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अय्यप्पा पणिक्कर
की लम्बी कविता

कुरुक्षेत्र
धर्म क्षेत्रे कुरु क्षेत्रे समवेता युयुत्सव
मामका पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय!
क्षितिज के पार के ताप!
स्फोटन से जन्मे ओ तारे!
तू चढ़, ऊपर चढ़,जिससे
ज़मीन का रगें तड़कें
खूँ चूने लगे आसमान से!
ओ मेरी ज़िंदगी के प्रेम तारे!
देख, नीचे देख, यही है
मेरी दुनिया, हम मृत्यों का
रंगमंच, क्या तू सुन सकता है
हँसते- गाते हम लोगों की
पीड़ाओं के मौन गीत?
तू देख, ढलका पनी आँखों से
आँसुओं के कतरे,रोशनी की बूँदें
इसी राह पर देखेगा तू
मनुष्यों की कल्पना से सजी
विशिष्ट सृष्टि,भीड़ भड़क्के वाली
बड़ी सी हाट है दुनिया
माल ढोकर सौदागर आते हैं
मोल लगाते खुद को,
मोलभाव करते, आँखें पीती
आँसू,शिराएँ सुड़कतीं उबला ख़ून
मज्जा चूसती है,कंकाल कुतरता ख़ाल,
जड़ें खींच लेतीं हैं फूल
माटी निगल लेती है पैदावार,
हम मर्त्यों की हँसती खेलती
दुनिया को देखेगा तू नीचे,
मंत्रोच्चारण से पवित्र
आधारदीप। की जलती शीतल लौ में
उभरते पिघलते, वेदी पर स्थित
वेदना का विलाप, तू सुन!
सुखं देहि ऋषिकेश
सुखं देहि जनार्दन!
मंदिर मस्जिद महल और गिरजाघर
पने पैने सिरों से,चीरते
आदमी का सीना, खेलते दिलों से
खिलखिलाते ख़ुश होते
इसी आसमाँ के नीचे
आँखें फोड़ पकड़ा देते
वेद चश्मा,मंत्र बुदबुदाते हुए
निगाहों की नोकों से
सूलियाँ घोंपते जाते।
गिरजाघर में लबालब भरा
आस्तिकता का जल,उबलउबल
बहता हुआ शुद्घ कर रहा है कारख़ाना
ज़िंदगी की शस्त्रक्रिया जारी है,
तरह तरह से।
चोगों में सजे, वैद्यनर्स
कन्याएँ आ पहुँचे हैं,
उठ रहे हैं,जाने समझे किए सभी पाप,
छिपा कर रखे गए थे जो
गिरजाघर की सूली के नीचे से
उठ रहा है,बरबाद ज़िंदगियों के रोदन;
प्रणाम सर्वगुण संपन्न मरीयम!
धन्य है तू स्त्रियों में
भोर की मृदु धूप सी
मुस्कुराहट लिए,कोमल पवित्र
प्यारी,चोटियाँ बाँधें
मासूम बच्चियाँ,
अँधेरे की ओर गुनगुनाती
झिलमिलाती नीली पुतलियों वाली
निम्नगामिनी साँझ सी
घघरियों में सजी कन्याएँ,
कपोलों और दिलों में
किरणें बिखेरतीं, नेरियत। पहने चाँदनियाँ,
दुपहरी की शुभ्रता मन में लिए
वत्सल माताएँ,
अर्ध रात्रि सी झुर्रियों से भरे
चेहर वाली लड़खड़ाती वृद्घावस्थाएँ....
शरीर में तीक्ष्ण आत्माएँ
लगातार धड़क रहीं हैं
मदमस्त मानव शक्ति से
मौत भी भयभीत खड़ी है, तो फिर
ज़िंदगी के इस सफ़र में
थकीथकी आहें क्यों भरी जा रही हैं?
मोटी दीवार के पीछे, गिरजाघरों में हैं
काले चोगो में सजे पादरी और
जलते जिगर सी
फीकी टिमटिमाती मोमबत्तियाँ।
। केरलीय स्त्रियों की वेषभूषाजो सुनहरे बार्डर लिए सफेद रंग की
होती हैं।
दो
काले धौले बादलों के बग़ीचे में
संस्कृति आग लगा मुँद लेती है आँख,
तब तू क्या समझ सकता है पाठक
मेरे जलते दिल की पीड़ा को?
कुछ सपने राह भटक गए
बोध ग्रहण का समय खो गया
मरे हुए सपनों को कफ़न ओढ़ा
सोती हैं यादें, सुलाती हैं
लालपीली लपटों की
चोटियों वाली चिता पर
सोते हुए शव मानों पड़े हों पालने में
चौंक कर जग जाएँगे भी
तारों से भरे ाकाश से ही क्या
लोरियाँ चूँ रहीं हैं?
आकाश नीलिमा को बटोरने के लिए
नारियल की बढ़ी बाँहें देख कर,
ज़मीन के भीतर, बूँदों की उछाल से
खदबदाती सागरी झील की लहरों सी
जल रही है मुझमें
असीम झील की गर्म प्यास
एक नन्हे अणु केंद्र के सम्माकर्षण में
खिल उठते हज़ारों गोलक
कहीं दूर अनंत असीमता में
जल रहा होगा गोलक कोई।
घनात्मक ऋणात्मक विश्व के
रक्त में जल रहे हैं गीत
क्या तू जानता है पाठक?
मेरे जिगर में जल रहे तारक तेज को?
मेरे सपनों के नन्हे पुष्प!
क्यों है तू इतना गंभीर ?
मेरे सपनों का गायक
क्यों तू लिपटा है दुख से आज?
गाई नहीं क्या हम दोनों ने
फूल के बचपन पर दो पंक्तियाँ
तू सब कुछ भूल गया पाठक!
हम दोनों में जल रहीं हैं समान व्यथाएँ।
सभी कच्चे सपनों को भी भूल गया?
तू अब भी फँसा है बकवास गीतों में?
ज़िंदगी तुझे पुकारती हुई रो रही है
तू है कि वेदांत यंत्र घुमाने में लगा है
किस लिए यह सब, किस लिए?
सोचे विचारे नहीं तो सवाल ही नहीं रहेगा
सारे सवाल गर्भ में हैं
प्रसूति के बाद खिलने वाला क्या है?
नग्न तारे लिपट रहे हैं एकदूसरे से
स्निग्ध सूक्ष्म हाथपैरों से
जल कर चूती हुई चाँदनी के जल में
घुल रही हैं ज़मीन की निश्र्वास हवाएँ।
चटचटा कर खिलती हैं कलियाँ,
रात की मूर्धा से निकलता है सौरभ
पर्देदार खिड़कियों के भीतर

बंद दरवाज़ों के पीछे धड़क रहे हैं
स्निग्ध, तीक्ष्ण, निरंकुश जीवन सत्य
मोह और निराशा की छायाएँ
टहनी पर खिलते ख़ूनी लाल को
घुटकते हैं प्यासे लोग
आपस में नजाने ये नन्हे
तारे तैयार हैं आलिंगन के लिए
कन्या मठ। के चारों ओर
उठ रही दीवारें
पहरा दे रहीं हैं,
पिंजर जैसे घर में
बिलबिला रहे हैं
स्नेह, प्यार और मोह
खिलतेखिलते सूख जाती है शैशव के
भविष्य की निराशाएँ
दूर कहीं उल्का छिप जाती है चमक दिखा
फिर भी घूम रही है धरती स्वयं।
अनुवाद..रति सक्सेना
(क्रमशः
- अगले अंक में समाप्त)
मानवीय सवालों से जूझती कविता "कुरुक्षेत्र"
डा रति सक्सेना
कुरुक्षेत्र, जहाँ अपने और परायों के बीच, सच्चाई और झूठ के बीच,
जिन्दगी और मौत के बीच परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना एक अनवरत
संघर्ष दहकता रहा। इतिहास के पन्नों के बीच से निकल यह कब और कैसे
हमारी जिन्दगी में आ धमकता है, उसे महसूस करते हुए हम किस तरह उसे
जीते हैं, यह सब कुछ समझने बूझने के लिए हमे जरूरत है एक दर्पण की
जो हमे अपने- अपने अपने कुरुक्षेत्रों से रूबरू कराने के साथ साथ
उससे बाहर निकलने का रास्ता भी दिखा दे। कवि, चिन्तक, दार्शनिक
अय्यप्प पणिक्कर की कविता " कुरुक्षेत्र" एक ऐसे ही रूप में हमारे
समक्ष आई है।
एक सरल युवक न जाने कितने सपने, आशाओं और आदर्शों के साथ
कर्मक्षेत्र में प्रवेश करता है तो वह अपने को जिन्दगी के
कुरुक्षेत्र में पाता है। एक असमंजस की स्थिति है, उसके सपनों और
यथार्थ के बीच। वह हर क्षण अपने आदर्शों से बिछुड़ने का डर लिए, लड़ना
चाहता है, जीतना चाहता है, और वह भी अपने ही हथियार से। महाभारत के
कुरुक्षेत्र में किसी की भी जीत नही हो पाई, कारण जो मर गए, उनका
समूल नाश हो गया, जो जी गए, वे भी बच कहाँ पाए, अन्ततः अपने ही
अतीत में गल कर मर गए। लेकिन कवि के इस कुरुक्षेत्र में अन्ततः एक
मार्ग दिखाई देता है। अय्यप्पा पणिक्कर की यह कविता कवि की जिन्दगी
के सीमित दायरे से निकल कर इस तरह सार्वभौमिक और सार्वकालिक बन गई
है कि अपने रचना काल के 50 वर्ष उपरान्त भी समकालिक सी प्रतीत होती
है।
कुरुक्षेत्र एक ऐसी कविता है जहाँ एक भी शब्द, एक भी भाव, एक भी
विचार व्यर्थ नहीं गया है। हर पंक्ति भावों से सान्द्र है। भाव उड़ते
नहीं, सामने बैठ कर सवाल पर सवाल करते जाते हैं। एक एक बिम्ब अंगुली
माल की तरह न जाने कितनी कथाओं की उंगलियाँ थमा देता है।
इन भावों का साक्षी है एक तारा, - "दुनिया का हाट लग जाता है,
सौदागर माल ढो- ढो कर आने लगते है. अपना मौल लगाते हैं और मौल भाव
भी खुद करते हैं।" रगे तड़कती हैं जमीन की और उसके खून से आसमान तक
लाल हो जाता है। कितनी उलट बाँसियाँ है यहाँ,-----." आँखे आँसू पीती
हैँ , शिराएँ उबलता खून पीती हैं, कंकाल कुतरता खाल, जड़े खींच लेती
फूल, माटी निगल लेती जड़ों को।" कवि हर अनहोनी को परदे पर चलती
कटपुतलियों की तरह पेश करते जाते हैं। पाठक हर पल को अपने भीतर
महसूस करता हुआ कवि के साथ यात्रा आरंभ कर देता है।
कवि के रंगमंच पर एक- एक भाव अपने अभावों पर से पर्दा उठाते हुए आते
हैं। धर्म के वेश में कलि पुरुष, आदमी के सीने में घुपते मन्दिर,
मस्जिद या गिरिजाघर, जिन्दगी के कारखानों में अपने लिए औजार बनाते
पण्डित, मुल्ला, पादरी। पाठक पर्दे के पीछे के व्यभिचार से वाकिफ
होते हुए कवि के दुख में भागीदार हो जाते हैं। अब कवि और पाठक आमने
सामने हैं-. जब संस्कृति काले धौले बादलों के बगीचे में आग लगा /
आँख मून्द लेती है तो / तू क्या समझ सकता है पाठक / मेरे जलते दिल
की पीड़ाओं को?
यहाँ से पाठक कवि की भूल भुलैया मे विचरण करने लगता है। कुछ सपने
रास्ता भटक गए / बोध ग्रहण का समय भटक गया / मरे हुए सपनों को /
कफन ओढ़ा / सोती हैं यादें / और सुलाती हैं / लाल पीली लपटों की /
चोटियों वाली चिता पर....
ऐसा लगता है कि सृष्टि का कण- कण बिम्बों के रूप में साकार हो उठा
है। कवि और पाठक आमने सामने आ जाते हैं। उनका संवाद सृष्टि का
संवाद बन जाता है, उनकी पीड़ा जिन्दगी की पीड़ा बन जाती है। कवि पूछता
है - तू सब भूल गया पाठक ! / हम दोनों में समान व्यथाएँ जलती हैँ /
अपने कच्चे सपने को भी भूल गया ? तू अब भी फँसा है प फ फम के गीतों
में?...यहाँ कवि केवल सृष्टि के कष्टों बल्कि साहित्य के धर्म पर
भी सीधा कटाक्ष करता है। पठन और पाठकीयता भी सवालों के घेरे में आ
जाती है।
कविता के तीसरे भाग तक आते आते पाठक फिर अनेकों सवालों से घिर जाता
है.- हम क्यों पैदा हुए है जमीं पर? / इन हड्डियाँ चमकाती पहाड़ियों
पर ? / सीता को जंगल में छोड़ने के लिए ? / रावण का खून पीती लंकाओं
के लिए? / कौन विभीषण, कौन सुग्रीव यहाँ ?/ क्या वसिष्ठ ही सब
सन्मार्ग बतलाएँगे ?- ये सवाल कवि पाठक के लिए बोधिवृक्ष बन जाते
हैं और यही से कवि - पाठक एक नया रास्ता तलाशने लगते हैं। -- क्या
विश्व बैंक को इससे ज्यादा सच्चाई मालूम है? - उन्हें विश्वास होने
लगने लगता है कि रास्ता खुद ही तलाशना है, काल तक सही मार्ग नहीं
बता सकता है। वे कहते हैं.-- सन्देह करें हम घटनाओं को दौड़ाते उस
काल पर / जिसने हमे, सिर्फ हम बना कर छोड़ दिया /
अपने तर्क की पुष्टि के लिए कवि अनेक घटनाओं को उलांघते हुए बढ़ता
जाते है। भूत और भविष्य की कसकसाहट बार बार सामने आ खड़ी हो जाती है
, किन्तु अन्ततः वे अपने को पहचानते हुए जीवन अमृत को पाप्त कर लेते
है---.इस लम्बे सन्नाटे में जब हम / नाड़ियों की धड़कन जानने के लिए
रुके/ तब रुकना नहीं है बोधिवृक्ष की छाया में/ अगर दिल में बोध
जगाना है तो / कालवरी की पहाड़ियों की कथाओं को गाना नहीं / अगर
मनुष्य बने रहना है थोड़ी देर को ।
कुरुक्षेत्र कविता में जिस तरह से पीड़ा, वेदना और निराशा छाई है,
ऐसा लगता ही नहीं कि अन्ततः कोई मार्ग सुझाई भी पड़ेगा। किन्तु अन्त
की कुछ पंक्तियाँ कविता के पूरे रूप को बदल देती है, पाठक को काले
अंधकार में भी रास्ता सुझाई देता है। यह वह रास्ता है जो किसी के
अनुकरण से नहीं मिला है बल्कि जिसे स्वयं व्यक्ति ने खोजा है, वह
भी अपने ही ज्ञान की नाभि में।
विषय वस्तु के अतिरिक्त कुरुक्षेत्र की विशेषता है, वह है कविता का
शिल्प- विधान और शैली। यह एक लम्बी कविता है, कोई सन्देह नहीं, पर
इतनी लम्बी भी नहीं कि इतने सारी घटनाओं को को समा ले। कवि जिस तेजी
से विषय परिवर्तन करते हैं, अचंभा होता है। एक के बाद एक घटनाएँ आती
हैं , कहीं सम भाव से कहीं विषम भाव लिए, लेकिन कहीं भी ऐसा नहीं
लगता कि सूत्र टूट गया हो। इतने सारे विषयों को इतनी छोटी सी परधि
में बाँधना कितना कठिन है, यह हम सब जानते हैं, यही कारण है कि यह
कविता जटिलता का आभास देती है। मलयालम साहित्य के छात्रों के लिए
जटिल मानी जानी वाली यह कविता जिन्दगी के इतनी करीब है कि हर
संवेदनशील व्यक्ति इसे अपने भीतर महसूस कर सकता है। संभवतः जटिलता
में सरलता, पराजय में जय, पीड़ा में आनन्द और निराशा में आशा दिखलाने
के लिये ही कवि ने कुरुक्षेत्र लिखी है। यही कवि का कवित्ब है।
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