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मुझे अंको से बड़ा भय लगता है, संभवतया इस लिए कि मैं सोचती हूँ कि वे शब्दों की तरह बात नहीं करते, बल्कि एक दम सीधा वार करते हैं।

जहाँ शब्द चित्रकथा की तरह धीमे धीमे खुलते हैं, अपने आस पास एक जाल बुनते हैं। अंक तुरन्त एक अर्थ देते हैं, और फिर अजीब सी चकाचौंध फैला अपने प्रकाश जाल में फँसा भी देते हैं।

मैं यह भी सोचती हूँ कि अंको से दोस्ती ना होना मेरी अपनी कमजोरी है, हालाँकि इस बात को भी समझती हूँ कि शब्दों से भी मेरी कोई खास दोस्ती नहीं है। वे भी तो हमेशा मेरे हाथ नहीं आते.... लेकिन फिर भी न जाने क्यों शब्दों को अंको की अपेक्षा स्वयं के नजदीक पाती हूँ।

मेरे इस तर्क पर गणित प्रेमी हँस सकते हैं क्यों कि उनके लिए अंक समस्या समाधान की पूरी इमारत खड़ी कर देते हैं। वे शब्दों की अपेक्षा अंको से ज्यादा सहज होते हैं। भास्कराचार्य द्वितीय ने अंको से खेलते हुए लीलावतीयम् की रचना की, जिसमें अंक शब्दों के साथ इस तरह से घुल मिल गए हैं कि कहाँ कविता आरंभ होती है और कहाँ अंकों की कथा, कुछ जान ही नहीं पड़ता है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में शब्द अंको की परिक्रमा करते से प्रतीत होते हैं।

लेकिन शब्दों की आवश्यकता उन्हें भी पड़ी, अतः यह सोचना कठिन है कि मात्र अंको की सहायता से कविता रची जा सकती है।
मैंने इन्टरनेट पर नम्बर पोइट्री के नाम से कुछ रचनायें देखी हैं,लेकिन अनमें भी शब्द है लेकिन अंको में बँधे हुए...

हालाँकि इस तरह की कविताएँ मेरी समझ से परे हैं।

अंको से मेरी मित्रता ना होने का यह भी कारण है कि उनका व्यवहार मेरी समझ ही नहीं आता। जब वे हमारी झोली में होते हैं तो सुख देते हैं, और किसी और की झोली में दुख । जैसे कि मेरे बटुए में कागजी नोट के जितने ज्यादा अंक हों, मैं उतनी ही खुश हो जाती हूँ, लेकिन इस खुशी को तभी तक जीवित रख पाती हूँ जब तक मैं उन्हे किसी वस्तु में बदल ना लूँ, और जब मेरे पास अंको के बदले वस्तु आ जाती है तो मैं यह सोच कर दुखी हो जाती हूँ कि मेरे बटुए में अंको की संख्या कम हो गई। अभी हाल में ही एक धर्म गुरु के कमरे से करोड़ो की संख्या में अंक मिले , यह सोचने की बात है कि वे इतने अंको से घिरे रह कर भी मृत्यु के समक्ष कितने अहसाय होंगे, फिर भी अन्त समय तक अंको के मोहजाल से मुक्त ना हो पाए। अंको का यह प्रेम समाज के अलग अलग चेहरे दिखाता रहता है। इसमें कोई सन्देह नहीं भ्रष्टाचार के मूल में भी अंको के प्रति नकारात्मक जुनून है। उस जुनून से मुक्ति पाना सहज भी नहीं?

पुनः मैं इस बात पर विचार करती हूँ तो पाती हूँ कि यहाँ भी अंक का सारा दोष नहीं अपितु हमारी समझ का भी है , जो अंको को मात्र इसी रूप में देखना पसन्द करती है। यदि अंको को सकारात्मक सोच में बदला जाए तो संभव है कि कई सारे अंक बन्द कमरे में सड़ने से बच जाएँ, ना जाने कितनी पीड़ाएँ दैनिक कष्टों से निजात पा जाए।

सब कुछ समझने की कोशिश करती हुई भी मैं ना जाने क्यों अभी तक अंको से दोस्ती नहीं कर पाई हूँ।

कृत्या के छह वर्ष पूरे हो गए हैं, इस अंक के साथ हम सातवें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उम्र के साथ साथ हर महीने की कवायत मुझे थकाने लगी है। हर अंक से पहले मैं अपने को असहाय पाती हूँ.....

यहाँ भी अंक का खेल... देखें कब तक चलता है!


इस अंक के कलाकार हैं जयपुर के अमित कल्ला


शुभकामनाएँ

रति सक्सेना


 
     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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