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रूप भवानी

रूप भवानी ( सन् 1625-1721) का कश्मीरी साहित्य और समाज में अपना
स्थान है । रूप भवानी दार्शनिक दृष्टि से शैव थीं। काफी पढ़ी लिखी
सिद्ध योगिनी थीं। ललद्यत की तरह ही रूपभवानी ने भी पति व सास के
अत्याचारों से दुखी होकर विरक्त सन्यासिन की भाँति जगह- जगह घूम कर
तपस्या की। रूपभवानी अपने से लगभग 300 वर्ष पूर्व हुईं ललद्यत को
परम गुरु मानतीं थीं। वे संस्कृत, हिन्दी, फारसी की ज्ञाता थीं।
उन्होंने संस्कृतनिष्ठ कश्मीरी में कविता करने के साथ ही हिन्दी
में भी "वाख" कहे हैं। अहिन्दी भाषी कश्मीर में हिन्दी के सृजन की
दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण पहलू है।
रूपभवानी के काव्य संसार में विद्वत्ता इतनी उच्च कोटि की है कि वे
कठिन कवयित्री के रूप में दिखाई देने लगती हैं।
रूप भवानी , जिन्हें कश्मीरी पंडित अष्टादशभुजा शारिका का अवतार
मानते हैं जिनके जन्मदिन और पुण्य तिथि पर अधिकांश महिलाएँ
व्रत-उपवास रखती हैं, इस दिवस को कश्मीर में " साहिब सप्तमी " कहा
जाता है। इन्हें अलक्ष्येश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। आपके
डेढ़ सौ के करीब वाख प्रत्यभिज्ञा दर्शन की बारीकियों से ओतप्रोत
हैं जो कवयित्री की रहस्यानुभूति को अथाह गहराई देतीं हैं। कश्मीर
में चश्मा साहिबी ( चश्मा शाही बाग) मनिगाम, लार , वास्कुट ,
सफाकदल में इनकी तपस्थलियाँ हैं । अब कश्मीरी पंडितों ने निर्वासन
में भी जम्मू में रूप भवानी का पीठ स्थापित किया गया।
( अग्निशेखर द्वारा प्रस्तुति )
की
रूप भवानी के वाख
*
साधक है वह
रुद्राक्ष माला नहीं जिसके
उच्चरित नहीं हैं मंत्र
नहीं आशाएँ
किसी गोत्र में नही वास
कुल नहीं कोई
न ही बहिर्पूजा
करता वास छठे स्थान चक्र में
महा आनन्द रूप
समस्त ब्रह्माण्ड में ओतप्रोत
नाद बिन्दु में अभेद
जितात्मा
अन्तर्मुखी
दृष्टि निर्वाण -रहस्य की वहीं
पाता परम गति.
( निर्माण दशकी, वाख-7 )
**
पण्डित है वह
जो करता अमृत की नदी में तृप्त
वेद वाक्यों के अर्थों को
चतुर्दिक प्रवाहमान
षोडशचंद्र कलाओं का
करता समन्वय
बनता समदर्शी
अर्चना का पात्र
निर्मल
स्तोत्र गायक
कर सकता स्तवण प्रामाणिक
अखिल जगत का बनता गुरु
लाखों में एक
अन्तर्मुखी
दृष्टि निर्वाण- रहस्य की वहीं
पाता परम गति.
( निर्माण दशकी, वाख-10 )
**
मैं शुद्ध अन्तर में
धारण किए हूँ तत्
निर्मल रूप विद्याधर
ओम् गुरु हैं
परम गुरु ललद्यत मेरी
हृदय में
शिव रूप है माधव
(मेरे पिता)
परम ब्रह्म
सोहम्
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( ज्ञान खण्ड, वाख-1)
**
पलट कर पीछे देखा
खोजा और पाया
मिट्टी और पत्थर से
निकाला दूध
तब भीतर मेरे
बह निकली नदिया
डूब गई ग्लानि जिसमें
और अहंकार मेरा
हुई प्रभात
और नहाई मैं
धुल गई मैल मेरी
चमका सूरज
रहा नहीं कुछ शेष
अब कहने को
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( ज्ञान खण्ड, वाख-5 )
**
मैं अब
न तो जड़ हूँ
न चेतन
न मैं चार वर्ण ही
न ही हूँ जगत मैं
चराचर में जो समाया
वही हूँ
सत्य से परे हूँ
असत्य से परे हूँ
विछिन्न हूँ मैं
धारा प्रवाह हूँ
समाधि से सूक्ष्म
परं ब्रह्म
सोहम्
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( स्वानुभवोल्लास दशकं, वाख-3 )
**
पाई फिर से मैंने
(इस जन्म में )
वह अन्तर दृष्टि
जो आई थी वहाँ मैं छोड़
पा लिया फिर से उसे मैने
मैंने ललद्यत* को माधव* को
शव में किया एकाकार
फिर लय किया शरीर भी उसमें
सुलाया चित्त को पालने में भीतर
हिलराया - डुलराया
और पाया अभीष्ट
विमर्श आया हाथ
जो आई थी वहाँ मैं छोड़
पा लिया फिर से मैंने
* कश्मीरी कवयित्री जिन्हें रूप भवानी अपना गुरु मानती थीं
* रूप भवानी के पिता, जो उनके गुरु भी थे
( आनन्द दशकी, वाख-1 )
**
न जाना भय मैंने किसी का
न जानी लाज ही
लगा सही जो जब भी
किया मैंने
न किया कुछ
न कुछ पाया ही
रही सहज में लीन
फिर भी निभाई रीतें
तितीक्षा और प्रीति का किया निर्वाह
मैं हूँ वही

जो मैं थी जन्म से पहले
मुझसे क्या छूटा
( आनन्द दशकी, वाख-7 )
( अग्निशेखर द्वारा अनुदित )
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