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कुमार सम्भव का हिन्दी अनुवाद

द्वारा बजनाथ प्रसाद शुक्ल भव्य
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देवात्मा नगराज हिमालय, पूर्व पश्विमी सागर में।
हो प्रविष्ट शंस्थित है महि के, मानदंड सा उत्तर में।।
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पृथु प्रेरित पृथ्वी को सुरभी, दक्ष मेरु को दोग्धा कर।
बना नगों ने हिम को गो- सुत, दुहे रत्न ओषधि भास्वर।।
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इस अनन्त रत्नोद्भव की श्री, मिट न सकी हिम दूएण से।
एक दोष ढँक उठे गुणों से ज्यों शशि लान्छन कर गण से।।
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है अप्सरा विलास प्रसाधन, धातु संपदाएँ इस पर।
जो संध्या ब्रम असमय रचतीं, घन खंडों को रंजित कर।।
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इसके कटि तट सिद्ध जलद तल, सित छाया सेवन करते।[
वृष्टि विवश, तब चढ़ शिखरों पर, आतप सुख से मन भरते।।
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इस पर हिम के गल जाने से, चिह्न सिंह पद के न रहें।
ऐसे में नख विथुरित मुक्ता, उनके पथ की दिशा कहें।।
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यहाँ भोजतरु वल्कल गज के, शुण्ड बिन्दु सम अरुण दिखें।
धातु रंग से विद्याधरियाँ, उन पर जो कामार्ति लिखें।।
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यह गिरि निजी गुफाओं में से, निकले हुए पवन द्वारा।
तान किन्नरों को दे ज्यों भर, वेणु रन्ध्र में स्वर धारा।।
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इस गिरि पर गज गण्ड कण्डू वश, देवदारु पर घर्ष करें।
इससे क्षीर स्राव कर तरु वे, सौरभ से सब शिखर भरें।।
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निशि के दीपित ओषधियों से , गुहा सदन इसके द्यौतित।
रमें रमणियाँ वनचारी संग, पा प्रदीप ये तैल रहित।।
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कठिन शिला सम हिम पथ पर जब, एँड़ी अंगुली शीत व्यथित।
किन्नरी तजें न तदपि मन्द गति, सहज जघन कुच भारभरित।।
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दिन में भीत गुफागत तम की, रक्षा रवि से यह करता।
शरणागत क्षुद्रों के प्रति भी, कृपा मज्जन अनुसरता।।
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इस गिर के गिरिराज नाम को, चमरी गौ सार्थक करती।
पुच्छ चँवर सित चन्द्र किरण सी डुला राज गौरव भरती।।
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