नवनीत पाण्डे


तीन कविताएं: नवनीत पाण्डे

1

स्त्री के मन की किताब...?


रोज अलसुबह
सबसे पहले जागकर
सारा घर
बुहारती, संवारती है
लगता है..
वह घर नहीं
घर में रहनेवालों का
दिन संवारती है
रोज गए रात
सबके सो चुकने के बाद
थकी-मांदी
जब बिस्तर पर आती है
उसकी आंखों में नींद नहीं
आनेवाले दिन के
काम होते हैं
स्त्री को पता रहता है
घर में किसे, कब, क्या चाहिए
उसके पास है हरेक के
पल पल का हिसाब
पर कितने घरों में...
कितनों ने पढी होंगी
स्त्री के मन की किताब...?



2
अगर सीख लेता



अगर सीख लेता
तैरना
डूबना न पड़ता

अगर सीख लेता नींद में भी
जागना
सपनों को टूटना न पड़ता

अगर सीख लेता
सहना
सुनना- कहना न पड़ता

अगर सीख लेता
वैसे जीना
ऎसे मरना न पड़ता


3


न कहना..



दबते-दबते
उगना आया
उगते-उगते
पलना
पलते-पलते
फ़लना आया
फ़लते-फ़लते
खिरना

टिप टिप करते
बहना आया
बहते-बहते
झरना
झरते- झरते
झुरना आया
झुरते-झुरते
सहना..

पढते-पढते
लिखना आया
लिखते-लिखते
सीखना
सीखते-सीखते
कहना आया
कहते-कहते
न कहना..


 


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