हरप्रीत कौर
सितारों पर चढ़ने की ख़्वाहिश लिए बैठी थी एक बादल पर,
बादल में कितने छिद्र थे पता नहीं था अब तक,
तेज हवा आई सब कुछ ले गई,
न ही रहा बादल और न ही रही सितारों की महफिल।
महफिल जो मदहोश थी,
कामयाबी की वो डोर थी,
उजियाला और सुहाना समा था,
निराशाओं का तूफान वहाँ थमा था ।
सितारों की चमक का अन्दाज़ा न था मुझे,
पर आँधियों का भवंडर छोड़ता है किसे,
न ही सितारे न ही चाँदनी,
तन्हाइयों में कोई बात भी कैसे बनती ।
पर मन नहीं माना,
उसे अपना नहीं बल्कि अपनों के लिए था कुछ कर दिखाना,
आत्मा की एक आवाज़ आई,
उसने फिर सितारों पर चढ़ने की गु्हार लगाई ।
रात दिन एक हुए,
भूख प्यास तृप्त हुई,
एक टिमटिमाती रोशनी आई,
और लगा सितारों की महफिल मेरे दिल में उतर आई ।
पंकज त्रिवेदी
कविता
एक लंबे से
बरामदे में कमरे आठ
विशाल आँगन में पांच पुत्रों के
परिवार के पिता
बरगद के पेड़ के नीचे
खटिया पर लेटे आराम फरमा रहे थे।
पोते-पोतियाँ गिल्ली-डंडा खेल रहे थे....
वैसे, इससे ज्यादा सुख
क्या होगा उन्हें, भला
तभी -
तीसरे नंबर का पुत्र
बड़ा सा मछलीघर उठा लाया
बूढ़े पिता को दिखाता हुआ बोला,
कितनी बढ़िया मछलियां हैं, कैसा लगा.....?
पिता बोले -
लग तो रहा है काफी अच्छा, मगर......।
मगर क्या? बेटे ने पूछा
तुमने तो मछलियां कैद कर रखी है
नहीं बाबूजी,

हम तो उन्हें खाना देंगे,
वैसे तो बड़ा-सा है उनका शीशमहल.....
मेरे मुन्ने ने जिद की तो ले आया
अरे भाई,
पिता गमगीन होकर बोले,
उनका यह शीशमहल सागर से बड़ा है क्या?
तब बेटा बोला,
आजादी इतना ही मायने रखती है
आपके लिए
तो....तो ... क्या? निकाल ले भड़ास अपनी....
हमने आजादी के लिए लाठियां खाई हैं
ठीक से जानते हैं हम आजादी को....
तो सुनो....
हम भी चाहते हैं आजादी
अपने घर में... अलग....
पिता की बूढ़ी आँखें
हल्के से नम हुई...
धीरे से बोले -
परिवार तो बरगद की छाँव है
तुम जो ठीक समझो...
खुश रहो, मगर सुनते भी जाओ -
तुम सागर को छोड़ एक्वेरियम में जा रहे हो
अंग्रेजों की लाठी खाई है
और इंगलिश सीखी है उनसे ही...
कभी अपने आपको अकेला महसूस करो
तो...तुम्हारे इसी एक्वेरियम के सामने बैठकर
मछलियों की आंखों में झांकना
पढ़ना उनकी व्यथा को....
बेटा बड़बड़ाता हुआ चला गया
बूढ़ा खटिया पर लेट गया
बरगद के पत्तों से
ठंडी हवा बहने लगी....
(पंकज त्रिवेदी की अन्य कविताएँ)
आदर्श अजीत की कविताएँ
अंधेरे में
तुमने जलाया तो क्या जलाया
तस्वीरे कुछ कश्मीर की
खूबसूरती की
और हमारे छूटे घरों की दीवारों पर टंगे
ईश्वर के फोटो
जो हमारे विश्वास थे
तुमने जलाई छत की शहतीरें
फर्श पर बिछे रह गए कालीन
जिनपर नाज था दस्तकारों को
वो नक्काशी
आखरोट की लकड़ी पर
जड़ीभूत पसीने की गंध
और वो
लकड़ी की अल्मारी
जिसमें मेरी गोपनीयता थी
संकोच थे
और आत्मीय अंधेरे भी
तुमने ढहाया तो क्या ढहाया
मिट्टी की बनी चंद ईंटे
और गदवंजे पर रखे
वो पानी से भरे मटके...
तुमने मिटा डाली
बुजुर्गों की निशानी
कश्मीरियत की कहानी
तुमने लूटे
कागज के चंद टुकड़े
इसे तुम दौलत कहते हो
वो मेरे कपड़ै
जो तुमने पहन रखे हैं
उससे तुम नहीं कहलाओगे
मेरा पर्याय
और वो मेरा बेजान टी. वी.
और मेरा बेजुबान रेडियो का खोखा
तुम नहीं जानते
मेरे सपनों में आकर यहाँ
जलावतनी में
बज उठते हैं रात भर
वो मेरी शेल्फ पर जो किताबे
जलाई तुमने
काश तुम उनकी बिलखती रोशनी में भी
देख पाते
कि तुम कितने अंधेरे में हो
(उर्दू से अनुवादः शशि कौल)
(आदर्श अजीत की अन्य कविताएँ)
तैयब हुसैन की कविताएँ
फैंकी हुई बीड़ी
अपने जानते तो
मेरा सर्वस्व चूसकर
उसने मेरी आग
बुझा ही दी थी
और उके पीछे आने वाला
मुझे जूतों की नोक से
कूड़ो में उछालकर
समझा था
राहत की साँस मिल गई उसे।
मैँ इस हालत में
बजाय उन कचड़ों को जलाने के
अपने उपर राख की कुछ और परतें
जमा कर रहा था
यह सोच कर कि
दूर किसी आसमानी अँखों की कोर से
सहानुभूति की बूँदे टपकेंगी
और मेरा नया जन्म होगा।
तभी जिन्दगी से पहले की मौत जैसा आश्चर्य
एक तूफान ने देखा
और मुझे झकझोर दिया
मैंने अपने में सुलगती
शक्ति सचमुच पहली बार पहचानी
और अब
सरचढ़ों की छाती पर सवार
चुनौती दे रहा हूँ रौंदते पाँवो को
मुझे देखने को आगे बढ़ आये
ओ मुझ सरीके तमाशायी!
क्या तुममे कुछ भी नहीं बचा है
सुलगने को?