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पंजाबी कवि सुरजीत पातर की कविताएँ
दो वृक्षों का संवाद
मेरी सूली बनवाओगे कि ख्वाब
जनाब
या मैं यूँ ही पड़ा रहूँ पलों और मौसमों का हिसाब-किताब
जनाब
कोई जवाब?
मुझे क्या पता
क्या जानूँ भेद
मैं खुद हूँ तुम्हारे जैसा पेड़
तु ऐसा करों
आज का अखबार देखो
अखबार में कुछ नहीं
झड़े हुए पत्ते हैं
फिर कोई किताब देखो
किताबों में बीज है
तो फिर सोचो
सोच में पाँव के निशान हैं
या मेरे नाखून
जो मैंने बचाव हेतु
धरती की छाती पर गाड़ दिए थे
सोचो...सोचो..और....सोचो
सोच में कैद है
सोच में भय है
लगता है धरती के साथ बँधा हुआ हूँ
जा फिर दूर जा
टूट कर क्या होगा
वृक्ष नहीं तो राख सही
राख नहीं तो रेत सही
रेत नहीं तो भाप सही
अच्छा फिर शान्त रहो
मैं कब बोलता हूँ
ये तो मेरे पत्ते हैं
हवा में तैरते हैं
अनुवाद-कुलविन्दर सिंह "मीत"
(
सुरजीत पातर की अन्य कविताएँ )
अरतिन्दर सन्धु की पंजाबी
कविता
क्यों
मैंने देर तक अपने मोबाइल का नम्बर न बदला
पूरी आस थी
जरूर फोन आएगा इस नम्बर पर
पर अम्बार समय के गुजरे
कण कण कर्ण जून पड़ा रहा
कोई भी मधुर संगीतमय झंकार
नसीब न हुई हवा को
वह नम्बर तो
भोले नटखट बालक सरीखा
उलता रहा होगा नजर में आने को
पर रोंदा गया होगा हर बार
तेरी चेतना तले
एहसास प्रवीण थे मगर
ऐसे तर्जूबे के संग साथ रहने के
देर गए नम्बर न बदला
क्योंकि कुछ आहटें थीं इस में
बेचैनी का लिबास पहने
कुछ सनेहे थे
मधुर तरंग के पहनावे में
उम्मीद थी भैरवी की संगीत ताल बिखेरती
तेरे चहूँ ओर के स्पर्श से
परिवर्तित हो आएगी पवन
सोचो शायद मल्हार की रिमझिम की

पायल झनके फिर
और मैं सुनूँ ही न
वो जलतरंगी झनझनाहट
बिखर जाए कंपन बन
तू बुलाए
और मैं सुनूँ ही न
कार्तिक आ जाए
और मैं चैत्र में रहूँ
नम्बर न बदला मैंने
एक अक्स था उसमे
गुनगुनाते झरने की भोली चितवन का
सूखी नदी के पुनर्जन्म हेतु
मैंने कितनी देर तक
नम्बर न बदला.
अनुवादः सुजाता
(
अरतिन्दर सन्धु अन्य कविताएँ
)
सुजाता की कविता
ऐलान
जलचरों को छोड़
सभी ने हामी भरी
कि यह दुनिया पानी की धुली नहीं
धूल परतों पत्तों पर यूँ चिपकी थी
कि मल मल नहाने पर भी न छूटे
धूल सड़कें तहदार चट्टानों में तब्दील हो रही थीं
पक्षी बेसब्री का घूँट पी पंख फड़फराते
बुजुर्ग खबर से खबर मिला
जल लीला बखानते
बच्चों की क्या कहें
उनकी कागजी किश्तियाँ
छपाछप मस्तियाँ तो
पिछली बरसातों में डूब गयीं
जल युद्ध के मंडराते बादलों मे को देख
बारिश का अनदेखा हुआ
जो अब झमाझम बरसती नहीं
अधमुए पौधों से बतियाती नहीं
सुन बादलों की हुंकार
न समेटे कोई बोरिया बिस्तर
न हँसती हँसाती
न मालपुए खिलाती
न भीगती भिगोती
न ही घंटों उलझाती
कैलेण्डर तिथियाँ पलटने लगा
छतरियों की थोड़ी याद आई
सीलन घरों में घुसने लगी
झट से बून्दों ने कहा
बरसात का एलान कर दो.
(
सुजाता की अन्य कविताएँ..
)
प्रत्यक्षा सिन्हा
की कविता
तरतीब
मेरी सोच
दीवार पर लंबी कतार
चींटियों सी
तुम तक पहुँचते ही
छिन्न भिन्न हो जाती है
रुको ,
मैं ज़रा
तरतीब से सजा लूँ इन्हें
कमरे में पडे
अस्त व्यस्त कुशंस के ढेर
ठीक कर लूँ ज़रा
पुराने रद्दी अखबार
समेट दूँ
गुलदान में पडा बासी फूल
बदल दूँ क्या ?
मेरी सोच अब
मेरे माहौल की तरह
तरतीब में आ गई है
आओ,
अब बैठें
और
बात कर लें ज़रा
(
प्रत्यक्षा सिन्हा की अन्य कविताएँ
)
अजीत आदर्श की कश्मीरी कविता
नदी का रुख
ये केसर पर छितरी चाँदनी
खून की नदी है
और जेहलम का हर खूबसूरत मोड़
मेरी आस्मिता का अंत है
ये चिनारों के गिरते पत्ते
मुझे आतंकित करते हैं
गोया हत्यारों के हाथ हों
रक्त पिपासू
ये बर्फीली चट्टानें सुन्न कर देतीं हैं
हर भाव पक्ष को बदली घाटी में
दूर अहरबल का झरना
उँड़ेल कर निरीह पंडितों की लाशें
उफनता दौड़ता आगे
रक्तम प्रवाह में
उसकी तहों में
बेशुमार सदमें छिपें हैं
आकाश में कहीं टूटकर
विलीन हो गईं देवालय की घण्टियाँ
निरन्तर बजती हुई
एक दिन लौट आएगा आकाश से
श्मशान का धुँआ
लौट आएगी भटकी हुई
निर्दोष हुतात्माएँ
माँगती हुई अपनी हत्याओं का जवाब
बदल जाएगा नदी का रुख
अगले मोड़ पर
कश्मीरी से अनुवादः अग्निशेखर
शेख मोहम्मद कल्याण की कविता
पहली तारीख
पहली तारीख का काला साया
जब जब भी मंडराने लगता
घुमड़ आते हैं काले बादल
आज फिर पहली तारीख है
पिता के हाथ में
खुजली हुई होगी
मोल भाव में
तुली होगी
पेंशन की रकम
बूढ़ी माँ ने फिर दोहराया होगा
नयी साड़ी का पुराना स्वप्न
छोटे पैरों ने भी नापीं होंगी
नन्हें जूतों की कई दूकाने!
झड़ते पलस्तर से झाँकती हुई
कईं ईंटे
आज फिर , खूब हँसी होंगी,
क्योंकि
आज पहली तारीख है
सपनों के जिन्दा होने ओर मर जाने का दिन
आज पहली तारीख है।
(
शेख मोहम्मद कल्याण की कविताएँ ..
)
शम्भू बादल की कविताएँ
जीवन की बात सोचो
सुबह class="tip" dir="ltr">
class="tip" dir="ltr">
विस्फोटक class="tip" dir="ltr">
खबरों को class="tip" dir="ltr">
समर्पित है class="tip" dir="ltr">
उजले साँवले class="tip" dir="ltr">
जीवन की class="tip" dir="ltr">
बात सोचो
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(
शम्भू बादल की कविताएँ..
)
रामशंकर चंचल की कविता
मन के आकाश में
मन के आकाश में
विचारों के पक्षी
दौड़ते हैं दूर! सुदूर
किसी सुख प्राप्ति की ललासा में
आतः उन्हें खाली हाथ
लौट आना होता है
वे भूल जाते हैं कि
आकाश में सिर्फ
उड़ा जा सकता है
वहाँ नहीं बसाये जा सकते हैं
सपने/ इच्छाएँ/
महत्वकाँक्षा !
(रामशंकर
चंचल की कविता )
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