मैना एलफिन

बर्फ की प्रतिमा (स्नोमेन)


कितना आसान था उसे बनाना
घंटे भर में जन्म ले लिया, सफेद भ्रण से
चपलता से चलते हाथ, मजबूत
कंधो के उपर सतर खड़ा हो
वह इंतजार कर रहा है,
हमने उसे बाहुविहीन बनाया

भविष्य रहित

अनेक बर्फीले गोलों से परे
ऊँची चोटियाँ हैं, जो आदमी को बनाती हैं,
ने सफेद बुरादे से एक चिमनी निर्मित की
जहाँ नीचे उड़ती बर्फ परतों में
जम गई, ढेर बन कर

ऊपर, निद्रारहित हेलीकोप्टर
धरती पर बिछी चादर को लगातार फटकारते रहते है
जब तक कि रुकती रुकाती रात आ कर
घुड़काने लगती है मण्डराते टीलों और जमीन को

ठण्ड से ठिठुरे और मूक, वक्त
अजनबी बन गया, क्रूर शाप को गिनते हुए
जो प्लेग बरसाता , फिर बचाव होता है
आदमी के पदचिह्न उस पथ पर अपने ही बनाए
मार्ग को चुनते हैं, जिसमे उसकी यात्रा चली
और उस रास्ते ने उन्हे अपने ही पथ पर चलने की राह दी
बर्फ को कुचलते हुए,
हर हड्डी, हर जोड़, विश्वास का हिस्सा

मानवीय ऊँचाई पर
जुड़ने की इच्छा, प्राप्ति के लिए
अनुभव के लिए, इसलिए बर्फ की साफ भाषा
की लड़खड़ाती जबान
इसलिए आदमी उठा सकता है विश्वास के साथ

हिमालय से ऊपर
बौनी , जैसे कि झोपड़ी

 


हिमद्युति सुधांशु

एक अडिग अहसास की तरह
विरह आ गया विश्वास की तरह

उस प्रेम को ठुकरा कर
उस प्रतीक्षा को झुठला कर
मन की हर कोठरी में
एक ज्वाला सुलगाता
विरह आया
बादल की तरह
स्याह रातों के कागल की तरह

धड़कते हृदय के हर स्पंदन को नकारता
झंकृत मन वीणा की
हर पुलक को अस्वीकारता
जेठ के सूरज सा
हर प्रेमभाव को झुलसाता
विरह आ गया
बिन प्रेम, जीवन
सुनसान पथ

विरह..
प्रेम डगर का शाश्वत अन्त?


(हिमद्युति सुधांशु  की अन्य कविता)


रविशंकर उपाध्याय की कविता

मेरी धरती मेरे भीतर है
और मैं उसके भीतर
वह बह रही है मेरी धमनियों में
मेरे हर पसीने की बून्द में टपकती है वही
मेरे चूल्हे तक पहुँच कर तपने के लिए तैयार है
और हमारी भूख उसकों लपकने के लिए

गर एक दिन अचानक मेरी धरती
कहीं गायब हो गई
मैं उसे ढूँढ रहा हूँ
और चिल्ला रहा हूँ
हर चौक चौराहों पर
अखबारों में, पत्र पत्रिकाओं में
अब तो संसद भवन में भी मेरी आवाज गूंज रही जै
लेकिन मेरे भीतर की धरती
पता नहीं कहाँ चली गई
चिल्लाते चिल्लाते
मेरी चिल्लाहट एक कराह में बदल चुकी है
मेरी नसों में अब नहीं बह रही है
मेरी धरती
जिसमें, जेठ की फटी दरारों में
मैं धीरे धीरे समाता जाता था
और आषाढ़ की बून्द पड़ते ही
वह गीली होकर पसरने लगती थी मेरे भीतर

अब तो वह न मेरी नीन्द में है
न मेरे चैन में।
मेरी नसें अकड़ने लगी है
पसीनें की बून्दे सूख चुकी है।
अब वह मुझे सपने में
किसी के हाथों में गुलाब कि तरह मुस्कुराती
नजर आ रही है।

मेरी धरती
अब न मेरे भीतर है
और न मैं उसके भीतर।

(रविशंकर उपाध्याय की अन्य कविताएँ)


महेश चन्द्र पुनेठा की कविता

उजास पैदा करता एक दृश्य

आज कहाँ रह गए हैं भले मानुष
जब सुनता हूँ मैं इन उदास स्वरों को
मुझे याद हो आती हैं घसियारिनें
एक ऐसे मौसम में
जब दूर -दूर तक भी
दिखाई न देता हो तिनका
हरी घास का
जब थामते हुए हाथ में आँसी
लगाते हुए पीठ पर डोका
कुलबुलाती हों घसियारिनें भी -
’ बारिश की एक बूँद
टपकी नहीं अभी तक
खाली डोका
घुमाना होता है बज्यूण ।‘
बावजूद इसके
इधर -उधर भटकती
झाड़ी -झाड़ी
खेत और बाड़ी-बाड़ी
ढूँढ ही लाती हैं वे हरी घास
लौटती हैं
हरियाली से भरा डोका लिये
जैसे लादी हो पीठ पर
हरे-पीले फूलों का गुलदस्ता हाँ

नया उजास पैदा कर देता है
यह दृश्य
निराश दिल में ।

(महेश चन्द्र पुनेठा की अन्य कविताएँ)


भरत तिवारी की कविता

अग्फा और कैनन और मैं

तस्वीर उतारता रहा
अपने कैमरे को मैंने अपना बचपन पहना दिया
और बोला कि
तुम ! जो बड़ी बड़ी तस्वीरें खींचते हो
आज वो खींचो
जो मैंने
'अग्फा' से उतारी थी//
वो अपनी आँखों को मेरी आँखों का सहारा ले
कोशिश करता रहा
थक गया //
मैंने मजाक किया उससे
"भाई तुम तो बड़े टाइप के हो, मेरा 'अग्फा' वो नहीं थकता था छोटा था फिर भी ....
... तुम्हे तो रीलें भी पैदाइशी मिली है
जैसे चांदी का चम्मच ले पैदा हुए हो "
उसकी थकान बस एक बैट्री भर से मिट गयी
और बिना कुछ जवाब दिये
वापस शुरू हो गया वो , क्लीक क्लीक ! //
रात को मैंने दुबारा जब कहा "तुमसे नही होगा !"
वापस बिफर उठा मुझ पर ही
"गया वक्त वापस नहीं आता
गए वक्त की तस्वीरें नही उतरती "
बोला !
"तुम खुश किस्मत हो
तुम्हारे ज़हन में तो है
उसको ही सम्हाल लो
अब वो तस्वीरें ज़हन से बाहर 'कभी' नही आएँगी
'अग्फा' हो या 'कैनन'
तुम्हारे साथ वो भी बड़े हो गए हैं"///
मैं चुपचाप बच्चों की तस्वीरें उतारने लगा
उसने बचपन का जामा उतार के
गेस की जींस वापस पहन ली थी

(भरत तिवारी की अन्य कविताएँ)


सरस्वती माथुर की कविता

यूँ तो मैं कहीं भी नहीं थी
न जमीन पर न
आकाश में
पर सुबह पन्नो पर
बिखरी थी
किरणों सी
दुपहर के सन्नाटे में
बिखरी थी
धूप सी
शाम की सिंदूरी
ओढ़नी में ढकी थी
सितारों सी
हवा में भी
बह रही थी
रुनझुन पायल सी
पर मुझे तुमने
पहचाना ह़ी नहीं !

(सरस्वती माथुर की अन्य कविताएँ)


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