विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की कविताएँ

स्त्री की तीर्थयात्रा


सबेरे सबेरे
उसने बर्तन साफ किए
घर भर के जूठे बर्तन
झाड़ू पोंछे के बाद
बेटियों को संवार कर
स्कूल रवाना किया
सबके लिए बनाई चाय

जब वह छोटा बच्चा जोर जोर रोने लगा
वह बीच में उठी पूजा छोड़कर
उसका सू सू साफ किया

दोपहर भोजन के आखिरी दौर में
आ गए एक मेहमान
दाल में पानी मिला कर
किया उसने अतिथि सत्कार
और बैठ गई चटनी के साथ
बची हुई रोटी लेकर

क्षण भर चाहती थी वह आराम
कि आ गं बेटियाँ स्कूल से मुरझाई हुइ
उनके टंट घंट में जुटी
फिर जुटी संझा की रसोई में

रात में सबके बाद खाने बैठी
अबकी रोटी के साथ थी सब्जी भी
जिसे पति ने अपनी रुचि से खरीदा था

बिस्तर पर गिरने से पहले
वह अकेले में थोड़ी देर रोई
अपने स्वर्गीय बाबा की याद में

फिर पति की बाँहों में
सोचते सोचते बेटियों के ब्याह के बारे में
गायब हो गई सपनों की दुनिया में
और नीन्द में ही पूरी कर ली उसने
सभी तीर्थों की यात्रा।


 (विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अन्य कविताएँ)


राजेन्द्र नागदेव

पत्थर में बन्द आदमी


उसने बार बार कहा था मृत्यु के बाद मत बनाना मेरा बुत
मैं नहीं चाहता बहरा, गूँगा, निश्चल होना

मैं चाहता हूँ चलता रहूँ, बोलता रहूँ, सुनता रहूँ
मेरी जिह्वा से उपजे शब्दों में
दुनिया भर के शब्दहीनों की बस्तियाँ हों

मेरे कानों में धरती के सबसे अधिक कुचले गए
घास के तिनके की कराह पहुँचे
और कुचल कर गुजरते बूटों की आवाज

मैं तमाम उत्पीड़ितों को
षडयन्त्र के चक्रव्यूह से निकालना चाहता हूँ
और आधे अधूरे शरीरो में
स्पन्दित रहना चाहता हूँ बैसाखी बन कर

अपने बयान में उसने और भी बहुत कहा था

लोगों की भीड़ लगी थी, कंधों पर झौले लटके थे
झोलों में छलनियाँ थीं
और सबके पास ठहरने के लिए समय बहुत कम
(उन्हें अन्य अधिक जरूरी काम करने थे)

उस आदमी को उन्होंने छाना
और जिसने जितना जरूरी समझा
उसे अपने लिए उतना बचा लिया
जबकि, जरूरी तो वह पूरा का पूरा था

फिर उन्होंने तीन गज लम्बे, एक गज चौड़े पत्थर को
इस तरह तोड़ा, काटा और घिसा कि वह आदमी बन गया
इस आदमी का चेहरा बिल्कुल उस आदमी जैसा था
इस आदमी के हाथ बिल्कुल उस आदमी जैसे थे
इस आदमी के पाँव बिल्कुल उस आदमी जैसे थे
आदमी को फिर सदियों के लिए खड़ा कर दिया गया

वह आदमी सबसे भव्य और ऊँचें स्तम्भ पर खड़ा है
जहाँ अनमने भाव से केवल उसके पाँवों की उंगलियाँ छूई जाएँगी
अथवा, दूर से उछाल कर फेंकी जाएँगी फूलमाला कंधों पर

बस, इतना ही बचा है छना हुआ आदमी अब शहर में

उस आदमी की आत्मा कभी उस पत्थर के अन्दर
विश्राम की मुद्रा में लेट नहीं सकती
(उसकी इच्छा को इस तरह पूरा किया गया)

आदमी को इतने ऊपर ले जाकर रख दिया गया है
कि उसकी आवाज उतर कर नहीं पहुँचती किसी तक
(उसकी आवाज मुश्किलें पैदा करती थीं)

उस आदमी को अनन्त काल तक बिना पलक झपकाए
इतनी ऊँचाई से देखते रहने होंगे अब
शहर के समस्त काले कारोबार
लाख लाख प्राणौं की अन्तहीन त्रासदियों से
गुजरना पड़ेगा पल प्रतिपल
मूक रह कर झेलने होंगे भ्रष्टतन्त्र के तमाम दंश

और...
वह हिल भी नहीं सकेगा
न आवेश में, न आक्रोश में, न पीड़ा में
न सहानुभूति में, न करुणा में।

 


हरप्रीत कौर

सितारों पर चढ़ने की ख़्वाहिश लिए बैठी थी एक बादल पर,
बादल में कितने छिद्र थे पता नहीं था अब तक,
तेज हवा आई सब कुछ ले गई,
न ही रहा बादल और न ही रही सितारों की महफिल।

महफिल जो मदहोश थी,
कामयाबी की वो डोर थी,
उजियाला और सुहाना समा था,
निराशाओं का तूफान वहाँ थमा था ।

सितारों की चमक का अन्दाज़ा न था मुझे,
पर आँधियों का भवंडर छोड़ता है किसे,
न ही सितारे न ही चाँदनी,
तन्हाइयों में कोई बात भी कैसे बनती ।

पर मन नहीं माना,
उसे अपना नहीं बल्कि अपनों के लिए था कुछ कर दिखाना,
आत्मा की एक आवाज़ आई,
उसने फिर सितारों पर चढ़ने की गु्हार लगाई ।

रात दिन एक हुए,
भूख प्यास तृप्त हुई,
एक टिमटिमाती रोशनी आई,
और लगा सितारों की महफिल मेरे दिल में उतर आई ।



पंकज त्रिवेदी

कविता


एक लंबे से
बरामदे में कमरे आठ
विशाल आँगन में पांच पुत्रों के
परिवार के पिता
बरगद के पेड़ के नीचे
खटिया पर लेटे आराम फरमा रहे थे।

पोते-पोतियाँ गिल्ली-डंडा खेल रहे थे....
वैसे, इससे ज्यादा सुख
क्या होगा उन्हें, भला

तभी -
तीसरे नंबर का पुत्र
बड़ा सा मछलीघर उठा लाया
बूढ़े पिता को दिखाता हुआ बोला,
कितनी बढ़िया मछलियां हैं, कैसा लगा.....?
पिता बोले -
लग तो रहा है काफी अच्छा, मगर......।

मगर क्या? बेटे ने पूछा
तुमने तो मछलियां कैद कर रखी है

नहीं बाबूजी,
हम तो उन्हें खाना देंगे,
वैसे तो बड़ा-सा है उनका शीशमहल.....
मेरे मुन्ने ने जिद की तो ले आया

अरे भाई,
पिता गमगीन होकर बोले,
उनका यह शीशमहल सागर से बड़ा है क्या?

तब बेटा बोला,
आजादी इतना ही मायने रखती है
आपके लिए
तो....तो ... क्या? निकाल ले भड़ास अपनी....
हमने आजादी के लिए लाठियां खाई हैं
ठीक से जानते हैं हम आजादी को....

तो सुनो....
हम भी चाहते हैं आजादी
अपने घर में... अलग....

पिता की बूढ़ी आँखें
हल्के से नम हुई...
धीरे से बोले -

परिवार तो बरगद की छाँव है
तुम जो ठीक समझो...
खुश रहो, मगर सुनते भी जाओ -
तुम सागर को छोड़ एक्वेरियम में जा रहे हो
अंग्रेजों की लाठी खाई है
और इंगलिश सीखी है उनसे ही...
कभी अपने आपको अकेला महसूस करो
तो...तुम्हारे इसी एक्वेरियम के सामने बैठकर
मछलियों की आंखों में झांकना
पढ़ना उनकी व्यथा को....

बेटा बड़बड़ाता हुआ चला गया
बूढ़ा खटिया पर लेट गया
बरगद के पत्तों से
ठंडी हवा बहने लगी....


(पंकज त्रिवेदी की अन्य कविताएँ)


आदर्श अजीत की कविताएँ

अंधेरे में


तुमने जलाया तो क्या जलाया
तस्वीरे कुछ कश्मीर की
खूबसूरती की
और हमारे छूटे घरों की दीवारों पर टंगे
ईश्वर के फोटो
जो हमारे विश्वास थे
तुमने जलाई छत की शहतीरें
फर्श पर बिछे रह गए कालीन
जिनपर नाज था दस्तकारों को
वो नक्काशी
आखरोट की लकड़ी पर
जड़ीभूत पसीने की गंध
‌और वो
लकड़ी की अल्मारी
जिसमें मेरी गोपनीयता थी
संकोच थे
और आत्मीय अंधेरे भी

तुमने ढहाया तो क्या ढहाया
मिट्टी की बनी चंद ईंटे
और गदवंजे पर रखे
वो पानी से भरे मटके...
तुमने मिटा डाली
बुजुर्गों की निशानी
कश्मीरियत की कहानी

तुमने लूटे
कागज के चंद टुकड़े
इसे तुम दौलत कहते हो
वो मेरे कपड़ै
जो तुमने पहन रखे हैं
उससे तुम नहीं कहलाओगे
मेरा पर्याय
और वो मेरा बेजान टी. वी.
और मेरा बेजुबान रेडियो का खोखा
तुम नहीं जानते
मेरे सपनों में आकर यहाँ
जलावतनी में
बज उठते हैं रात भर

वो मेरी शेल्फ पर जो किताबे
जलाई तुमने
काश तुम उनकी बिलखती रोशनी में भी
देख पाते
कि तुम कितने अंधेरे में हो

(उर्दू से अनुवादः शशि कौल)


(आदर्श अजीत की अन्य कविताएँ)


तैयब हुसैन की कविताएँ

फैंकी हुई बीड़ी


अपने जानते तो
मेरा सर्वस्व चूसकर
उसने मेरी आग
बुझा ही दी थी
और उके पीछे आने वाला
मुझे जूतों की नोक से
कूड़ो में उछालकर
समझा था
राहत की साँस मिल गई उसे।
मैँ इस हालत में
बजाय उन कचड़ों को जलाने के
अपने उपर राख की कुछ और परतें
जमा कर रहा था
यह सोच कर कि
दूर किसी आसमानी अँखों की कोर से
सहानुभूति की बूँदे टपकेंगी
और मेरा नया जन्म होगा।

तभी जिन्दगी से पहले की मौत जैसा आश्चर्य
एक तूफान ने देखा
‌और मुझे झकझोर दिया
मैंने अपने में सुलगती
शक्ति सचमुच पहली बार पहचानी
और अब
सरचढ़ों की छाती पर सवार
चुनौती दे रहा हूँ रौंदते पाँवो को

मुझे देखने को आगे बढ़ आये
ओ मुझ सरीके तमाशायी!
क्या तुममे कुछ भी नहीं बचा है
सुलगने को?


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