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जाने कितने बरस बीत गए,
लेकिन
तलवों के नीचे मचने वाली वह सुरसरी अभी तक याद है जो मामा के घर
में खपरेल की ढलाऊ छत पर चलने से मचती थी... सुरसुरी को थामे हम
इधर से उधर घूम आते
आज भी वह सुरसरी तलवें के कहीं नीचे दबी पड़ी है
आज भी उन खट्टे- मीठे बेर, कबीथ और बर्फ
के गोलों का स्वाद जीभ पर टिका है जो गुल्लक तोड़ कर उड़ाए पैसों से
खरीद कर खाए थे...
आज भी वह उड़ान याद है जो लोहे की भारी-
भरकम लेडीज साइकिल पर घर से स्कूल और स्कूल से घर आने-
जाने के लिए की जाती थी।
कोरे घड़े के पानी की कच्ची- कच्ची सी
गन्ध, अलस सवेरे छत पर खटिया पर से खत सा खुलता आसमान,
सितोलिया की कूदान, चपेटे को बाजीगरी.... ना जाने कितनी
यादे , कितनी सुगन्धे, कितनी सुरसरियाँ
अब इन्हे एक संग्रहालय में जमा करने का वक्त आ गया है...
बच्चे इन्हें देखेंगे और कहेंगे,,,, अरे ये लोग कैसे जीते थे, बिना
वीडियों गेम या कम्प्यूटर के, बिना किसी चीज के...
उन्हे हम कैसे बतायेंगे कि हमारे सपनों को खड़ा होने के लिए
रंगबिरंगे प्लास्टिक की जरूरत नहीं होती थी, हम शीशियों के ढक्कनों
से, छिलकों से, बीजों से घर संसार सजा लेते थे। नीम की निम्बोरियाँ
नन्हें आम में तब्दील हो जाती थी... मन ही मन एक नया संसार रच जाता
था, जहाँ ऊब शब्द ही नहीं था.
हमारे बड़े हमें गेम खरीद कर नहीं देते थे, बल्कि ऐसी कहानियाँ देते
थे, जिन्हे हम खुली पलको से सुनते और बन्द पलकों से गुनते थे...
ना जाने क्यों नए वर्ष का उन्माद मन में नहीं घुस पा रहा है,

आतीष बाजी की चकाचौंध मन को नहीं जुड़ा पा रही है,
मनबार बार पीछे की ओर मुड़ रहा है,
फिर भी नए वर्ष की शुभकामनाएँ, आप सभी को
रति सक्सेना
श्वेत श्याम चित्र राजेन्द्र परदेशी जी द्वारा बनाए गए हैं।
पत्र-संपादक
के नाम
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