मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
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         Kritya2012  

 

जाने कितने बरस बीत गए, लेकिन तलवों के नीचे मचने वाली वह सुरसरी अभी तक याद है जो मामा के घर में खपरेल की ढलाऊ छत पर चलने से मचती थी... सुरसुरी को थामे हम इधर से उधर घूम आते
आज भी वह सुरसरी तलवें के कहीं नीचे दबी पड़ी है

आज भी उन खट्टे- मीठे बेर, कबीथ और बर्फ के गोलों का स्वाद जीभ पर टिका है जो गुल्लक तोड़ कर उड़ाए पैसों से खरीद कर खाए थे...

आज भी वह उड़ान याद है जो लोहे की भारी- भरकम लेडीज साइकिल पर घर से स्कूल और स्कूल से घर आने- जाने के लिए की जाती थी।

कोरे घड़े के पानी की कच्ची- कच्ची सी गन्ध, अलस सवेरे छत पर खटिया पर से खत सा खुलता आसमान, सितोलिया की कूदान, चपेटे को बाजीगरी.... ना जाने कितनी यादे , कितनी सुगन्धे, कितनी सुरसरियाँ

अब इन्हे एक संग्रहालय में जमा करने का वक्त आ गया है...

बच्चे इन्हें देखेंगे और कहेंगे,,,, अरे ये लोग कैसे जीते थे, बिना वीडियों गेम या कम्प्यूटर के, बिना किसी चीज के...

उन्हे हम कैसे बतायेंगे कि हमारे सपनों को खड़ा होने के लिए रंगबिरंगे प्लास्टिक की जरूरत नहीं होती थी....

रति सक्सेना

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स्त्री की तीर्थयात्रा

सबेरे सबेरे
उसने बर्तन साफ किए
घर भर के जूठे बर्तन
झाड़ू पोंछे के बाद
बेटियों को संवार कर
स्कूल रवाना किया
सबके लिए बनाई चाय

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
*
उसने बार बार कहा था मृत्यु के बाद मत बनाना मेरा बुत
मैं नहीं चाहता बहरा, गूँगा, निश्चल होना

मैं चाहता हूँ चलता रहूँ, बोलता रहूँ, सुनता रहूँ
मेरी जिह्वा से उपजे शब्दों में
दुनिया भर के शब्दहीनों की बस्तियाँ हों

मेरे कानों में धरती के सबसे अधिक कुचले गए
घास के तिनके की कराह पहुँचे
और कुचल कर गुजरते बूटों की आवाज

राजेन्द्र नागदेव
*
एक लंबे से
बरामदे में कमरे आठ
विशाल आँगन में पांच पुत्रों के
परिवार के पिता
बरगद के पेड़ के नीचे
खटिया पर लेटे आराम फरमा रहे थे।

पोते-पोतियाँ गिल्ली-डंडा खेल रहे थे....
वैसे, इससे ज्यादा सुख
क्या होगा उन्हें, भला
पंकज त्रिवेदी
*
तुमने जलाया तो क्या जलाया
तस्वीरे कुछ कश्मीर की
खूबसूरती की
और हमारे छूटे घरों की दीवारों पर टंगे
ईश्वर के फोटो
जो हमारे विश्वास थे
तुमने जलाई छत की शहतीरें
फर्श पर बिछे रह गए कालीन
जिनपर नाज था दस्तकारों को

आदर्श अजीत


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प्रत्येक गीत बीते युग के सन्दर्भ में अपने समय का नवगीत होता है और प्रत्येक नवगीत आने वाले कल की पृष्ठभूमि मे अपने जमाने का गीत होता है। ये नव, नूतन या अभिनव उपसर्ग तो पीढ़ियों के अन्तर को उनमें छिपे अस्तित्व के संघर्ष को बताते हैं। इनका देशकाल से सम्बन्ध है, शाश्वती का इनसे क्या लेना देना? फूलों की माला में छिपे धागे की तरह एक ही प्यास पूरे गीति तत्व को संभाले हुए है और वह है ऋतुमती प्यास! प्यास जो ऋतुमती है, ऋतुमती जो प्यासी है अर्थात गीतकार और संगीतकार के बीच किसी नवगीत के सृजन की अतृप्त उत्सुकता, उर्वर जिज्ञासा , नए मुहावरे की तलाश , पुराने को छोड़ कर नए शिल्प को ग्रहण करने की आनन्ददायक उत्तेजना , एक चुनौती , किसी टूटन को ... शब्द से सी देने की एक लयात्मक ललक, सूई धागे की तरह एक -दूसरे में होने न होने के बीच की अनुभूति , मिट्टी की गंध के आकाशी सपनों को थामने और आकाशी सपनों के मिट्टी सने पाँवों को टटोलने की अनथक कोशिश का नाम नवगीत है, जिससे हर गीत को नवगीत बनने के लिए गुजरना पड़ता है। मैं किसी आन्दोलन से जुड़े नवगीत की बात नहीं करता, मैं सच्ची कविता के जुड़े गीति तत्व की चर्चा करता हूँ। कविता का सम्बन्ध साहित्यिक बौद्धिकता से नहीं , चिन्तन की लयात्मक जागरुकता से होता है। कविता की यात्रा हृदय तक होती है। वह एक सतत प्रवाहिणी भागीरथी है....
डा किशोर काबरा
  

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बहेलिये

बहेलिये!
क्या बताओगे
हिमालय के आँचल में
विश्राम करते देवदारों की
उदार भव्यता और
उनके शीर्ष पर
मचलने वाली चिडि़यों के
गीतों की मोहकता
तेरे मन के
किसी छोर को क्यों नहीं छूतीं?

चहकती चिडि़या

एक दिन
चहकती चिडि़या
आ गयी मेरे पास
बड़ी खूबसूरत थी चिडि़या

मैंने एक.एक अंग
बड़े गौर से देखा
सुन्दरता की ज्योति
कहाँ से आयी?
मैं समझ न सका

चिडि़या की कोमल चोंच में
तिनका था
चिडि़या ने बडे़ यत्न से
बड़े प्रेम से
एक घोंसला बनाया
हम दोनों साथ.साथ
घोंसले में रहने लगे
सुबह हुआ.न.हुआ
चिडि़या
उड़ गयी
देखते.ही.देखते
आकाश में दूर
बादलों से आगे
चाँद.तारों के उस पार
गुम हो गयी चिडि़या

रह गयी चिडि़या की छवि
रह गया घोंसला
खाली, उदास

लोगों की नजर
जब घोंसले पर पड़ती है
चिडि़या याद में चहकती है
मौत के नाखून

मौत के कितने नाखून
कितनी गहराई तक
धँसे हैं मेरे सीने में!

दर्द की कैसी.कैसी नदियाँ
टहल रही हैं होठों पर
अपने तमाम मगरमच्छों के साथ!
शम्भु बादल
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कुमार सम्भव का हिन्दी अनुवाद

द्वारा बजनाथ प्रसाद शुक्ल भव्य

*
देवात्मा नगराज हिमालय, पूर्व पश्विमी सागर में।
हो प्रविष्ट शंस्थित है महि के, मानदंड सा उत्तर में।।

*
पृथु प्रेरित पृथ्वी को सुरभी, दक्ष मेरु को दोग्धा कर।
बना नगों ने हिम को गो सुत, दुहे रत्न ओषधि भास्वर।।

*
इस अनन्त रत्नोद्भव की श्री, मिट न सकी हिम दूएण से।
एक दोष धँक उठे गुणों से ज्यों शशि लान्छन कर गण से।।

*
है अप्सरा विलास प्रसाधन, धातु संपदाएँ इस पर।
जो संध्या ब्रम असमय रचतीं, घन खंडों को रंजित कर।।

*
इसके कटि तट सिद्ध जलद तल, सित छाया सेवन करते।
वृष्टि विवश, तब चढ़ शिखरों पर, आतप सुख से मन भरते।।

*
इस पर हिम के गल जाने से, चिह्न सिंह पद के न रहें।
ऐसे में नख विथुरित मुक्ता, उनके पथ की दिशा कहें।।

*
यहाँ भोजतरु वल्कल गज के, शुण्ड बिन्दु सम अरुण दिखें।
धातु रंग से विद्या धरियाँ, उन पर जो कामार्ति लिखें।।
*
यह गिरि निजी गुफाओं में से, निकले हुए पवन द्वारा।
तान किन्नरों को दे ज्यों भर, वेणु रन्ध्र में स्वर धारा।।
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VOL - VII/ ISSUE-VII
(जनवरी- 2012
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


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