मुहम्मद अयूब बेताब की कविता

जमीर


जमीर नहीं रुकेगी मेरी
कर लेगी आत्महत्या
यदि आत्महत्या न करती तो
मैं कैसे रहता जीवित!

((मुहम्मद अयूब बेताब की अन्य कविताएँ)


अंबरीश की पंजाबी कविताएँ


मर्तबान में भर रही है



आम की खट्टी , रसदार
महकती फाँकें
मेरी पत्नी आचार डाल रही है
पता नहीं क्यों
अच्छा लगता है
गहरे कहीं महसूस होता
कि ठीक- ‍ठाक ही रहेगा अनागत
बेशक पता है मुझे
कि गिरगिट होता है
आने वाला कल
फिर भी मन भाता है
यूँ देखना उसे
ज्यों साज- संभाल रही हो
अनदीठा समय
और डली- डली
फाँक-फाँक
भर रही हो मर्तबानों में
स्वाद सुरक्षित एवं शाँत
अचार डाल रही मेरी पत्नी
महफूज कर रही है
पूरा एक बरस

अनुवाद‍ सुजाता
 


अनीता वर्मा की कविता

एक और प्रार्थना


प्रभु मेरी दिव्यता में
सुबह सबेरे ठंड में काँपते
रिक्शे वाले की फटी कमीज खलल डालती है

मुझे दुख होता है यह लिखते हुए
क्योंकि यह कहीं से नहीं हो सकती कविता
उसकी कमीज मेरी नीन्द में सिहरती है
बन जाती है टेबुल साफ करने का कपड़ा
या घर का पौछा
मैं तब उस महंगी शाल के बारे में सोचती हूँ
जो मैं उसे नहीं दे पाई

प्रभु मुक्त करो
एक प्रसन्न संसार के लिए
उस ग्लानि से कि मै महंगी शाल ओढ़ सकूँ
और मेरी नीन्द रिक्शे पर पड़ी रहे।

(अनिता वर्मा की अन्य कविताएँ)


जान गुजलोस्क्वी ( John Guzlowski) की कविता

एक खत युद्ध के बाद‍-

प्रिय तेल्का, मेरी इकलौती बहन

जंग खत्म हो गई, लेकिन हम अब भी उसके परिणामों से जूझ रहे हैं। हमारे पास खाने की मेज है लेकिन खाना नहीं, दर्द है लेकिन दवा नहीं, लोहे के पलंग हैं, लेकिन बिछाने को पुआल नहीं है।
हर दिन मैं रात का इंतजार करती हूँ, जिससे इन चीजों के इंतजार से बच सकूँ। लेकिन इससे मेरे सपनों में माँ आती है जो कपड़ों की धुलाई के लिए चिल्ला रही है। और मुझे अपने कपड़े ठीक से ना धो पाने के लिए फटकार रही है।

मैं उन्हें टब में इक्कट्ठा तो करती हूँ, किन्तु धोने की ताकत नहीं बटोर पाती हूँ।

कभी मैं उन्हे पूरब की तरफ चेहरा किए हुए पतझड़ी जंगलों को देखते हुए पाती हूँ। जहाँ पर अभी से बरफ पड़ने लगी है। यदि तुम पोलेण्ड आओ और मेरे साथ गाँव चलों तो तुम उस कब्र को देख पाओगी जहाँ उसे, गेन्जा और उसके बच्चे को पटक दिया गया था। वहाँ कोई तो जानता होगा कि उन्हें कहाँ दफनाया गया। तब शायद माँ मेरे सपनों में आना बन्द कर दे।

यदि तुम वसन्त में आओ तो मेरे लिए नीले रंग की एक पौशाक जरूर लाना, नीले रंग पर फूल छपे हों जिसमें, जैसी कि हम जंग से पहले पहना करते थे। गर्मियों के लिए एक नई पौशाक भी अच्छी रहेगी।

तुम्हारी प्यारी बहन

सोफिया

अनुवाद रति सक्सेना
 

 
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क्रिस्टीना पिकोज (Christina Pacosz) की कविता

एक खत जो कभी भेजा नहीं गया

मैं समन्दर से कोई सौ किलोमीटर दूर त्रिकोण के कोण में रहती हूँ जो युनाइटेड स्टेट के पश्चिमी किनारे पर है। मैंने नक्शे में देखा कि तुम चारों तरफ से बन्द जमीन में रहते हो जो Gdynia और Gdansk के बन्दरगाह से काफी दूर है।

इधर मै खरपतवार की खुशबू से जागती हूँ। कुछ दिनों से सूरज कोहरे से लिपट कर रहा है। टेलीफोन के खम्भों के ऊपर कौए काँव काँव कर रहे हैं। दुपहरी का पहला पहर है और गुलें हवा में खिलवाड़ करती हुई घर की छत पर से उड़ती निकल रहीं हैं। कभी कभी सूरज ढ़लने के बाद रात गहराने से पहले ओलम्पिक के पिछवाड़े से हेरोन (Heron) पंख फटकारते हुए पश्चिम की ओर उड़ती हुई निकल जाती है।

यहाँ स्टार्क्स नहीं होती हैं, मेरी पक्षी वर्णन किताब कहती है कि यह पुराने जमाने की प्रजाति है। तुम्हारी दुनिया, मेरे पिता की दुनिया पचास वर्ष पहले का स्मरण रखती है। अभी हाल ही में मैने नेशनल जाग्रफी की किताब में पढ़ा है कि स्टार्क लुप्त होने के कगार पर है। क्या कभी तुमने सोचा कि क्या नहीं है?

मौसम कैसा है? पिछली जुलाई में मिले आण्टी के खत में मार्च के महिने में बाढ़ और फसल के नष्ट होने के बारे में लिखा था , हमने उस खबर को कई बार पढ़ा था, आखिर कार कुछ तो सूचना मिली। हालाँकि खत खुला आया था।

मैं वह सब नहीं लिख पा रही हूँ, जो सोच रही हूँ क्योंकि जानती नहीं कि क्या सच है, क्या नहीं। मैं खतों के माध्यम से रास्ता पकड़ लेती हूँ, और कल्पना करने लगती हूँ मैं बसन्त से खराब हुई पहाड़ों के ऊपर पुरानी बर्फ पर चल रही हूँ।

तुमने सर्दियों के लिए खाना जमा कर लिया ना? भंडार को प्याज और आलू से भर लिया ना? लाल और सफेद दोनो तरह के ? बरनियों में kapusta भर कर लटका लिया हैं ना। क्या अब भी तुम मीट के लिए लाइन में खड़ा होना पड़ता है? अब लाइन लगती भी है कि नहीं? क्या अब कोई सुबह सुबह उठ के नीले आसमान के नीचे धूप मे कुकुरमुत्ते फैलाता है? और फिर चूल्हे के करीब रैक में रख कर सुखाता है? इन शब्दों के लिखे जाने तक, जिन्हें तुम कभी भी नहीं देख पाओगे।

मैं कहना चाहती हूँ कि मैं तुमसे प्यार करती हूँ, पर तुम प्रश्नवाचक हो। एक पूरे साल जेल में रहने के बाद। वालेसा कहता है कि मुझे सावधान रहना चाहिए। मुझे सोचने के लिए वक्त चाहिए।

मैं उससे सहमत हूँ, लेकिन मैं सब कुछ छोड़-छाड़ कर तुम्हारे दिल में पहुँचना चाहती हूँ। भावों में बहना अच्छा लगता है, यदि इनका तुम्हारे विरुद्ध उपयोग किया जाए तो।

पूरी जिन्दगी मैं तुम्हारी ओर झुकी रही। तुम ळुबलिन (Lublin) के दक्षिण में हो, गेलिशिया (Galicia) से ज्यादा दूर नहीं, चेज तोचावा (Czes-tochowa) से करी मील दूर पश्चिम में। मुझे मालूम है कि तुम कहाँ हो, पर नहीं जानती कि वहाँ तक कैसे पहुँचे? नाम लेने में मन को आराम मिलता है, पर इतना ही तो काफी नहीं।

मैं बचपन के दिनों की याद करते हुए उन खतों को याद करती हूँ जिनमें विदेशी भाषा में कुछ लिखा था। उसका जवाब-अच्छे कच्छों का पेकेट , गरम जुराब, नायलोन, लिप्सटिक, टिन फूड, आदि। उस ने सीटी बजाई मानों कि यह काम उसका हो। फिर उसने सफेद आटे की बोरी उन डिब्बों के चारो तरफ लपेट दी, और पुराने कपड़े से खाल की तरह कस कर बाँध दिया। इसके बाद सूजा लेकर अच्छी तरह से सी दिया आधी उंगली रहित अकड़े हाथों से उसने स्याही की बोतल निकाली, जिसे उसने इसी काम के लिए सहेज कर रखा था, फिर स्याही में निब डुबों कर तुम्हारा पता लिख दिया। सफेद पर काले अक्षर, हर अक्षर ने जरूरत से ज्यादा समय लिया।

मुझे लगता है कि मैं अपने बारे में लिखाने की जगह उसके बारे॓ ज्यादा लिखा रहीं हूँ, किन्तु उसका प्यार तुम्हारे और मेरे प्यार के आसमान के बीच का पुल था। मैं और क्या कह सकती हूँ, मैं एक अधेड़ औरत, एक लेखक, जैसा कि यहाँ जानी जाती हूँ, तुमसे मुहब्बत करती हूँ। पतझड़ करीब करीब खत्म हो गया, और तुम्हारी और मेरी दुनिया सर्दी के मौसम में प्रवेश कर गई।

जब तुम बेहद अंधेरे में क्रिसमस में रोटी बाँटोगे, मैं तुम्हे याद करूंगी।

अनुवाद रति सक्सेना

कविता के अनुवाद का बिना अनुमती के उपयोग करना मना है।


लियोना ओ सुलवन की कविता

LEANNE O' SULLIVAN

आखिरी घड़ी

वहाँ कोई खून नहीं था, जब मैं दौड़ कर
अपनी दादी के कमरे में पहुँची
जहाँ वे अपने बिस्तरे पर मर रही थीं
मैंने सोचा कि शायद हत्या की गई है
पर उसका दिल आग नहीं सुलगा पा रहा था
वाल्व चप्पुओं की तरह थक गए थे
उसके मुँह और आँखे गलफड़ों की तरह
खुल और बन्द हो रही थीं, मैंने उसे
बिस्तरे पर बैठाते हुए अपने कंधों पर टिकाया
वह गीले तोलिये की तरह भारी थी
अपनी देह की आखिरी गर्मी की ओढ़ में
लगभग सो ही गई, वह घर भर के दिलों की
पंखों की तरह फड़फड़ाती धड़कन नहीं सुन पाई,
झटके से उसकी आँखे से खुलीं, वह चिल्ला उठी
" क्या मैं मर रहीं हूँ?" वह करीब
तीन चौथाई बहरी थी, और मुझे खुशी है कि
मैं इस महिला का एक चौथाई हिस्सा हूँ
मेरे पिता उसकी देह में तैरे थे, और मैं भी
उसकी पवित्र पूर्णतया जीवित देह के किसी
कोष में तैरी थी, मैं खुश थी कि मेरी दादी का एक हिस्सा
अभी भी जीवित है और सुन सकता है
मैंने उसके कान से अपना मुँह सटाया और
उसके उस हिस्से से बोली जो अभी भी स्पंदित था
मेंने कहा, तुम कभी नहीं जाओगी, मुझे लगा कि मैंने
उससे ध्वनि के बाहरी मण्डल में बात की हो
मानों कि हम जंगल में हों, मानों कि टहनियाँ
चरमरा रही हों, घुप्प अंधकार रोशनी में मन्दिम
उसके सीने पर पड़ी पसीने की कमजोर बून्द,
ज्यों ही मैं उसे चूमने झुकी, मुझे विश्वास है कि
उसने मुझे जरूर सुना होगा. लेकिन ज्यों पादरी
कमरे में घुसे, उसका हाथ निर्जीव हो, सूखे पत्ते सा झर गया
और उसने प्रार्थना नहीं सुनी, तुम यहाँ हो
अपने चालाक साथियों के साथ दादी माँ
इन्हीं के साथ मिल कर तुमने मुझे साहस दिया
किसी बहरी परी के कान में
फुसफुसा कर कहती हूँ‍-आमीन! मेरी प्यारी!

(लियोना ओ सुलवनी की अन्य कविताएँ)


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