एन.एन. कक्काड

 

मलयालम के अग्रज कवि
 

तीर्थाटन


अनुवाद अरविन्दाक्षन, रति सक्सेना

करधनी बाँधे
पैंजनियाँ छनकाते
कंगन, मणिमाल खनखनाते
मृदु धरों पर मुस्कान लिए
हुलसित मन गोद में बैठे
मन मोहन मोक्ष का
आँख भर कणिदर्शन। किया मैंने

कल, मेषमास का न्न चख
धर चटकारते
मन मुदित, भीगी पलकों से
किया मैंने कणिदर्शन।
पने बचपन का

करधनी बाँधे
ढुलकढुलक चलता
ओझल हो रहा मेरा बचपन
सीने में सिसकियाँ दाबे
डबडबाई आँखें लिए
औचक खड़ा हूँ मैं
खाली पालने के समीप
क्या जान पाया तुमने यह सब!

देहरी पर पसरी छाया में
दीख पड़ा मुझे
मुस्कुराता मोर पंख
समझ गया तेरे बालों का
मोर पंख है यह
उठा, आँसू से धो
सीने पर खोंस लिया मैंने

फिर रहा भटकता
आँगन की धूलि में
आम के पेड़ की छाया में
खोपरे के आसपास बिखरी
आमियों और रत्तियाँ के पास
सोई पड़ी गुड़िया के पास
( मैं भी तो नन्ही गुड़िया ही हूँ)

इलञ्ञी के तले
धबनी माला
ताड़ की छाँह तले
उतरे पड़े हैं
लकुटि, बाँसुरी और पीला पटका

आँखे डबडबाई
उठा लिए मैंने उन्हें
श्र्वास गति से तीव्र
दीर्घ तरंगित हृदय से

जब खिल उठी गुलाबी सुबह
भरे हुए मधुमास श्मशान में
सुनहरे सपने उगलती
दूब ने सुखा दिए आँसू

गरम साँस भरते
सटाए सटकारते, गरजते
सिंह घूमते जहाँ नाखूनों से
ज़मीन खोदतेखोदते

उन्मत्त मन में बोध जैसे
भटकता रहा तुझे खोजतेखोजते
वृंदावन में गोपद झुलाते
हरित निकुंज
विमूढ़ खड़े खड़े
दूर से सुना मैंने

गायों के गले में टनकारती
घण्टियों का नादरव
कालिन्दी की धीमी ध्वनि
सिसकता मुरली रव

दौड़ पड़ा मैं हवा की तरह
तट की रेत पर
छपी हर पदछाप पर
गिरता उठता रहा
धूल से सनता रहा

पुकार सुनी मैंने
शुभदर्शन, शुभदर्शन
सुनाई दिया इसी बीच
बचपन का आलापन

मिलन की चाहना तो
चले  अनन्त वन में

कहाँ है अनन्त वन
मैं खड़ा खोज रहा हूँ
भटकता रहा रेत पर
घूमता रहा
डगर डगर, नगर नगर
जगह जगह बिखरी रेत की लहरो पर
कंठ प्यास से तड़कने लगा
गिर पड़ा फिर सिर चकरा
सूखी टहनी हो ज्यों

न जाने कब तक खड़ा रहा
अन्तत उठ खड़ा हुआ
आँख मसलते देखा
समीप हरित प्रदेश में
सुनहरे कलश थामे
मन्दमन्द मुस्काती
पुष्प कन्या लक्ष्मी खड़ी सामने
शत शारद कौमुदी
रूप में ढली खड़ी हो ज्यों
कलश से तनिक मृत निकाल
जल पान कराया उसने

आन्तरिक शान्ति
तीव्रता के साथ ज्वलित हुई तो
जाप किया मैंने
मृतमसि, मृतमसि मृतमसि
नितान्त मन्द गंभीर
आकाशवाणी सुन पड़ी
इमां गृहणीष्व

उस की हथेलियाँ हाथों में थाम
कहा मैंने
सुभगे! मैं पति हूँ तुम्हारा
वरण करूँगा,
तुम बनो मेरा वलम्बन
वृद्घ की छड़ी जैसे
पल भर विश्राम किया नही
हिमगिरी रथ तैय्यार किया
सिन्धु तरंग परंपरा श्र्व व्यूह को
विदुत्लता से सटकार
निमग्न तराइयों वाले नाँध से कस
लक्ष्मी को बैठाया रथ पर प्रेम से
चल दिए नन्त वन खोजते
नीरदमाला बिखरीं
पहाड़ियाँ टूटी
हरित वन रोंदे गए
दशाएँ कंपकपाने लगी
मेरे रथ वेग से

स्वप्न सी लगी यह यात्रा
पार करते गाँव गाँव, नगर नगर, वनवन

पुष्पकन्या लक्ष्मी के पुष्प
और उत्तरीय
लहराते योजनो पीछे
हम चले जा रहे थे आगे आगे

दूर्वादल की नोक से टकरा
रथवेग थम गया
पर्णशाला के समीप

टूट गए रथ चक्र
थरथरा उठे रथ
कंपकपा उठी ज़मी
टूट गई पाताका
गिर पड़े धरा पर
मैं और पुष्पकन्या लक्ष्मी

लड़खड़ाते खड़े थे हम दोनो
देखा सामने आश्चर्य से
शतयुग नुभवों से दीप्त
पिता आश्रम की पुण्यभूमि पर
बन्द नेत्र कर रहे तप
समीप बैठी दूर्वासन पर
शक्ति मयी जननी

स्वयं विधाता तपस फलाना
केनापि कामेन तपश्चार
खिल उठा हृदय मेरा
यह देख
पितृ चरणों पर गिरा
पुष्प कन्या लक्ष्मी के साथ

समस्तापराध श्रमस्व!
निवास करने लगे उनके साथ हम
फूल चुनते , फल बटोरते
गायों को चराते
करते रहे तप लम्बे समय तक

बीतते रहे तीव्र ग्रीष्म
भीगी वर्षाएँ
सुघेरी शरत ऋतुहंस
भूरे हेमन्त
रंगबिरंगे पंखों वाले वसन्त
आँखों के सामने से रहे गुजरते

उस रात जब हम सोए थे दुर्वाशयन पर
भोर के तारे उगने से पहले
चला आया वह
धीमे से पुकारा

गाय दुह दूध पिलाया,
आखों मे अंजन और
माथे पर गोपी चन्दन लगाया

द्‌भुद, द्‌भुद
न जाने कहाँ से पिता आ पहुँचे
झूलते वल्कल लिए
दीर्घ दाड़ी पर लटके
कंगन झनकार रहा था मेरा बचपन

नजाने रोने लगे हम
दूर हो आँसुओं
निरखने दो मुझे
अपने बचपन को
( हम करुणा विगलित)
पुष्पकन्या लक्ष्मी की गोद में बैठाया हमने उसे

मैंने भरा बाहुओं में
गोद में बिठलाया
आँसुओं से किया अभिषेक
थरथराती वाणी में उच्चरित किया मंत्र
' आत्मा वै पुत्रं नां सि
स जीवेम शरद शतं

फिर स्नेह सिक्त सहला
दिया आशीष पिता ने

हम प्रसन्न हैं
तुम जाओ दुखी हुए बिना

आज वही करधनी बाँधे
पैंजनिया झनकारते
कंगल खनखारते
कोमल धरों पर मधुर मुस्कान लिए
बैठा है हमारी गोद में

श्वेत शार्दूल चन्द्रिका
को साकार करती
खड़ी है पुष्प कन्या लक्ष्मी समीप..

 


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