आधुनिक यूरोप की कविता


कविता को किसी भाषा के दायरे में बन्द नही किया जा सकता। इसलिए जब हिन्दी में कविता की बात करते हैं तो हमारे लिए यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हम अन्य भाषा में रची जाने वाली कविता से भी परिचित होते रहें। यह कृत्य अनुकरण को ध्यान में रख कर नहीं बल्कि इस दृष्टि से किया जाना चाहिये कि हमे जानकारी मिले कि हमारे आसपास क्या घटित हो रहा है। इससे कविता की सोच धार आ सकती है। श्रीप्रकाश मिश्र जी कविता के बारे में एक परिपक्व सोच रखते हुए नवीन को स्वीकारने का माद्दा रखते हैं। उन्नयन पत्रिका इसका उदाहरण है। श्रीप्रकाश जी ने आधुनिक यूरोप की कविता पर जो चिन्तन किया है वह विशद व विचारवान है, अतः हम उनके लेख को धारावाहिक क्रम में प्रस्तुत करेंगे जिससे हिन्दी के पाठक अपने को वैश्विक दृष्टि से तौल सकें।
संपादक



आधुनिक यूरोप की कविता

श्रीप्रकाश मिश्र


हमारे समय में कविता के दो लक्ष्य उभरे हैं- सौन्दर्य और मानवता। अब सौन्दर्य क्या है कविता के सन्दर्भ में...इसे अभी तक कहीं भी आधिकारिक रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। स्थूल कलाओं में जरूर प्रयत्न हुआ है, जहाँ कहा गया है कि वह एक तरफ अंगों के आनुपातिक लगाव ‌और समुच्चय, भव्यता और आँखों को अच्छा लगना बहुत वस्तुगत नहीं होता। हमारी जातीय चाहतें, स्मृतियाँ और व्यक्तिगत रुचि आदि उसका निर्णायक होती हैं। यह भी कहा जाता है यदि निर्माण ठीक ठाक हो गया होता है, एकदम से परफेक्ट हो गया होता है तो वह उबाऊ हो जाता है। ..कला दरअसल पूर्णता प्राप्त होने में जो बचा रह जाता है, जिसे दर्शक अपनी अपनी तरह से पूरा करते हैं और ऐसा करने में जो आनन्द लेते हैं , कला वहाँ होती है। यानी जो हमारी कल्पना को स्फुरित करे , वह भी दिए ढाँचे में, कला वहाँ होती है। वही सौन्दर्य होता है। कविता के संबन्ध में कहा जाता है कि वह भीतर की चीज होती है जो अन्ततः कल्याण भावना की ओर ले जाती है।
यह कल्याण भावना ही उसे मानवता से जोड़ती है । इस मानवता के दो रूप हैं। एक तो वह जो मानव पर जोर देती हैः आदमी चाहे जहाँ का हो और जिस किसी भी रूप में हो, उसका भला होना चाहिए। यहाँ आदमी के बरक्स दूसरे जीवधारी काव्य होते हैं और साधन स्वरूप होते हैं।
आदमियों में भी वे नगण्य हैं जो बृहत्तर कल्याण में बाधक होते हैं। उन्हे नष्ट कर दिया जाना चाहिए, जिससे वह कल्याण सबमें बाँटा जा सके। यह अन्ततः तानाशाही की ओर ले जाता है... चाहे वह व्यक्ति विशेष की हो या समुदाय विशेष की। दूसरा मानवता पर जोर देती है। एक तरफ वह व्यक्ति को अपने सन्दर्भों में स्वत्नंत्र रहने के लिए हिमायत करती है तो दूसरी तरफ जब वह व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों के सन्दर्भों में उनके सम्पर्क में आता है जिससे कहीं टकराव तो कहीं एका पैदा होती है उसे सामाजिक सन्दर्भों में अभियन्त्रित करना चाहती है, जहां तक हो सबकि सहमति से। यह प्रजातन्त्र की स्थापना करती है। आधुनिक यूरोप की कविता दोनों से स्फुरित हुई है। वह आदमी बनाम प्रकृति व स्वभाव ( अंग्रेजी में दोनों के लिए एक ही शब्द नेचर उपयुक्त होता है) से आगे बढ़ती है। जो बाह्य है, प्रकृति है उसकी गहराई और सौन्दर्य का वर्णन रोमान्टिक कविता में है। जो मनुष्य का स्वभाव है - उसकी गहराई और तदजन्य खुदाई से उत्पन्न सौन्दर्य का वर्णन आधुनिक कविता में है। जहाँ वह मानवता से जुड़ती है वहाँ वह मानववाद और मानवता दोनो से अवगणित है। इन सबका समुच्चय आधुनिकतावाद है।
इस कविता की कई रीतियाँ हैं, पहली रीति वाल्तेयर की है, जो कविता में आधुनिकता का वास्तविक जनक है। वह कहता है कि आधुनिक समाज में कवि की भूमिका मसीहा की है, क्योंकि परंपरागत ढंग के मसीहों का जन्म अब असंभव हो गया हध। जो सामाजिक , राजनीतिक या नैतिक संस्था‌ओं के शीर्ष पर हैं वे लगभग जड़ और तानाशाह हो चुके हैं। इतने कि न तो वे कुछ नया दे पाने की स्थिति में हैं , और न ही उनकी आलोचना सामान्य जन के लिए खतरे से खाली है। यह दोनो ही भूमिका अब कवि को अख्तियार करनी है। इसकी तार्किक परिणिति तो यह होती है कि कविता सोच कर, विचार कर, सोच और विचार दोनो के लिए लिखी जानी चाहिए। इससे हावी वर्ग को खतरा था। इसलिए उनके एक शिष्य मलार्ले की एक उक्ति को सन्दर्भो में काट कर बहुत प्रचारित की गई, कवि और कविता की भूमिका को नीचा करने के लिए। उक्ति थी- कविता विचारों से नहीं शब्दों से लिखी जाती है, और सन्दर्भ था डेगा की एक जिज्ञासा- मेरे दिमाग में अच्छे अच्छे विचार आते हैं लेकिन मैं कविता नही लिख पाता, क्या करुँ? जाहिर है कि मलार्ले ने जो समाधान दिया था, वह विचार को खारिज करने के लिए नहीं, बल्कि उसे शब्द में पकड़ कर रखने के लिए था। लेकिन कमजोर कलावादी कवियों ने उसे शब्द तक ही सीमित कर दिया। परणिति स्वचालित लेखन में होने लगी। - जो भी दिमाग में शब्द आएँ, उन्हे अण्ट शण्ट तरीके से रखते चले जाएँ, बिना अर्थ पर ध्यान दिए। कुछ नवीनता के पुजारी अति उत्साहित लोगों ने इसका एक शास्त्र ही गढ़ना चालू कर दिया। यह एक तरफ अति यथार्थवाद की ओर ले गई और दूसरी तरफ अतियथार्थवाद की ओर।
हालाँकि इनका कोई ऐतिहासिक क्रम नहीं था।

अति यथार्थवादियों ने लेखन को अचेतन मन का कलाप माना, जो इस कलाप के साथ चेतन मन की कारवाई के साथ समन्वय स्थापित करता है। चेतन मन व्यक्ति बाह्य मन को अभ्यान्तरिक करता है। उसी से अचेतन मन की ग्रस्थावस्था की निर्मिति होती है जो पुनर्सृजन में बाह्य पर एक नई दृष्टि प्रदान करती है। इस में रचना अतार्किक ढंग से विकसित होती है क्यों कि मन हमेशा स्थूल, तार्किक ढंग से नहीं सोचता। संमोहन , स्वप्न, नशा कोटि का अपना तर्क एक अपनी दुनिया होती है। यह सोच माया नहीं होती, भ्रम नहीं होता, यथार्थ का ही वह गोपन पक्ष होता है, जो प्रत्यक्ष में छूट गया होता है। इसकी परिणिति पैरा-फिजिक्स में होती है, जो काल्पनिक समाधानों का विज्ञान है जो परम्परागत ज्ञान द्वारा प्राप्त समाधानों को खारिज करता है। प्रति तर्क, विपरीत मति ‌और बेतुकापन इसका मूलाधार है। इसकी भाथा पैराविनिटी की है जो परंपरागत ध्वनि और अर्थ को आर- पार कर रची जाती है। इसका पात्र स्वयं से ही प्रश्न करता है और स्वयं ही उत्तर देता है जो उसी तक सीमित भी रहता है- सत्यता और उपयोग दोनों में ही। इस पूरे परिदृश्य को सरयिलिज्म कहते हैं। जाहिर है कि यहाँ यथार्थ कहीं नहीं होता जो व्यक्ति बाह्य होता है, जो होता है वह व्यक्ति अंतर है। इसमे मनोविश्लेषण की अपनी भूमिका है। उसकी दो भूमिकाएँ गोचर होती हैं- एक रति की, दूसरी आत्मप्रदर्शन की। अतियथार्थवादी कविता में दोनो का निरुपण है।
शुद्ध कविता से तात्पर्य कविता की उस स्थिति से है , जिसमें वह भव्यता की ओर उन्मुख होती है और इस प्रक्रिया में सभी प्रकार के प्रदूषणों और गंदगियों से मुक्त होती है। यहाँ प्रदूषण और गंदगी से तात्पर्य कविता में दर्शन, राजनीति आदि पर दिए गए जोर से है । दूसरे वह सगीत की ओर मुखातिब होती है। उसमें कविता के कथ्य और उसके शब्दों का बेजोड़ सौंदर्य जिस बात में निहित होता है , वह होता है शब्दों की संवादी ध्वनियों और स्वरों की मधुरता का मेल। इस विचार को प्रतिपादित किया था अमेरिकन कवि एडगर एलेनयो ने और पुष्ट किया था फ्रासीसी कवि बादलेयर ने। आगे चलकर इसकी परणति सौंदर्यवाद की स्थापना में हुई।

सौन्दर्यवाद एक तरफ इन्द्रियों द्वारा ग्रहित वस्तुओं के रूप में सीमित माना गया तो दूसरी तरफ इसे ग्रहण करने वाले व्यक्तियों तक सीमित। कविता इन्हीं दोनों की बिना किसी मिलावट की अभिव्यक्ति मानी गई है। वस्तु नहीं, रुचि प्रमुख बन गई, जो वस्तु को देखने की, महसूस करने की एक विधा थी। इसने स्थापित किया कि हर कला आत्मपूरित होती है, आत्मपर्याप्त होती है, इसलिए उसे स्वयं अपने अलावा अन्य किसी उद्देश्य की ओर नहीं बहकना चाहिए। यानी कला -कविता-स्वयं अपने के अलावा अन्य किसी उद्देश्य की ओर नहीं बहकना चाहिए। उसे उपदेशात्मक, प्रार्थनात्मक, प्रचार प्रणीत या आचारवोधी बनने की कोई जरूरत नहीं। कला कला के लिए होती है और कविता कविता के लिए। कला और कविता का संबन्ध जीवन से जोड़ना बेकार है। इसलिए नैतिकता से भी उसका संबन्ध नहीं हो सकता । स्वयं जीवन को कला की तरह होना चाहिए। यानी कि कविता सीधे -सीधे जीवन का विकल्प है। जीवन को इतना आर्टीफिशल नहीं होना चाहिए जितना स्वयं (आर्ट )। इसका एक अर्थ यह भी है कि कविता में एक बिल्कुल नकली जीवन ( असली जीवन का उल्टा) रचा जाना चाहिए। इस कविता का मूल्यांकन भी कविताई से मिले किसी मानदंड से नहीं किया जाना चाहिए। कवि की भूमिका अपने आप में विशिष्ठ होती है। शायद यही मनोवैज्ञानिक कारण था कि कवि आधुनिक काल में "बोहेमियन" "नान-कन्फार्मिस्ट" के रूप में अपनी पहचान बनाया़। यह रुमानी आत्मवाद और आत्म-संस्कृति की देन की।

खैर सौन्दर्यवाद आगे बढ़कर उस काव्य -संगीत से जुड़ गया , उस सार से जुड़ गया, जिसे व्यक्त करने की इच्छा कवि की अपनी थी। मलार्मे, रिंबाबरलेन, वलेरी सभी ने इस तरह की शुद्धता की संभावना कविता में खोजी़। इसकी परिणति प्रतीकवाद में हुई। प्रतीक एक ऐसा मूर्त या अमूर्तवस्तु है, जो किसी अन्यवस्तु का प्रतिनिधित्व करता है या उसे व्यक्त करता है। उसकी पहचान व्यक्त में विशिष्ट की अर्धपारदर्शिता से होती है। वह रूपक से इस अर्थ में भिन्न होता है कि प्रतीक का अस्तित्व वास्तविक होता है, जबकि रूपक का चिह्न स्वेच्छाचारी बिचौलिए का होता है। यह संकेत से भी भिन्न होता है। संकेत तो जिस के बारे में कहा जा रहा है और जो कहा जा रहा है, उसमें एकता स्थापित करने को होता है। लेकिन प्रतीक में एक के भावमय से दूसरे बात की जाती है। अब शब्द स्वयं ही प्रतीक हैं, तो भी कविता में शब्द एक बिम्ब और अवधारणा को स्युक्त कर बनता है। ये व्यक्तिगत भी हो सकते हैं और सार्वजनिक भी। उनकी एक व्याख्या भी हो सकती है और अमूर्त भी। ये संरचनात्मक भी हो सकते हैं।सर्जनात्मक भी। उनकी व्याख्या भी हो सकती है और एक से अधिक भी। वे मूर्त को अमूर्त कर सकते है और अमूर्त को मूर्त । वे भावनाओं और विचारों को पहचानने के लिए प्रयुक्त हो सकते हैं, और उससे बचने के लिए भी हो सकते हैं। वे क्षणिक और मृत्य के बारे में हो सकते हैं तो प्रारंभिता के बारे में भी। हर प्रतीक का एक सहसंबन्धी होता है, जो कहीं घटनाओं की शृंखला के रूप में हो सकता है, तो कहीं स्थिति के रूप में हो सकता है। कहीं वस्तुओं के शृंखला के रूप में हो सकता है जो उस विशिष्ट संवेग की सूत्रवत पहचान कराये।

इसी से निकल कर इमैजिस्ट ग्रुप की कविताएँ आईं। यह ग्रुप मानता था कि कविता के लिए स्पष्ट और कठोर बिम्ब बहुत जरूरी होता है। इससे रचित बिम्ब विधान का मतलब है वस्तुओं , भावनाओं , विचारों, चिंतन, मनोस्थिति, कर्म कोई भी एन्द्रिक या या पराऐन्द्रिक अनुभूति की भाषाई अभिव्यक्ति , उसका भाषाई प्रतिनिधान, उसका मनव्यापि छवि होना जरूरी नहीं। वह शाब्दिक हो सकता है, अवधारणात्मक हो सकता है। दिग्दर्शित करने वाला हो सकता है। यूँ तो बहुत से बिम्बों का निर्माण आलंकरिक भाषा में होता है, लेकिन उसे रोजमर्रा की भाषा में भी आसानी से पाया जा सकता है। बिम्ब सभी पंच इन्द्रियों के होते हैं-स्वाद, गंध, रूप , स्पर्श, रंग , श्रवण सभी के। इसे अपनाने वाले कवि को आपनी कविता की विषय वस्तु के चुनाव के लिए स्वतंत्र रहना चाहिए और किसी भी विषय पर कविता लिखने में समर्थ होना चाहिए। हिन्दी में केदारनाथ अग्रवाल इनके अच्छे प्रयोक्ता थे। रूस में भी यह थोड़े दिन तक प्रचलन में रहा, जिसका प्रयोग कवि लोग शाक देने के लिए और हो हल्ला मचाने के लिए करते रहे।

इन सारी निर्मितियों में कल्पना की भूमिका बड़ी होती है, जो तर्क शक्ति को पार कर एक नई दुनिया रचती है। इसका जन्म प्रयत्न मति से होता है और यह अन्तर्दृष्टि प्रदान करती है। वह ऐसे रूपों की सृष्टि करती है, जो वास्तविक जगत में नहीं मिलते। जो मिलते हैं उसका रूपान्तर कर देती है। हाब्स कहता है कि सब प्रकार का ज्ञान इन्द्रिय अनुभव से प्राप्त होता है। मन उन्हें बोध में बदल देता है। वस्तुओं के बिम्बों से स्मृतियाँ बनती हैं। उसी से एक तरफ विवेक , तो दूसरी तरफ कल्पना का सृजन होता है। विवेक से निर्णय उपजता है जो शक्ति और संरचना प्रदान करती है। कल्पना से कविता और उसका अलंकरण प्राप्त होता है। कल्पना वस्तिओं में और उनके बिम्बों में समरूपता तलाश करती है, जबकि विवेक उन्हें वर्गीकृत करता है, अलग -अलग करता है, अलग -अलग खानों में डालता है। विवेक कल्पना को बाधित करता है, उसे अनुशासित करता है। लाक कल्पना को " एसोसिएशन आफ आइडियास" में पाता है। एडिसन कहता है कि इसका अनुमान या अर्थसूचन उतना ही मत्वपूर्ण होता है, जितना सूचक उपलक्षण । पहले लैक फिर बादलेयर ने इसे कवि के अंभंयंतर के कूट संकेतों और प्रतीकों को निकूट करने के संसाधन के रूप में लिया , जो न केवल कविता को जन्म देती है , उसे अर्थ भी देती है। इसलिए कवि को विवेक सम्पन्न नहीं कल्पनाशील बनने की जरूरत है। यही मानवीय क्षमताओं का सम्मिलन करता है, उसे जादू बना देता है। कल्पना एक आभ्यन्तरित और शाश्वत भाषा है। जो देश और काल से उबर कर आती है, जो वस्तुओं के, बिम्बों के, भावनाओं के, सोच के, इच्छा के, मन की व्यथा के सम्मिलन को संभव बनाती है। यह चैतन्य लालसा का सहवर्ती है, संगठन कर्ता है, जो फैलाव देता है। कहीं अपव्यय भी करता है और विसर्जित भी करता है, पुनर्रचना के लिए।


शुद्ध कविता यानी प्रतीकवाद और अतियथार्थवाद ने संयक्तरूप से आलोचनात्मक यथार्थवाद को अपनाया और आलोनात्मक यथार्थवाद ने जादुई यथार्थवाद को।

कविता की इन रीतियों को समझने के लिए जरूरी है कि यथार्थवाद को भी थोड़ा समझ लिया जाए। इस दौर कविता के मूल्याँकन में बार बार आने वाला शब्द यथार्थ है। इसे यथा तथ्य से लगाया जाता है। यथा तथ्य उसे कहते हैं जो है पर बिना किसी गति की दिशा में। यानी उसमे गति तो है, पर उस गति की दिशा नहीं वह अराजक ढंग से आगे पीछे उपर नीचे कहीं भी जा सकता है। यथार्थ वह है जिसकी गति की दिशा है। यानी वह दिशा पूर्व निर्धारित है। उसे इतिहास से समझा जा सकता है। इतिहास की दो अवधारणाएँ हमारे समय में व्याप्त हैं। एक मानती है कि वह एक सीधी रेखा में एक निश्चित लक्ष्य की ओर बढ़ती जा रही है। कुछ विचारक कहते है कि वह लक्ष्य पूर्व प्रदत्त नहीं है, उसे हम जानबूझ कर निर्मित करते हैं। दूसरी अवधारणा यह है कि इतिहास की गति चक्रात्मक है। जो पहले हो चुका है वह फिर कभी न कभी जरूर होगा, भले ही उसका पहचाना जाने वाला रूप काल क्रम में काफी बदल गया हो.. वैसा हूबहू न हो। दूसरे कहते हैं कि वह अनुरूप या असल होती ही नहीं, बस हम अपनी इच्छा से खोज लेते हैं। जो भी हो , ये दिशाएँ अग्रगामी भी हो सकी हैं और पुरागामी भी। साहित्य का इन्हीं दिशाओं का खुलासा करने का होता है। जो साहित्य पुरागामी गति को लेकर लिखा जाता है उसे प्रतिक्रिया वादी कहते हैं। जो यथा तथ्य को लेकर लिखा जाता है उसे यथा स्थितिवादी कहते हैं। अग्रगामी के दो रूप हैं जो उपरोक्त दो इतिहास दृष्टि की देन है। जो चक्रात्मक ढंग वाले हैं वे खुलासा करते हैं कि जो आज है, वह पहले भी कभी था‌‌ ‌और जो आएगा ,वह पहले भी कभी आया था। यह बात और है कि आगे आने वाला हूबहू वैसा नहीं होगा, इस बीच मानवता जो अनुभव किया है उसकी भी स्पष्ट छाप उस पर होगी। जो सीधी लकीर में बढ़ते देखते हैं , उनमें मार्क्सवादी प्रमुख हैं, जो जगत को वर्गहीन समाज की ओर बढ़ते हुए देखते हैं और चाहते हैं कि इस समाज की स्थापना जल्द से ज्लद हो जाए। उसे बलात जल्द लाने के लिए सब कुछ को उसी के आधीन कर दिया जाना चाहिए। इन तमाम तरह की प्रतिछाया की चर्चा आधुनिक कविता में तरह तरह से हुई है। आलोचनात्मक यथार्थवाद ने मनोवैज्ञानक रूप से आदमी के भीतर क्रियारत गति या शक्ति का स्वतः रचनाकार के द्वारा प्रस्तुत खुलासे को देखना आँकना चाहा, जिसे सिर्फ प्राकृतिक या स्वाभाविक रूप से किसी बाहर के आदमी द्वारा देखा जाने पर संभव नहीं था। वास्तविकता यहाँ एक स्थिर प्रत्यक्ष न होकर एक मनोवैज्ञानिक गतिशीलता के रूप में लक्षित हुई जो सामाजिक गति को संकेतित करती लगी। रचना उसे ही चेतन प्रतिबद्धता के साथ वर्णित करने वाली बनी। रचनाकार ज्यों ज्यों चेतना के इस प्रवाह का इस्तेमाल ‌और गहराई और विस्तार से करते चले गए त्यों त्यों वह कामेक्षा और रति भूख की चर्चा में तब्दील होती गई। जहाँ यह नहीं हुई वहाँ अंतर का खोद बगोद जैसे गंदी नाली के कीड़ों का शास्त्र नता गया। दोनो ने ही कला को पतनशीलता में ढकेल दिया। इसने चेतन, अचेतन और अवचेतन के सीमा क्षेत्रों में एक तरह की बड़ी अव्यवस्था पैदा कर दी। जिसके परिणाम स्वरूप तमाम पतनोन्मुखी साहित्य रचा जाने लगा। उस पर कुछ कहने से पहले जरूरी है कि जादुई यथार्थवाद पर थोड़ी चर्चा कर लें।

जादुई यथार्थवाद ने क्रियेशनिज्म को जन्म दिया। वह कविता की एक अपनी शब्दावली बनाने पर जोर देता है। जिसमें चौंकाने वाले रूपक हों। उन्हें रचना में इस तरह से सटाकर रका जाए , जिससे कि वे स्वाभाविक लगने लगें। भाले ही वस्तु का कोई वास्तविक अस्तित्व न हो। जिससे अनुभूति की अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति के माध्यम की सीमा से बाहर निकल जाए, दूर निकल जाए। इसके लिए कवि रचना मे जुदा जुदा घटनाओं की संवृत्ति डालता है। समाज की भाषा की जगह व्यक्तिगत भाषा का प्रयोग करता है। यह अभिव्यक्ति वाद को जन्म देता है, जो मानता है कि अभिव्यक्ति ही रूप का निर्माण करती है। इसलिए कल्पना, बिम्ब योजना, विराम चिह्न, वाक्य विन्यास, सभी कुछ अभिव्यक्ति की वेदी पर बली चढ़ाए जा सकते हैं। इससे यथार्थ जादुई बनता है, और वह जादुई यथार्थ होता है, जो वास्तब में यथार्थ का विरोधी होता है वह आन्तरिक मनोवैज्ञानिक वास्तविकताओं का निर्माण करता है। इसमें दो छोर के कवि हमारे सामने आते हैं। एक ब्रेख्त हैं जो क्रान्ति की ओर उन्मुख हैं दूसरे बर्खेस और नेरुदा हैं जो " नेर्डसैट" की शब्दावली का रचना में प्रयोग करते हैं और क्रान्ति विमुख हैं

इस रीति की दूसरी कविता उन मार्क्सवादियों की थी , जो रूस की तानाशाही का विरोध करते थे। उनका दर्शन सामाजिक यथार्थ का था ‌और उसके प्रणेता जार्ज लुकाच थे। उन्होंने प्रत्यक्ष के आलोचनात्मक सिद्धान्त का विकास किया और माना कि साहित्यिक कृति उस व्यवस्था का प्रतिबिम्बन करती है जो धीरे धीरे अपने को खोल रहा होता है, प्रकट कर रहा होता है, प्रत्यक्ष करा रहा होता है। कृति का काम अस्तित्व के संपूर्णता को उसके समस्त विरोधाभासों तनावों और संघर्षों के साथ सामाजिक व्यवस्था के भीतरी तहों में हमें अवगत कराना होता है। चूँकि लुकाच का जोर कथ्य पर था , इसलिए उसने रूप तकनीक साहित्यिक कौशल , प्रतिभा , कल्पना शक्ति और नई रीति को उपेक्षित रखा। परिणाम स्वरूप दूसरे प्रगतिशीलों से, चाहे वे मार्क्सवादी हों या आधुनिकतावादी अलग थलग रहा। जैसे ब्रेख्त और एडोर्नो ,ब्रेख्त का कहना था कि हमे किसी विशेष कालखण्ड की वास्तविकता की जगह उसे सम्पूर्णता में देखना चाहिए, जिससे कि साहित्यि का अपना स्वयं का यथार्थवाद रचा जाए। यानी चूँकि मानसिकता बदलती रहती है , इसलिए उसे व्यक्त करने के ढंग भी बदलते हैं। एडोंर्नो ने तो वास्तविकता के सिद्धान्त को खारिज कर दिया... जर्मनी की फासीवादी सरकार और अमेरिका के मास कल्चर तथा व्यवसाय परस्ती का अनुभव ही ऐसा था। और कहा कि साहित्य का यथार्थ से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता। मार्डनिज्म इसलिए ठीक है क्यों कि वह रचना को वास्तविकता के पार ले जाता है। " कला विश्व का नकारात्मक ज्ञान है़" इसी को विस्तार देकर मारकूज ने कहा कि कला का स्वायत्त निर्माण दलन करने वाले समाज को नकारता है। इसलिए हारखेमर ने आँवागारंद को समर्थन दिया था, क्यों कि वह दलन के प्रति निष्क्रीय शरणागति और राजनीतिक यथास्थिति का सकारात्मक विरोध करता है। ये तमाम चिन्तन लुकाच के किसी काम के नहीं थे। लेकिन लुकाच का व्यक्तित्व छलावों से भरा हुआ था। ऊपर से मार्क्सवाद का समर्थन करते हुए भी भीतर ही भीतर वह पूर्वी यूरोपीय देशों रूस के निमंत्रण ‌और मार्क्सवाद दलन का विरोध करने वाला था। इसलिए वह ऐसे साहित्य का समर्थन भी करता था। दरअसल अच्छा साहित्य प्रोटेस्ट में ही लिखा जाता है। यह अकारण नहीं है कि आख्मातोवा, स्वेताइवा, पास्तरनाक, ब्रादस्की, होलुब, रोजेविच, ब्रेख्त रूस और पूर्वी यूरोप में अधिक सदी और बेहतर कवि के रूप में उभरे।

तीसरी कविता उन देशों में सृजित हुई, जहाँ मार्क्सवाद आया ही नहीं था। लाने के लिए चर्चा जरूर हो रही थी। इसके दो रूप थे... एक विकसित देशों का , दूसरा तीसरी दुनिया के पिछड़े और विकासशील देशों का। विकसित देशों के एक प्रवक्ता वाल्टर बेंजामिन थे, जिन्होने एडोर्नो के विपरीत मास कल्चर को स्वीकार किया तो दूसरी तरफ ब्रेख्त की स्थापनाओं को। उन्होंने टी. वी , रेडियो, सिनेमा , फोटोग्राफी , अखबार वगैरह के माध्यम से हो रहे सांस्कृतिक परिवर्तनों की वकालत की कि इनसे कुलीनता की संस्कृति नष्ट हो जाएगी , और मीडिया के प्रचार से साम्यवाद आएगा। बेंजामिन दरअसल अरबन संस्कृति के प्रवक्ता थे और क्रान्ति में नही, संक्रमण में विश्वास रखते थे, इसलिए विकासशील देशों के मार्क्सवादियों के किसी काम के नहीं थे। इसी तरह गोल्डमान ने होमोलोजी के सिद्धान्त का विकास किया जिसमें उन्होंने साहित्य , विचार और सामाजिक भ्रम के भीतर संरचनात्मक समानान्तरता को खोजना चाहा और कहा कि साहित्य के पाठ व्यक्तिगत न होकर सामाजिक होते हैं, परा . व्यक्तिगत मानसिक रचनाएँ होते हैं जो एक समुदाय या वर्ग से सम्बन्धित होते हैं। लेखक उन्हें ही खोज कर पुनः सृजित करता है। इसी तरह अस्थूसर ने कहा कि सामाजिक निर्मिति में कई कई स्तर होते हैं, और उनमे अन्ततः कोई एका नहीं होता है। यह स्तर स्वायत्त होता है। ऐसा हो सकता है कि एक लेवेल एक विशेष देश, काल और परिस्थिति में दूसरों पर हावी हो जाए, अधिक दबंग के रूप में व्यवहार करे। जब साहित्य उन्हें उकेरता है तब वह किसी विचारधारा को नहीं उकेरता, न ही वास्तविकता का अवधारणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। हाँ शक्ति के सोपान जरूर निर्दिष्ट करता है। क्रिस्टोफर काडवेल ‌और रेमाण्ड विलियम्स ने भी जो सिद्धान्त रखे , वे इन्हीं सिद्धान्तों की तरह विकासशील देशों के मार्क्सवादी दृष्टि से किए जा रहे साहित्य चिन्तन के लिए बहुत सटीक नहीं थे। चूँकि इस पुस्तक में उन देशों के कवियों की चर्चा नहीं है, इसलिए मार्क्सवाद की तीसरी रीति की चर्चा यहीं रोकते हैं।

तो भी इतना कहना शेष रह जाता है कि चूँकि मार्कवादी कविता एक दर्शन को ध्यान में रख कर लिखी गयी, इसलिए इसमें काव्य सौन्दर्य नहीं के बराबर आया, सामान्य जन की समझ ठीक और समृद्ध कर देने का दावा उसमें चाहे जितना हो। जिनकी कविताओं में आया वे मार्क्सवादी सिर्फ इसलिए रहे क्योंकि वे दल के या उसके अनुसांगिक संगठन के सदस्य थे। अन्यथा जिसे मार्क्सवाद कहा गया , उसके सारे लक्षण उनकी कविता में मौजूद रहे।
यूरोप की इन तमाम कविताओं का उद्देश्य था थार सत्ता में साझेदारी। टाम्स द क्विंसी ने लिखा था " एक साहित्य ज्ञान का होता है दूसरा शक्ति का। पहले का उद्देश्य शिक्षा देना होता है, दूसरे का चलाना। पहला पतवार होता है, दूसरा पाल, डाड़ और लग्गा। पहला एक सरल समझ पैदा करता है, दूसरा गहरी समझ और विवेक, लेकिन हमेशा ही सुख और सहानुभूति के माध्यम से।" आधुनिक यूरोप में जो कुछ भी लिखा गया है, चाहे वह संवेगों को उभार कर हो या सोच को धक्का देकर , सत्ता में हिस्सेदारी के लिए लिखा गया। पार्टी के कार्यकर्ता मार्क्सवादियों ने तो साहित्य को सत्ता में आने का एक साधन माना ही। जो कार्यकर्ता नहीं थे और जो साहि्त्य को साधन नहीं साध्य मानते थे, उन्होंने भी इसका उपयोग इसी के लिए किया। और कुछ नहीं कर पाए तो जो सत्ता में थे उनका विरोध किया। इसके लिए जरूरी था कि साहित्य को स्वायत्त माना जाये। जिन्होंने सीधे सीधे मान लिया उनकी बात करने की बजाय मैं उनकी बात करता हूँ , जिन्होंने पार्टी अनुशासन को स्वीकार करने के बावजूद साहित्य के स्वायत्त होने के लिए कुछ नये तर्क गढ़े। उनमें से कुछ की चर्चा , ब्रेख्त, गोल्डमान, एडोर्नो, हारखेमर, मारकूज, अल्थूसर, की चर्चा ऊपर कर आया हूँ। आगे यह कहना है कि मार्क्स ने स्वयं साहित्य का कोई सिद्धान्त नहीं रचा। उसके यहाँ वहाँ के लेखन से इतना जरूर जाहिर होता है कि उसने साहित्य और कला के क्षेत्र को तुलनात्मक रूप से स्वायत्त माना है। उसे विकसित करने की बात एंगेल्स ने की है। लेकिन सत्ताधारियों ने उसे विकसित करने की बजाय नष्ट कर दिया। अल्थूसर ने उसे जरूर विकसित करना चाहा। कहा कि कला सौन्दर्यपरक होती है और यदि वह सौन्दर्य कहीं विचारधारा के बरखिलाफ दिख जाता है तो इसलिए कि उसकी दुनिया अपेक्षाकृत स्वायत्त होती है। इसलिए कि उसमें तात्कालीनकता से बढ़ कर दूरगामिता के तत्व होते हैं, जो हो सकता है कि दिये हुए परिपेक्ष्य में विचारधारा से अभी भिन्न हो। हो सकता है कि वे आगे एकमेव हो जायें। अभी जो आर्थिक स्तर पर दृष्यमान है, उकेरी गई कलाकृति हो सकता है कि उससे स्वतन्त्र हो ‌और इसलिए सापेक्ष। आर्थिक संबन्ध राज्य कार्यप्रणाली के रूप में हो लेकिन कलाकृति उस पर एक लाभ, एक छलावे के कप में । इसी को विकसित करते हुए माशरे कहता है कि साहित्यिक पाठ अपनी मिथ्यंक्रम और रूप के कारण विचारधारा से दूरी बना लेता है। पंक्तियों और शब्दों के बीच व्याप्त रिक्तियाँ, अल्पकथन, अकथन, भी यही काम करते हैं। ये चुप्पियाँ, ये रिक्तियाँ न केवल कुछ छिपाती हैं , बल्कि जाहिर भी करती हैं तमाम वैचारिक विरोधों को़। वे अचेतन में दबाती भी हैं। वह लिखता है " there is a conflict within the text, between the text and its idelogical content" । आलोचना का काम उनका भेद खोलना होता है। इसलिए उसका " sub text" होता है। यही अन्ततः शक्ति में , सत्ता में सहभागिता प्रदान करता है।
इसी को विकसित कर टेरी कहता है कि आलोचक का काम विचार धारा ‌और साहित्य के संबन्ध को उभारना होता है। ऐसा उन कृतियों में अधिक संभव है जो पहले से ही किसी विचारधारा से प्रतिबद्ध होकर नहीं लिखीं गईं हैं। यानी कि रचना का अपना संसार स्वायत्त है । पाठ वास्तविकता का प्रतिबिम्बन नहीं करते, बल्कि वास्तविकता के प्रभाव (दोनों ही effect and impression) निर्माण में विचारधारा को प्रभावित करते हैं। यहाँ विचारधारा का मतलब सिर्फ मार्क्सवाद या मात्र कोई अन्य राजनीतिक विचारधारा नहीं होता, प्रतिनिधित्व के वे सभी सिद्धान्त और पद्धत्ति होते हैं जो व्यक्ति के अनुभव चित्रों को पूरा बनाने में सहायक होते हैं। आलोचक यदि विचारधारा को पाठ में खोजता है तो वह पाठ के बाहर उसका मुल्यांकन भी करता है।
इसे थोड़ा और आगे बढ़ा कर फेड्रिक जेमसन कहता है कि पाठ में बहुत कुछ राजनैतिक रूप में अचेतन रहता है, जो व्याख्या के दौरान जाग उठता है। वह वह " sub text" होता है , जो ऐतिहासिक और वैचारिक रूप में अनकहा होता है। उसको कहने के दौरान शक्ति में , सत्ता में हस्तक्षेप या सहभागिता उपजती है।
यूरोप के ये तमाम कवि ये ही गोचर कराते है



 


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