लियोना ओ सुलवन


लियोना ओ सुलवन की कविताएँ पिछले अंक में प्रिय कवि के रूप में छपी थीं। इस बार उन्हीं की कुछ कविताएँ जिसमें अन्तिम समय को साक्षी माना गया है प्रस्तुत कर रही हूँ। मुझे नहीं लगता कि हम भारतीय भाषाओं में मृत्यु या अन्तिम समय को इस गहनता और समग्रता के साथ के साथ प्रस्तुत कर पाए हैं। अन्तिम वक्त की बात करते हुए खासे भावुक तो हो जाते हैं, किन्तु सच्चाई से काफी दूर टहलते से रह जाते है।


विदा लो (Say Goodbye)

मेरी दादी की मौत हर जगह थी
इस वक्त ट्रेफिक बन्द था,एक अकेला राही
अपनी टार्च के सहारे आगे बढ़ रहा था
मैं उस क्षण से गर्भित थी जब उन्होंने हमे
अपने भीतर समाने के लिए आखिरी साँस भरी
बेहद दूर से कुछ शब्द निकाले
हमे सुनने को बाध्य किया, मैं और भाई
बाहर टहलने लगे, अस्पताल के गलियारे में
तूफान के भय से उड़ती चिड़ियों की तरह
हम हाथ में हाथ डाले चलते रहे
कार पार्किंग के पार, हमारी दादी का
जीवन रक्त बह गया, हम शायद
मौत से भाग रहे थे,सीमेन्टी इमारतों में
चलते हुए, मानों कि किसी महाद्वीप ने हमे और
दादी को अलग अलग कर दिया हो

अचानक हम उस वार्ड के सामने पहुँच गए
जहाँ मैंने मरने की कोशिश की थी,
मेरी आँखे धक्के से बन्द हो गईं
जैसे कि धरती में गिरने से पहले कोई
उल्का, मिट्टी में से अपनी जड़ें खींचने जैसे
मैंने उस कास्केट की
खिड़की को तोड़ने की कोशिश की थी
जहर से भरी नाड़ियों को कुचलने की भी
मुझे उन ठण्डे खम्भों के सामने भारीपन लगा
और मैं चीख उठी, जैसे कि दुख स्वयं ही
चीख रहा हो उस सिलेटी घर में
लेकिन मेरा भाई मेरा हाथ पकड़ मुझे
दादी के अन्तिम समय के करीब ले आया
अनन्त देहों वाली बिल्ली मैं खड़ी हो गई,
सोचने लगी है कि यही वक्त है जब कब्र से बाहर निकलना है

भूख

यदि मैं किसी को
अपनी देह में
मार सकती तो
उस भयानक भूख को मार डालती
जो मुझ में, उन गीतों की धुनों सी है
जिनके बोल मुझे याद नहीं
जब तक भूख अपनी खुद टार्च बनती है
रात में
और मैं उसमें डूब जाती हूँ
एक मूक वक्त में गिर जाती हूँ
उन शब्दों को सुनते हुए
जो मेरे कानों से हवा की तरह गुजर
जाते है-और यह दिन है
फिर साँझ, फिर दिन
मैं नामकरण भूल गई
या फिर जन्म लेना ही
अपनी नाक के नीचे
देखते हुए
बाएँ से दाएँ,उन विचारों में डूबती हुई कि
मैं शायद हूँ ही नहीं
सूरज और चाँद मेरी आँखों के
सामने से मनोभाजित दृष्टि की तरह गुजरते हैं

मैं अपनी देह की नहीं सुनती
दिमाग और होंठों की तो
बात ही छोड़ो
मैं अपनी आँखों से देखती हूँ
जैसे कि किसी केलिडोस्कोप में
अपने सभी प्रेमियों को
अपनी बाहों में लिपटे देख रही हूँ
सीमा के पार उन चीखती हुई
जहाँ चुप्पी और ठण्ड है
और बर्फ
आग की सबसे सूखी
लपट की तरह
ये चुम्बन है
जो मेरे चेहरे पर दाग की तरह
बचे हैं, और मैं सन्धि
कर सकती उनसे
या दे सकती हूँ
मेरी कौई भी चीज
जिससे मैं पालतू
बन सकूँ और
इसे छोड़
सकूँ
 


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