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सोनेट मंडल की कुछ कविताएँ
ईंटों का इलाका
यह बच्चे कौन हैं
जो अध जले ईंटों के पीछे बैठे हैं
लगता है ईंटों को पकाते गोल गर्म चिमनी ने
इनके भविद्गय को बरबाद किया है
नंगे बंदन विस्मय से
अपने मां बाप को काम करते हुए देख रहे हें
वे खाना लाते हैं
और इनको इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए
उनके सिर ईंट में तब्दील हो गए हैं
जो मोटर और गरीबी के रेत से पकाए गए हैं
अनुवाद - संतोष
अलेक्स
(सोनेट मंडल की अन्य कविताएँ )
राजेन्द्र नागदेव
इतिहास
इतिहास इतना उलझ जाता है अक्सर
जैसे पहली बार कोशिश कर रही बच्ची के हाथों
सलाइयों में फँस कर उलझ जाती ऊन
और अनबुना रह जाता है स्वेटर
जिसे बुरे मौसम के सबसे बुरे दिनों में
हिमानी हवाओं के प्रतिरोध में
निभानी होती है एक समर्थ कवच की भुमिका
उसे कर दिया जाता है उलझने पर विवश
इतिहास अपने आप में यूँ कभी उलझा हुआ नहीं होता
ऊन का उलझा हुआ वह गोला है इतिहास
जिसके सिरे को
अलग अलग ध्रुवान्तों पर खड़े
वे...और वे.. और वे
खोजते हैं अपने अनन्य तरीकों से
झाँकते हैं गोले के अँधेरे अंतरंग में
अलग अलग आकारों और अलग अलग लम्बाइयों वाली
अपनी अपनी विशिष्ट दूरबीनों से
देखते रहते हैं
मात्र उतना और वही
जितना और जैसा वे चाहते हैं कि दिखता रहे
देखने की उस प्रवृत्ति
और शोध करने की
अन्तहीन और दिशा हीन बाजीगरी में
उलझती जाती है ऊन
अधिक और अधिक और और अधिक
और शोधातुर मुण्ड स्वयं
गोले की गलियों में लुड़कते हुए
अन्ततः जाने किस तरफ निकल जाते हैं।

मनुष्य और इतिहास का परस्पर उलझाव
इतना अभिन्न हो जाता है कभी कभी
अक्र इतना मोहक और मादक
कि उससे मुक्त होना
"असम्भव" के दायरे में चला जाता है
पर बन्धु! महत्र सत्य यह है
कि इतिहास के सुलझने जैसी कोई घटना
वर्तमान अथवा भविष्य में कभी घट जाए
ऐसा कोई चाहता भी नहीं
वर्षों से मेरे मन में एक जिज्ञासा है
अगर ऐसा हो कभी
कि मुमताजमहल और शाहजहाँ
इतिहास की कन्दरा से बाहर
खुली हवा में साँस लेने निकल आएँ
तो पूछूंगा उनसे कि क्या उनको भी कभी ऐसा लगा
कि जिस धवल संगमरमरी कब्र में
लेटे हुए हैं सदियों से वे निश्चिंत
वह कब्र नहीं
महल है राजपूत राजा का
और वे दोनों महज अवांछित आतयायी हैं वहाँ!
(राजेन्द्र
नागदेव
की अन्य कविता )
प्रेम रंजन अनिमेष
चिरनव
पास से गुजरते अकसर
कभी दूर से बाहें फैलाकर
रोक लेता आम का वह पेड़ पुराना
हर बार
मिलता हुँ मैं उसे
जैसे पहली बार...
घाम
कब के तपे हैं ये
पहली बारिश के बाद ही
बरेगा इनमें रस
बून्दों से तिरेगी मिठास
उस पर भी
सुबह भिगोकर रखना
तो हक लगाना शाम
नहीं तो लग कजाएगा भीतर का घाम
फल
इतने ऊँचे कद वाले वृक्ष
और फल
इतने जरा से इतने विरल
और ये छोटे गाछ भूमि से लगे
फल जिनके हाथों को चूमते
लदराये गदराये झमाट....
दाय
मिट्टी ने उगाया
हवा ने झुलाया
धूप ने पकाया
बौछारों ने भरा रस
नहीं सब नहीं तुम्हारा
सब मत तोड़ों
छोड़ दो कुछ फल वृक्ष पर
पंछियों के लिए
पंथियों के लिए.....
परिचय से साभार
किलिमानूर मधु
(मलयालम के कवि)
मुमताज़ के घाव
रमज़ान के दिनों लिखना मना है
कोई नहीं लिखा करता
रोज़े के दिनों
मन को साफ रखने का वक्त है यह
फिर भी लिख रहीं हूँ , भाई जान!
आखिरी खत होगा,यही सोच
हर बार खुलासा कर लिख देती हूँ
अब्बा भी तक लौटे नहीं
अम्मी बिस्तरे पर ही पड़ी हैं
फालतू पड़ी इस हाउस बोट में बैठी मैं
डरती हुई ये खत लिख रही हूँ
अब कभी मुलाकात नहीं होगी
कभी भी नहीं, जानती हूँ
भाई जान! मुझसे यह सहन नहीं होता
कुछ करना अपने बस में नहीं है
फिर भी मन में भरोसा है कि
लौटती डाक से जवाब मिलेगा
खत डालने जाती हूँ तो
डाकिया पूछता है
कौन है ये तुम्हारा?
मैं अनजाने ही सुलग उठती हूँ
हम आपके के कौन हैं?
इस बार न जाने कैसा रमजान बीते
पिछली बार वे ब्बा को ले गए
मस्जित में छिपाए गए औजार
शुक्रवार को ही खबर मिलती
जिन्दगी को जिलाने वाला एक शब्द
वो भी पहरण करने वालों की दया से
जिन्होंने ब्बा का बाँध रखा है
अम्मीजान ने आखिरी चीख के बाद
एक रख भी नहीं कहा
फटी निगाहें, डबडबाई आँखे
या फिर कुछ सिसकियाँ
तब से उस टूटेफूटे बोट के चप्पू को
स्मारक बना कर रखा है
वही चप्पू जिसे चलाते
हम चक्कर लगाया करते थे
झील पर वह साँझ..
नहीं ब तो बस अंधेरा है
भूख न होते हुए भी भूखी हूँ
उस काफिर को खत लिख रही है?
अब्बा मज़ाक उड़ाया करते
फिर कहते
शायरों पर अल्ला का रहम होता है
फिर भी अब्बा को न जाने क्या डर था
भाईजान ! बड़ा मुश्किल है इस जिन्दगी को समझना
खबरों में सब कुछ शान्त है
हवा में जंग की बू बसी है
दुश्मनों की बैरके और बन्दूके
छिपी हैं दुश्मनों की तरह !
( कविता के आगे)
रामाज्ञा शशिधर

जर्जर नैया
इतनी जर्जर नैया में हम
कैसे करेंगे प्यार
काली नागिन सी यह नदिया
रह रहकर फुंफकार रही
जर्जर काठ की काया पर
लहर की जिह्वा मार रही
मौसम की साँसों पर है
पछुआ पवन सवार।
मल्लाहों के नन्हे सपने
उतरे हैं खेवनहार बने
आंखों टंगी भकाटे में
डैनों पर चंचल हाथ तने
इनकी इच्छा सी कोमल है
सदियों की पतवार।
पंदित मुल्ले घाट सीढ़ियाँ
अविरत आँख तरेरे
घंटा शंख आरती कीर्तन
जबरन हमकों टेरे।
जर्जर नैया कौन खेवैया
कौन लगाए पार।
परिचय से साभार
(रामाज्ञा शशिधर
की अन्य कविताएँ)
किस उजास की ओर?
मृत शक्तिहीन नहीं होते
आसमान
कल तक भीगभीग जाया करता था
आँसुओं से मेरे लोगों के
आज साफ है
नामों निशान नहीं
गुलाबी निशान का
हो सकता है कल बरसे
सफेद आँसुओं का अर्थ समझे
आज सन्नाया है
तूफान गुजरने के बाद सा
जमीन
धीरेधीरे घिरती जा रही हैं
सफेद जंगली घास से
बच रहे इक्के दुक्के मेरे लोग
टूटे दरख्त बने,
तुम्हारा विधाता खरीदना चाहता है इसे
ज्वालामुखी के मुंह से खींच लाए थे मेरे पुरखे जिसे
काले सोने में बदल दिया था जिन्होंने
तुम्हारा वायदा है कि
तुम भर दोगे हमारी टोकरियाँ
सुनहरे सिक्कों से
जिन पर खुदा है सिर तुम्हारे मालिक का
इस तरह तो हमे भी शामिल कर लोगे
अपने मालिक के गुलामों में
मैं जानता हूँ कि
वह वक्त बीत गया जब हम
काली चादर पर टंगे तारों से जगमगाया करते थे
सागर की लहरों सा उगमगया करते थे
हमारे मुखौटे अनबोले बोल करते थे
तुमने ढकेल दिया जंगल में हमारे पुरखों को
यहाँ तक कि उनके दिल काले कोयले से दहकने लगे
युवकों के चेहरे पर खिंची लकीरें गहरी होने लगी
उनकी क्रूरता को तुम्हारी क्रूरता ने कुचला
अनजाने में दुखी होते रहे
पीछे छूटे बूढ़े बेबस और माताएँ
तुमने जो कुछ भी पाया
हमने खोया था
यहाँ तक कुछ भी नहीं बचा खोने को
तुम्हारे पिता
वाशिंगटन में बैठ
हमे पालना चाहते हैं
तुम्हारे राजा
हम पर शासन लादना चाहते हैं
वे वायदा करते हैं

कि भगा देंगे
हमारे दुश्मनों हैदास और त्सीमशीयन्स को
ये तो वे ही जाने कि
भगाएंगे या शामिल होंगे दुश्मनों में?
तुम्हारा खुदा तुम्हारा है
वह प्यार करता है सफेद चमड़ी से
वह नफरत करता है लाल चेहरों से
वह तुम्हे मोम सा मज़बूत बनाएगा
वह हमे सागर में डुबोता जाएगा
हमारे देव जंगलों में बसे हैं
वे भी उजड़ते जा रहे हैं जंगलों के साथ
तुम कहते हो हम एक हैं
मैं जानता हूँ कि
तुम तुम हो
रति सक्सेना
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