कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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मेडिलिन (कोलम्बिया) में हाल में ही सम्पन्न हुए इक्कीसवें इन्टरनेशनल पोइट्री फेस्टीवल में संसार के फेस्टीवल डायरेक्टरों की पाँच दिवसीय बैठक हुई, जिसमें वर्ड पोइट्री मूवमेन्ट की नींव पड़ी। कृत्या के डायरेक्टर होने के नाते मै वहाँ उपस्थित रही। बैठक में निम्नलिखित निर्णय लिए गया।

“At the 21º Medellin Poetry Festival, directors of 37 Poetry Festivals worldwide have discussed the relationship between poetry and peace and reconstruction of the human spirit, nature reconciliation and recovery, unity and cultural diversity of the peoples, material misery and poetic justice, and actions to take towards the globalization of been poetry.”

अपने भारतीय परिवेश के प्रभाव में मुझे कुछ शब्दों के अर्थ समझने में समस्या हो रही थी. जैसे कि कविता और शान्ति का अन्तर्सम्बन्ध, मानवीय सम्वेदना, अनेकता में एकता। हालांकि इन शब्दों का हमने इतनी बार प्रयोग किया कि कि वे इस तरह से घिस गए कि अर्थ गायब हो कर शब्दों का छिलका ही दिखाई देता है। भाषा कविता की विरोधी तो कभी नहीं हुई, हमने नामदेव को जितने प्रेम से पढ़ा उतने ही प्रेम से कबीर को  सुना, अक्का महादेव के देश में मीरा बाई के भजनों को भी सत्कार मिला,जिन्दगी की  रामायण अयोध्या से उठ कर अध्यात्म रामायण बन दक्षिण में भी जम कर बैठ गई। लेकिन आज हम कितनी भाषाओं की कविताओं को पढ़ पाते हैं? अभी हाल में ही विदेशी कवियों के अनुवाद का प्रचलन बढ़ा है, लेकिन प्रान्तीय भाषाओं का अनुवाद आज भी मन मानस में जगह नहीं पा रहा है। विदेशों में होने वाले कवि सम्मेलनों में केवल अंग्रेजी भाषा के कवि शिरकत कर पाते हैं, क्यों कि हिन्दी वालों को आपसी खींचातानी से ही फुरसत नहीं मिलती। विरोध किसी भाषा से नहीं, लेकिन चिन्ता उस धरोहर की है जो प्रान्तीय भाषाओं में छिपी हैं। इसलिए जब अनेकता में एकता की बात हुई तो मुझे लगा कि हम तो उल्टे रास्ते जा रहे हैं, जबकि अन्य देश अपनी भाषाओं और बोलियों के प्रति सचेत हो रहे हैं,हम उनसे मुँह फेर रहे हैं। रही वैश्वीकरण की बात, हम अपने देश में वैश्वीकरण को मात्र धन से तौलते है, तकनीक को हथियार बनाते हैं, साहित्य, भाषा और संस्कृति की बात कौन करता है।

लेकिन मैंने एक बात यह सीखी कि कभी हार ना मानने वाले जीत हासिल कर ही लेते हैं। पिछले दो-चार दशक से मेडिलिन विश्व का सबसे शातिर शहर माना जाता रहा है। ड्रग कार्टल नाम से ड्रग माफिया इतना ज्यादा सक्रिय था कि लोगों का शाम को घर से निकलना मुश्किल था। पाबलो Pablo Escobar ने पूरे शहर को ड्रग, आतंकवाद, बलात्कार, आदि का अड्डा बना दिया था। पूरे विश्व में मेडिलिन को शक की निगाहों से देखा जाता था। निराशा के इस दौर में साहित्य रचना हो रही थी, क्यों वही तो एक मात्र साधन था अपने भीतर के सुख- दुख को सांझा करने का। करीब इक्कीस साल पहले Gloria Chvatal, Fernandov Rendón, Gabriel Jaime Franco ने अपने मित्रों के साथ मिल कर इस कठिन समय में , कविता का सहारा लेने की कोशिश की। 1991 मे पहले कवितोत्सव में तेरह कविता प्रेमियों ने मिल कर सड़कों, सार्वजनिक स्थानो और आम आदमी के बीच कविता पाठ आरम्भ किया। फरनान्दों का मानना था कि

"Colombia is the victim of a terrorist complot, and poetry is the universal language that deciphers the riddle. The terrorism is state-sponsored, and poetry is the dream and the answer to the eternal challenge of a magnificent people."
Fernando Rendón

वह छोटी सी मशाल आज इस तरह  रोशन हो गई कि इस वक्त मेडिलिन ही विश्व का एकमात्र शहर है, जहाँ कविता सुनने हजारों की भीड़ इक्कट्ठी होती है। आज कविता सुनने की जो तमीज मेडिलिन वासियों में है, वह दुनिया में दुर्लभ है। आतंक का साया काफी झीना पड़ गया। हालांकि इसका श्रेय सरकार को दिया जाता है, लेकिन कविता के अन्तररस ने जरूर कुछ ना कुछ प्रभाव डाला होगा।

आज वही फरनान्दों अपने मित्रों के साथ एक नई सुबह की तलाश में निकले हैं कि यह बदलाव पूरी दुनिया में आए, तो कृत्या उनके साथ जरूर खड़ी होगी....

मित्रो , यह अंक समर्पित है अपने देश में काव्यात्मक क्रान्ति की कामना को..

रति सक्सेना

* इस अंक की कलाकार है भावना चौधरी, आशा है आपको उनके चित्र पसन्द आए होंगे।


 
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