शम्भु बादल की कुछ कविताएँ

नदी में कोई कंकड़ न डाले

नदी बहती है
इतिहास रचती है
उसकी कल‍-कल धारा का
गीत होता है
गीत कोई अवरुद्ध न करे

सुबह से शाम तक
शाम से सुबह तक
नदी
सूर्य को
चाँद.तारों को
धरती को
सीने से लगाये
लगातार चलती है
पथरीले पथ पर
पाँवों में पड़ते छाले का
गम नहीं

हमारे गाँव की
एक नदी है
अनन्त काल की नदी
कहाँ से आती है?
कहाँ जाती है?

हम नहीं जानते
सिर्फ इतना जानते हैं
यह तटों के बीच से
तटों के पार जाती है
नये तट बनाती है
प्यासों की तृप्ति में
फसलों की हँसी में
इसकी मुस्कान रहती है

पहाड़ी सीने का दर्द
पत्ती- टहनी की कहानी
पक्षी की पंख.कथा
गाय.बाघ के पग.चिह्न
कुल्हाड़ी की धार
हमारे मन का कसैलापन
गोलियों की तड़प
बमों के खण्डहर
खूनी हाथों की दुर्गन्ध
जीवन.मृत्यु के नाटक
बहुत कुछ लिये.दिये
चल रही है नदी

ध्यान रखना
नदी में कोई कंकड़ न डाले


बहेलिये

बहेलिये!
क्या बताओगे
हिमालय के आँचल में
विश्राम करते देवदारों की
उदार भव्यता और
उनके शीर्ष पर
मचलने वाली चिडि़यों के
गीतों की मोहकता
तेरे मन के
किसी छोर को क्यों नहीं छूतीं?

चहकती चिडि़या

एक दिन
चहकती चिडि़या
आ गयी मेरे पास
बड़ी खूबसूरत थी चिडि़या

मैंने एक.एक अंग
बड़े गौर से देखा
सुन्दरता की ज्योति
कहाँ से आयी?
मैं समझ न सका

चिडि़या की कोमल चोंच में
तिनका था
चिडि़या ने बडे़ यत्न से
बड़े प्रेम से
एक घोंसला बनाया
हम दोनों साथ.साथ
घोंसले में रहने लगे
सुबह हुआ.न.हुआ
चिडि़या
उड़ गयी
देखते.ही.देखते
आकाश में दूर
बादलों से आगे
चाँद.तारों के उस पार
गुम हो गयी चिडि़या

रह गयी चिडि़या की छवि
रह गया घोंसला
खाली, उदास

लोगों की नजर
जब घोंसले पर पड़ती है
चिडि़या याद में चहकती है


कवि की आवाज

कवि की सघन आवाज की
उफनती परतें उठा कर देखो
तुम्हें बहुत कुछ मिलेंगे:
चाँद के रूप
मेघों के रंग
आग.हवा.पानी के पैर
मिट्टी.पत्थर.काँटों के हाथ
पौधों के गीत
कम्प्यूटर की महक
मोबाइल के दृष्य
अन्तरिक्ष के रहस्य
आत्मा के बोल
जीभ

जीभ घायल है
अपने ही दाँतों से


मौत के नाखून

मौत के कितने नाखून
कितनी गहराई तक
धँसे हैं मेरे सीने में!

दर्द की कैसी.कैसी नदियाँ
टहल रही हैं होठों पर
अपने तमाम मगरमच्छों के साथ!

और तुम
अपनी हँसी की तलाष में
मेरा चेहरा रौंद रहे हो!?

वह

वह पत्थर पूजता है
मोम नहीं
इसलिए कि अन्दर का मोम
पिघले नहीं
पत्थर बने

वह निराकार मानता है
रूप नहीं
इसलिए कि असली रूप
दिखे नहीं
अदृष्य बने

और वह
षिकार खेलता रहे
इसी वन में


सपनों से बनते हैं सपने

हम कन्धों.भर लाते हैं सपने
जंगल से
गाँव
षहर
नगर
महानगर
अन्तरिक्ष से

छाया में
धूप में सूखाते हैं
पानी खिलाते हैं
जाड़ा सहाते हैं
सपने हो जाते हैं सीजण्ड

हम दुनिया को देखते हैं
सपनों के हाथ लिये
जमीन से
आकाष से
अन्धेरे
उजाले में

हमारे सपनों से बनते हैं सपने
गली.गली
सपने रोप
खुद भी
सपनों का जीवन बन
सपने बचा रखते हैं।

सूर्य और तारे चंदा

सुबह.सुबह
सूर्य ने
तारों को
चंदा को
उजाले के कमरे में
बन्द किया

शाम बीतते ही
तारों ने
चंदा ने
दरवाजे तोड़
मुक्ति की साँस ले
सूर्य को फाँस लिया
अँधेरे और
चाँदनी के
कमरे में
कैद किया

आ बाघ

आ बाघ!
इस तरह से आ
हमें अच्छा लगे
किसी सुन्दर आवरण में आ
बस, पंजे छिपा ले हमारे दादा!
दाँत ढक ले हमारे आका!

आ आ
आ हमारे बाबा!
हाथ जोड़ते हैं
पाँव पड़ते हैं

सच नहीं बोलना है
मत बोल
कुछ बोल
झूठ ही सही
कुछ बोलते रह
लगे कि नया.नया
बहुत कुछ होने जा रहा है
हम भी तुम्हारे साथ
कुछ.कुछ बोलते रहेंगे
हवाई सपनों की खुमारी में
सबको डुबोये रखेंगे
अपने विपक्षी
कुछ नहीं करेंगे
विश्वास करो दादा!
यकीन रखो बाबा!

काँटे

कंकड़.पत्थर
हम साफ कर रहे हैं
रास्तों पर कालीन
बिछा रहे हैं
घबराओ नहीं
जनता को लुभा लेंगे
छोटे व्यवसाय
सरकारी उद्योग
लोक.कल्याणकारी रूप
समाप्त करेंगे
कच्चा माल बेचेंगे
अपना सब कुछ बेचेंगे
सस्ते में ही बेचेंगे
तुम्हें सारी सुविधाएँ देंगे

अन्दर काफी रस है
आओ हमारे बाबा!
आओ हमारे दादा!

आफ द रिकार्ड:
एक विनती है
एक आरजू है
ऐ बाघ!
कुछ गुप्त राशि

फण्ड में चुपके से
जरूर दे देना


सम्मेलन

सम्मेलन लाया गया है
शहर छोटा है
सम्मेलन बहुत बड़ा
सो छलक.छलक पड़ता है

कविता.कहानी.साहित्य.संस्कृति
शोषण.गरीबी.सर्वहारा पर
बड़े.बड़े विचार हैं
वातानुकूलित सम्मेलन के पास

रंगबिरंगी साडि़यों में महिलाएँ
चहकती युवतियाँ
सपनीले युवक
खेतों.खदानों के लोग
सड़कों.फुटपाथों के जीव
सभी आँखें फाड़.फाड़ देखते हैं
कान खड़े कर.कर सुनते हैं
उनकी ही बात
कैसे.कैसे लोग
कैसे.कैसे कहते हैं!

मुर्गों की टाँगें बड़ी प्यारी हैं
सो मुर्गे फड़फड़ा रहे हैं टाँग.रहित
सम्मेलन के बाहर
अब मुर्गे बाँग नहीं देंगे
लोगों की टूटेगी नींद कैसे
इस गँवई षहर में!?

तुम्हारी पुस्तक पढ़ी है

एक बात बताऊँ?
तुम्हारी पुस्तक पढ़ी है
उसके तो शब्द.शब्द
झूठे अर्थ के दबाव से
फूट.फूटकर रोते हुए
बिखर जाते हैं

फिर नये लोभ से
नये.नये शब्द
बुलबुले की तरह उगते
युवा होते
बुढ़ाते
मरते चले जाते हैं


§ सूरज-घर, जबरा रोड
कोर्रा, हजारीबाग - 825301 (झारखण्ड)
मो0 - 09931182570
 


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