मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
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अपने भारतीय परिवेश के प्रभाव में मुझे कुछ शब्दों के अर्थ समझने में समस्या हो रही थी. जैसे कि कविता और शान्ति का अन्तर्सम्बन्ध, मानवीय सम्वेदना, अनेकता में एकता। हालांकि इन शब्दों का हमने इतनी बार प्रयोग किया कि कि वे इस तरह से घिस गए कि अर्थ गायब हो कर शब्दों का छिलका ही दिखाई देता है। भाषा कविता की विरोधी तो कभी नहीं हुई, हमने नामदेव को जितने प्रेम से पढ़ा उतने ही प्रेम से कबीर को सुना, अक्का महादेव के देश में मीरा बाई के भजनों को भी सत्कार मिला,जिन्दगी की रामायण अयोध्या से उठ कर अध्यात्म रामायण बन दक्षिण में भी जम कर बैठ गई। लेकिन आज हम कितनी भाषाओं की कविताओं को पढ़ पाते हैं? अभी हाल में ही विदेशी कवियों के अनुवाद का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन प्रान्तीय भाषाओं का अनुवाद आज भी मन मानस में जगह नहीं पा रहा है। विदेशों में होने वाले कवि सम्मेलनों में केवल अंग्रेजी भाषा के कवि शिरकत कर पाते हैं, क्यों कि हिन्दी वालों को आपसी खींचातानी से ही फुरसत नहीं मिलती। विरोध किसी भाषा से नहीं, लेकिन चिन्ता उस धरोहर की है जो प्रान्तीय भाषाओं में छिपी हैं। इसलिए जब अनेकता में एकता की बात हुई तो मुझे लगा कि हम तो उल्टे रास्ते जा रहे हैं, जबकि अन्य देश अपनी भाषाओं और बोलियों के प्रति सचेत हो रहे हैं,हम उनसे मुँह फेर रहे हैं। रही वैश्वीकरण की बात, हम अपने देश में वैश्वीकरण को मात्र धन से तौलते है,
रति सक्सेना

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जंग खत्म हो गई, लेकिन हम अब भी उसके परिणामों से जूझ रहे हैं। हमारे पास खाने की मेज है लेकिन खाना नहीं, दर्द है लेकिन दवा नहीं, लोहे के पलंग हैं, लेकिन बिछाने को पुआल नहीं है।
हर दिन मैं रात का इंतजार करती हूँ, जिससे इन चीजों के इंतजार से बच सकूँ। लेकिन इससे मेरे सपनों में माँ आती है जो कपड़ों की धुलाई के लिए चिल्ला रही है। और मुझे अपने कपड़े ठीक से ना धो पाने के लिए फटकार रही है।
मैं उन्हें टब में इक्कट्ठा तो करती हूँ, किन्तु धोने की ताकत नहीं बटोर पाती हूँ।

जान गुजलोस्क्वी ( John Guzlowski) की कविता
*

एक खत जो कभी भेजा नहीं गया
मैं समन्दर से कोई सौ किलोमीटर दूर त्रिकोण के कोण में रहती हूँ जो युनाइटेड स्टेट के पश्चिमी किनारे पर है। मैंने नक्शे में देखा कि तुम चारों तरफ से बन्द जमीन में रहते हो जो Gdynia और Gdansk के बन्दरगाह से काफी दूर है।

इधर मै खरपतवार की खुशबू से जागती हूँ। कुछ दिनों से सूरज कोहरे से लिपट कर रहा है। टेलीफोन के खम्भों के ऊपर कौए काँव काँव कर रहे हैं। दुपहरी का पहला पहर है और गुलें हवा में खिलवाड़ करती हुई घर की छत पर से उड़ती निकल रहीं हैं। कभी कभी सूरज ढ़लने के बाद रात गहराने से पहले ओलम्पिक के पिछवाड़े से हेरोन (Heron) पंख फटकारते हुए पश्चिम की ओर उड़ती हुई निकल जाती है।
क्रिस्टीना पिकोज (Christina Pacosz) की कविता

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तीन कविताएं: नवनीत पाण्डे

1

स्त्री के मन की किताब...?


रोज अलसुबह
सबसे पहले जागकर
सारा घर
बुहारती, संवारती है
लगता है..
वह घर नहीं
घर में रहनेवालों का
दिन संवारती है
रोज गए रात
सबके सो चुकने के बाद
थकी-मांदी
जब बिस्तर पर आती है
उसकी आंखों में नींद नहीं
आनेवाले दिन के
काम होते हैं
स्त्री को पता रहता है
घर में किसे, कब, क्या चाहिए
उसके पास है हरेक के
पल पल का हिसाब
पर कितने घरों में...
कितनों ने पढी होंगी
स्त्री के मन की किताब...?

2
अगर सीख लेता

अगर सीख लेता
तैरना
डूबना न पड़ता

अगर सीख लेता नींद में भी
जागना
सपनों को टूटना न पड़ता

अगर सीख लेता
सहना
सुनना- कहना न पड़ता

अगर सीख लेता
वैसे जीना
ऎसे मरना न पड़ता

दबते-दबते
उगना आया
उगते-उगते
पलना
पलते-पलते
फ़लना आया
फ़लते-फ़लते
खिरना

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कुरुक्षेत्र

तीन


क्यों आ पैदा हुए धरा पर
कंकाल, घूरती पहाड़ियों पर?

सीता को जंगल में छोड़ने के लिए?
लंकओं को रावण राजा का ख़ून पीना है?
कौन विभीषण, कौन सुग्रीव यहाँ?
वसिष्ठ ही क्या सही बातें सिखला सकते हैं?

सब सोच समझ कर देखें
क्या बचा है राम की ज़िंदगी की झोली में?
झूठी हैं वे सब बातें जो काल ने कहीं
फूस सी जलती हैं चाणक्य की सूक्तियाँ।

नीति के रोते हुए गीता
सुनने वाला अर्जुन नहीं मैं
फिर से इस ज़मीन पर अंकुरित
दर्द का एक घोंसला हूँ

रेंगते रहते हैं मुझमें
व्यक्त अव्यक्त मोह
दूर चौराहे पर पिता को मार
माँ से ब्याह रचाया मैंने
क्या समझ पाओगे
मुझ कमज़ोर की जीवन नाड़ियाँ
धड़कातीं हैं नाद विभ्रांतियाँ।

सत्य पहचानने वाले विदुर की
दावत ने व्यास की आँखें खोलीं
नित्यता ने मौन भजन किया
देवता सो रहे हैं
फिर से पुराणों में जन्म लेने को।

अय्यप्पा पणिक्कर की लम्बी कविता
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करधनी बाँधे
पैंजनियाँ छनकाते
कंगन, मणिमाल खनखनाते
मृदु धरों पर मुस्कान लिए
हुलसित मन गोद में बैठे
मन मोहन मोक्ष का
आँख भर कणिदर्शन। किया मैंने

कल, मेषमास का न्न चख
धर चटकारते
मन मुदित, भीगी पलकों से
किया मैंने कणिदर्शन।
पने बचपन का

करधनी बाँधे
ढुलकढुलक चलता
ओझल हो रहा मेरा बचपन
सीने में सिसकियाँ दाबे
डबडबाई आँखें लिए
औचक खड़ा हूँ मैं
खाली पालने के समीप
क्या जान पाया तुमने यह सब!

देहरी पर पसरी छाया में
दीख पड़ा मुझे
मुस्कुराता मोर पंख
समझ गया तेरे बालों का
मोर पंख है यह
उठा, आँसू से धो
सीने पर खोंस लिया मैंने

फिर रहा भटकता
आँगन की धूलि में
आम के पेड़ की छाया में
खोपरे के आसपास बिखरी
आमियों और रत्तियाँ के पास
सोई पड़ी गुड़िया के पास
( मैं भी तो नन्ही गुड़िया ही हूँ)

इलञ्ञी के तले
धबनी माला
ताड़ की छाँह तले
उतरे पड़े हैं
लकुटि, बाँसुरी और पीला पटका

एन.एन. कक्काड

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VOL - VII/ ISSUE-II
(अगस्त- 2011
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


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