हैं।

हमारी पहचान, हमारी विरासत, हमारी प्रतिरोधी क्षमताएँ काल कवलित
होती जा रही हैं। ऐसे में समकालीन सृजनशीलता की भूमिका कितनी
कारगार है अथवा क्यों नहीं है और इस दिशा में क्या किया जाना
अनिवार्य है- इसकी एक गंभीर पड़ताल करना लाजमी हो गया है। समकालीन
हिन्दी कविता की भावभूमि, उसकी विषय -वस्तु सार्थक लगते हुए भी
ऐसा क्या है जो उसे कोई "एन्टिटी" बनने नहीं देता। इस भ्रष्ट और
पतित व्यवस्था के खिलाफ कविताएँ लिख देने भर से काव्य - कर्म की
इतिश्री मानने वाले रचनाकारों के आचरण और सृजन-कर्म में क्या विभेद
जिन्दा नहीं हैं? क्या यह सच नहीं कि आज अधिकांश रचनाकारों का
प्रकृति के साथ रागात्मक संबन्ध नहीं रह गया है?
अन्याय और शोषण पर आधारित समूचे ढाँचे को बदलने का हम स्वप्न नहीं
देखते। शान्ति और सभ्यता के स्वप्न रखने के दिन क्या सच में लद गए
हैं? नहीं। ऐसा प्रचारित किया जा रहा है कि अब कुछ संभव नहीं। जल
प्लावन का मिथक याद करें। धरती उत्तुंग पर्वत शिखरों तक जल में डूब
चुकी है। एक नौका में मनु बचे हैं। उसकी नाव में नये युग की
संभावनाएँ बची हैं। मनुष्यता के बीज -गठरी है। इसी तरह गिरने दीजिए
इस जल प्लावन में भी जिन जिन मीनारों को गिरना है। टूट कर बिखरने
दीजिए जिन स्तम्भों की यही नियति है। यह समय सही और जेनुइन
रचनाकारों के अपनी आस्था में सुदृढ़ रहने के दिन हैं।
हमारे सृजन-कर्म को भारतीय जनता के शक्ति स्रोतों से खुद को जोड़कर
चलना है। एक नयी दिशा और दृष्टि देने की आवश्यकता है। जरूरत है
लोक संस्कृति और लोक भाषा से जुड़ने की। अपनी मिट्टी के स्वाद को
जानने की।
यदि हमारी कविता एक लोक -संवाद नहीं बन सकी है तो उसके पीछे के
कारण हम सब जानते हैं। कविता वाचिक परम्परा से टूट कर आम भारतीय
जनता से कट चुकी है। आज हिन्दी का व्यापक जन-समुदाय गंभीर और मुख्य
धारा की कविता से बेखबर है। यह ठीक है कि हिन्दी समाज में 50% से
भी कम है साक्षरता की दर। लेकिन जो प्रतिशत खाता -पीता है,
संभ्रान्त है, वहाँ भी किताब के लिए कोई जगह नहीं । कहाँ हैं
हमारे पाठक ? और हम क्या कर रहे हैं पाठकों को खोजने, उन्हें
तैयार करने की दिशा में? कविता की सार्थकता उसके पाठक के पास
पहुँचने में हैं। कवि अपनी रचनाओं का पाठ भी इतनी खराब ढंग से करते
हैं कि सुनने वाला मन ही मन उसका मजाक उड़ाता है। इसलिए संप्रेषण भी
प्रभावित हुआ है। जरूरी हो गया है कि हम भाषा, संवेदन, विषयवस्तु
आदि की नई सिर से पड़ताल करें। आज हमारे सामने यह भी एक बड़ी चुनौती
है कि कविता को समाज के साथ हम कैसे जोड़ सकते हैं।
हमारी कविता में मुक्तिकामी चेतना की वापसी होना समय की माँग है।
आज जो कविता हमारे महानगरों में रची जा रही है, क्या वो आपको भारत
की कविता लगती है? क्या उसमें हमारे गाँव, जनपद, हमारे लोग मिलते
हैं? कुछ अपवाद जरूर गिनाए जा सकते हैं