अय्यप्पा पणिक्कर की  लम्बी कविता

(गतांक से आगे)

कुरुक्षेत्र



तीन

क्यों आ पैदा हुए धरा पर
कंकाल, घूरती पहाड़ियों पर?

सीता को जंगल में छोड़ने के लिए?
लंकओं को रावण राजा का ख़ून पीना है?
कौन विभीषण, कौन सुग्रीव यहाँ?
वसिष्ठ ही क्या सही बातें सिखला सकते हैं?

सब सोच समझ कर देखें
क्या बचा है राम की ज़िंदगी की झोली में?
झूठी हैं वे सब बातें जो काल ने कहीं
फूस सी जलती हैं चाणक्य की सूक्तियाँ।

नीति के रोते हुए गीता
सुनने वाला अर्जुन नहीं मैं
फिर से इस ज़मीन पर अंकुरित
दर्द का एक घोंसला हूँ

रेंगते रहते हैं मुझमें
व्यक्त अव्यक्त मोह
दूर चौराहे पर पिता को मार
माँ से ब्याह रचाया मैंने
क्या समझ पाओगे
मुझ कमज़ोर की जीवन नाड़ियाँ
धड़कातीं हैं नाद विभ्रांतियाँ।

सत्य पहचानने वाले विदुर की
दावत ने व्यास की आँखें खोलीं
नित्यता ने मौन भजन किया
देवता सो रहे हैं
फिर से पुराणों में जन्म लेने को।

चार

छिपोछिपो इस्पाती यादों
विस्मृति दादी की छाती की झुर्रियों!
अंधेरे और परछाइयों को पनी करुणा से
उजाला देने वाले वाले दिनरात

एक दरवाज़े के दो पलड़े जैसे
एक के बंद होने पर दूसरा खुलने वाला,
कभी वक्त आएगा कि
दोनों साथसाथ बंद हो जाएँगे
तब हमारे जलते स्वप्न
विस्मृतियाँ बन जाएँगे

केवल एक दिव्य निवृत्ति जैसे
रोती हुई धरती के निश्र्वास जैसे
उस सुंदर शुद्घ शून्यता युक्त बचपने में
तूने आकर नीली आँखों से छाँह दी।

बुढ़ापे को आसरा देने वाला जवानी का प्रेम
मूर्ति बना, कोमल होंठों का चुंबन बना
मिट्‌टी में स्वर्ग देख आँखें बैठी हैं
बरामदे में दाँते निपोरती हुई मौन।
हमने देखा जो नव स्वर्ग, वह झुलस गया
विश्र्व बैंक क्या इससे भी ज़्यादा सच्चाई जानता है?
पुराने किसी सपने की संतति बन जन्मे विश्र्वास
ग़ायब हो गए अंतिम संदेश देकर

आम सभाएँ आवाज़ कसती हैं
बकवास के साथ ख़त्म हो जाती हैं
चारों ओंर से सारे स्वर्ग नीचे और नीचे
झुक रहे हैं/ तो कोई है जो नमक चखे?
सहारा देने को कोई है?

पागल हो जाए हम, प्रेमी बने पने सपनों के
प्राप्त करने को पने लक्ष्य
पना रास्ता बनाए पने हाथों?
सही रास्ता देखें पनी आखों से
जिस पर चलें हमारे पाँव।

आगे क्या? पीछे क्या? इन सवालों से
लड़ते रहे?, या जीवन सौभाग्यों को आकर्षित करें?
घटनाएँ, जिन्हें हम समझते हैं कि वे बनी है हमारे लिए
संदेह करें उन्हें कुतरते काल पर।

कोमल विचारों से गुँथे लोक माँ के थन जैसे
हमें लुभाते हैं/ तो,
चलो हम मर जाए प्रेम सिखाने वाली प्यास से
जीवन संगीत की मूल जड़ तड़पती है/ तो

अच्छाइयाँ बुराइयाँ सृष्टि के लिए मर मिटती हैं/ तो
विस्मृति नीड़ में गीत गाएँ हम।

जब ज्वालाओं के श्र्वेत बीज जा छिपते हैं/तो
समुद्र के गाढ़ गर्भ में नए दिन पकते हैं
जब वक्त को निमिषों में मारने वाला काल
लंबे मोहों के शिल्प को गढ़ता हैं
ज़िंदगी के सपने दिखाने वाले मायावी,
मोहक, कठोर सच्चे लोक के शिल्प,/तो
खींचने दो काल को, हम खड़े हो चौराहे पर
देखे वे स्वप्न, काल ने जो गढ़े।

पाँच

धरती की इस अनिश्चित राह में
उदित और अस्त होते हैं हम एक साथ
जरा सी ज़िंदगी, एक ही सेज पर
ख़ेमा हो या मक़बरा?

जितना साथ रहे, प्यार से रहें हम
बस उतनी ही जगत की मधुरिमा
उतना ही हमारी ज़िंदगी का र्थ
ओ प्रिय तारे!

तारे ही हो न, मेरे मन की
कलियों के स्नेहिल हो न?
मेरे समझेबूझे सपनों को दिखा
मेरी नजानी भाषा बोल

मेरी अनछुई सुंदरता की सत्ता में
एक पुत्र देने वाले ओ तारे!
तू जल इस आसमान में
मेरा ख़ून चुआ, जगने दे धरती को!
ज़िंदगी की प्यास को गले लगा
ज़िंदगी के मोहों को पना
हम बाँट ले परस्पर
ज़िंदगी को रक्तिम करते निमिष

देशकाल को काटपीट
नील निवृत्ति के जलते निमिष
सागर सी फैली पड़ीं इस
ज़िंदगी की साँझ में हमने
ध्यान से पिरो कर बाँधे जो
साम गान, क्या लोक सुनेंगे उन्हें?
अपने विचारों को तुझ में भर
दिव्य बीज को अन्तस में रखने पर
तुझमें चमकते हुए बढ़ रहा है
मुस्कुराता हुआ जीवित प्रकाश!

पूर्णता में हम बिछुड़ते जाएँ
लंबे वक्त तक रहने वाली नई रोशनी बन
सुंदर बच्चे देखेंगे फिर से
सुंदरसुंदर सपने इस धरती पर।
आसमान से पवित्र तारे
टपकाएंगें प्रकाश बिन्दुएँ।

हम एक साथ उदित और अस्त होंगे
इस भवन के आँगन में फिर से
हमारे नजाने निवृत्ति बंधन
कल नाटक का पर्दा उठाएँगे
आज हम समझते है एकदूसरे को
आज हम साथसाथ हैं एकदूसरे के।

विस्तृत आसमान की विशालता में
जलते काल की गाधता में
माटी में ताप से जड़ें फूट गई
नन्हे पंछी स्तनपान करने लगे /तो
मेरे संदेशों को उकेरती निगाहें
तुम्हारी सहानुभूति ढलकाती किरणें
साथ मिलेंगी तो यह राग जगत
कली बन खिल उठेगा, फल बन बीज बनेगा।

ये सातों महा-द्वीप
नींद के दुस्वप्न में पड़े सो रहे हैं
मानव दुख को मन में रख
जब मैं वर्धा में तपस्या करने लगा,
शांति की खोज में नौआखली की
गलियों में भटकने लगा
तो क्या कहा तुमने मुझसे
जगत की भलीबुरी व्यवस्था के बारे में?
तत्वशास्त्र का अन्वेषण करती बुद्घियाँ
सब तरह से थक कर गिर जाएँ तो
कौन पका कर देगा नए वेदवाक्य?
छौंक भी लगाना है?
जरा बहुत सृष्टि रहस्य
कटोरी में रखे सभी दर्शन
हमारी आँखों को लुभाएँगे
संभवत मन को भी
मिट्‌टी के इस रंगमंच पर

जड़ हुई ताल की गति
चिपके पड़े हैं दर्शनतत्व
ज़िंदगी का नैसर्गिक आत्मज्ञान
कुचलता है भर भर
नादलोक की नवरत लहरों को
टुकड़ेटुकड़े करने वाला दंभ
इस लंबे सन्नाटे में
नाड़ियों की धड़कन जानने को रुके /तो
रुकना नहीं है बोधिवृक्ष की छाया में
दिल में यदि बोध जगाना है तो
कालवरी की कथओं के गीत गाना नहीं
मनुष्य बने रहना है, थोड़ी देर को भी।
आलिंगन करना है स्वप्न की दिव्य नाभि में
यदि हमें ऊपर उठना है/ तो।



अनुवाद..रति सक्सेना


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