मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
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कृत्या पत्रिका को चलते हुए सात साल पूरे हुए और हाल में ही सातवां कृत्या कवितोत्सव तिरुवनन्तपुरम , केरल में सम्पन्न हुआ। कृत्या का यह सफर केरल से आरम्भ हुआ था और जम्मू, चण्डीगढ़, मैसूर , नागपुर आदि का सफर करते हुए पुनः तिरुवनन्तपुरम में आ पहुँचा। अपने आधार स्थान में काम करने से कुछ सुविधा तो होती ही है। सबसे पहली तो यही कि हमें किसी का मुँह नहीं देखना पड़ता और हर कार्य को अपने तरीके से किया जा सकता है। यह निश्चिन्तता कृत्या के आयोजन के लिए बेहद लाभप्रद रही।
कृत्या के इस साँतवे उत्सव में सबसे महत्वपूर्ण बात थी, अन्तर्राष्ट्रीय कवियों का उच्च स्तर। मेरी पिछली मैडिलिन यात्रा ने मदद की , जिससे हम संसार के चुने हुए श्रेष्ठ कवियों को आमन्त्रित कर पाए।भाषा की विविधता पर हमने आरम्भ से ध्यान दिया। और सबसे ज्यादा महत्व दिया स्थानीय भाषा में अनुवाद को। केरल साहित्य अकादमी ने हमसे पुस्तक छापने का जो वायदा किया, वह हमारे अनुवादकों के लिए भी प्रेरणादायक था़ ।
इस वर्ष कृत्या की टीम में भी इजाफा हुआ, इटली की जिंगोनिया जिंगोने और वेनिस की अन्ना लोम्बार्डौ ने तकनीकि क्षेत्र संभाला और स्थानीय एन एस एस कालेज की छात्राओं ने अनुवाद पाठन का जिम्मा लिया।
रति सक्सेना

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सूरज के साथ -साथ
संध्या के मंत्र डूब जाते थे ,
घंटी बजती थी अनाथ आश्रम में
भूखे भटकते बच्चों के लौट आने की ;
दूर -दूर तक फैले खेतों पर ,
धुंए में लिपटे गाँव पर ,
वर्षा से भीगी कच्ची डगर पर ,
जाने कैसे रहस्य भरा करुण अन्धकार फ़ैल जाता था ;
और ऐसे में आवाज़ आती थी पिता
तुम्हारे पुकारने की ,
मेरा नाम उस अंधियारे में
बज उठता था, तुम्हारे स्वरों में |
मै अब भी हूँ
सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
*

हमारे जीवन में
प्रेम था कुछ इस तरह -

कभी छूने से पहले
खरगोश में बदल जाता मै

कभी चखने से पहले
इमली में बदल जाती वह

कभी देखने से पहले
चाँद में बदल जाता मै

कभी चूमने से पहले
तितली में बदल जाती वह -

कमलेश्वर साहू
*

क्या तुम जलाशय के करीब मुंह बंद कर अंकुरित हो पाओगे धूप वर्षा में
अपमानित देशज साग -भाजी की तरह
यदि न ऊग पाओ तो तुम विप्लव के उत्तराधिकारी नहीं

भरी धूप में तुम पाताल को छेद कर ऊपर आ सकते हो भूगर्भ से
तुम कलसी एवं अंजुरी से प्यास बुझाना जानते हो
यदि न कर सको ऐसा तो रक्त पताका हाथ में मत लो
नवारुण भट्टाचार्


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कविता क्या है? या क्या है कविता का सच ? इस मुद्दे पर चर्चा होना नई बात नहीं है। हर काल और समाज का अपना मन्तव्य होता है। आज के दौर में जहाँ बुद्धिजीवी समाज कविता को समाज के आसपास देखना चाहता है तो वहीं समाज का जनसामान्य हिस्सा फिल्मी रोमान्टिक कविता से प्रभावित दिखता है। आलोचक कहता है कि वह कविता अच्छी है जिसमें पसीने की गंन्ध आती हो, कोई सन्देह नहीं जमीन से जुड़े लोगों के साथ जुड़ी कविता की अपनी अहमीयत है, लेकिन जमीन से क्या आदमी ही जुड़ा है? जमीन जितनी आदमी की है, उतनी ही पेड़- पौधों, कीड़ों- मकोड़ों की है, उतनी ही चींटी- चिड़िया और चील की है। ऐसा नहीं कि आदमी ने इन को विषय नहीं बनाया, तितली, चिड़िया, फूल- पत्ते तो शुरु से कविता का विषय रहे हैं, हाँ कीड़ों- मकोड़ो को सकारात्मक स्थान नहीं मिल पाया। लेकिन आज की कविता में से धीरे- धीरे फूल- पत्ती, चिड़िया बादल अलग हो रहे हैं, होना भी चाहिये, हमे अपने असली संसार के लिए जगह जो चाहिये। वह संसार जहाँ हम रहते हैं, कितने पेड़ बचे हैं जो शहरों में चिड़ियाँ चहचहाएंगी। कितने फूल हैं जो तितलियाँ मंडराएगी। यदि कुछ है भी तो वह इतना दिखावटी कि चिड़िया की चहचहाहट भी नकली बन जाए।
पिछले दिनों जब से मैने कालडि विश्वविद्यालय के होस्टल में रहना शुरु किया, मैंने यह महसूस किया कि काफी कुछ था जिसे मैं भूल चुकी थी, या फिर मैं जानती ही नहीं थीं।

रति सक्सेना

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बादलों को कौन चलाता है
धकेलता है कौन उन्हें
हवा के सिवा?
पर हवा को कौन देता है गति
कोई तो होगा ?

कौन है जो चुपचाप पेड़ों को लादता है फलों से
कौन है जो मुझसे लिखवाता है कविता
कोई तो होगा ?

क्या एक ही है यह 'कोई तो' ?
जो फलों से लाद देता है पेड़ों को
और हवा को देता है गति

गति देने वाले इस 'कोई तो' को
और फल लादने वाले इस चुप्पा को
अब महसूस कर रहा हूँ मैं
अपने मन के भीतर गहरे कहीं ।

हर टहनी पर एक फूल

झपकी आ गई
और मैंने देखा एक सपना

हर पेड़ की
हर टहनी पर
खिला हुआ है एक फूल

जैसे खिला हो मन
इस दुनिया में
हर किसी का
*
बारिश के
दिन थे

मौसम
साफ़ हुआ जब
कवि-पत्नी मुझे देखने आई
अख़बार के लिफ़ाफ़े में
कुकुरमुत्ते लाई

कवि-पत्नी
चित्रकार-पत्नी
एलेन फ़ुरमान की तरह थी
जैसा रुबेन्स ने उसे रचा है चित्रों में
और
कुकुरमुत्ते
कुकुरमुत्तों की तरह

जापानी कवि ज्यून तकामी की कुछ कविताएँ
अनुवाद और प्रस्तुति
अनिल जनविजय

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बाबा शेख़ फ़रीद

फ़रीदा जे तू अक्ल लतीफ़,काले लिख न लेख
अपन्ड़े गिरिवान में, सिर नीवा कर देख.

फ़रीदा ख़ाक न निंदिए, ख़ाक जेड न कोई
जिवंदियाँ पैरां तले, मोयां ऊपर होए.

फ़रीदा जंगल-जंगल क्या भवे,वन्न कंडा मोड़ेह
वस्सी रब्ब हियालेया, जंगल क्या ढूंढे

फ़रीदा लोडे दाख बिजुरिया ,किक्कर बीजे जट,
हंडे उन कतायिदा, पैदा लोडे पट..

फ़रीदा गलिए चिकड़ दूर घर,नाल पियारे नेह,
चला ता भीजे कम्भ्ली, रहा ता टुटे नेह....

रुखी-सुखी खा के ठंडा पान्नी पी,
फ़रीदा देख परायी चोपड़ी, ना तरसाओ जी,

बिरहा बिरहा आखिए , बिरहा तू सुलतान,
फ़रीदा जित तन्न बिरहा ना उपजे,सो तन्न जाण मसान,..

फ़रीदा कोठे मंडप माड़ियां, एत ना लाये चित,
मिटटी पेई अतोल्वी, कोई ना होसी मित,

फ़रीदा काले मैंडे कपड़े, काला मैंडा वेस,
गुनहिं भरिया मैं फिरां, लोग कहन दरवेश..

फ़रीदा बे-निवाजा कुतेया,एह ना भली रीत
कभी चल ना आया, पंजे वक़्त मसीत,,,

फ़रीदा बुरे दा भला कर,गुस्सा मन ना हंडा,
देहि रोग न लगदी, पल्ले सभ कुश पाए...

फ़रीदा मैं जनेया दुःख मुझ को,दुःख सबाया जग,
उचे चढ़ के देख्या, तां घर-घर एहा अग्ग,,,,

कागा करुँग दंधोलेया, सगला खाया मास,
एह दो नैना मत छोहो,पिर देखन की आस,,,,
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VOL - VII/ ISSUE-VIII
(फरवरी- 2012
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


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