कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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कृत्या पत्रिका को चलते हुए सात साल पूरे हुए और हाल में ही सातवां कृत्या कवितोत्सव तिरुवनन्तपुरम , केरल में सम्पन्न हुआ। कृत्या का यह सफर केरल से आरम्भ हुआ था और जम्मू, चण्डीगढ़, मैसूर , नागपुर आदि का सफर करते हुए पुनः तिरुवनन्तपुरम में आ पहुँचा। अपने आधार स्थान में काम करने से कुछ सुविधा तो होती ही है। सबसे पहली तो यही कि हमें किसी का मुँह नहीं देखना पड़ता और हर कार्य को अपने तरीके से किया जा सकता है। यह निश्चिन्तता कृत्या के आयोजन के लिए बेहद लाभप्रद रही।
कृत्या के इस साँतवे उत्सव में सबसे महत्वपूर्ण बात थी, अन्तर्राष्ट्रीय कवियों का उच्च स्तर। मेरी पिछली मैडिलिन यात्रा ने मदद की , जिससे हम संसार के चुने हुए श्रेष्ठ कवियों को आमन्त्रित कर पाए।भाषा की विविधता पर हमने आरम्भ से ध्यान दिया। और सबसे ज्यादा महत्व दिया स्थानीय भाषा में अनुवाद को। केरल साहित्य अकादमी ने हमसे पुस्तक छापने का जो वायदा किया, वह हमारे अनुवादकों के लिए भी प्रेरणादायक था ।
इस वर्ष कृत्या की टीम में भी इजाफा हुआ, इटली की जिंगोनिया जिंगोने और वेनिस की अन्ना लोम्बार्डौ ने तकनीकि क्षेत्र संभाला और स्थानीय एन एस एस कालेज की छात्राओं ने अनुवाद पाठन का जिम्मा लिया। केरल साहित्य अकादमी, कूटियाट्टम केन्द्र और केरल सरकार का भी पूरा सहयोग मिला, जिससे हमारी यात्रा कुछ सहज हुई ।

कार्यक्रम का स्थान वैल्लोपिल्ली सांस्कृतिक भवन रखा गया, जो शहर के बीचोबीच होते हुए भी शान्त प्राकृतिक स्थान है, जिसे केरल के पारम्परिक मन्दिर कला भवनों की वास्तु के आधार पर निर्मित किया गया है। प्राचीन काल में केरल के मन्दिरों से जुड़े कलाभवन हुआ करते थे, जिनमें कला को अर्चना सा सम्मान दिया जाता था, वैल्लीप्पिल्ली भवन उसी आधार पर रचा गया है। लकड़ी के ढाँचे पर खड़ा यह भवन बिना एयर कण्डीशन के भी सदैव शीतल रहता है।

सोलह जनवरी को हमने अपनी योजना के अनुरूप कवितोत्सव को भीड़भाड़ से चकाचौंध से दूर रखते हुए ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त केरलीय कवि ओ. एन वी कुरुप के कवितापाठ से उत्सव का श्रीगणेश किया। इसके उपरान्त श्री रबीन्द्रनाथ टैगोर पर बने, के जयकुमार की चित्र प्रदर्शनी और ओदवे क्लीवे के चित्रकविताओं का अनौपचारिक उद्घाटन कोरिया में प्रार्थना के साथ किया गया। इसके बाद बड़े ही शान्त वातावरण में कविता पाठ आरम्भ हुआ। कवि ही मंच सभाल रहे थे, कवि ही तकनीकि सहायता संभाल रहे थे। हर कवि अपनी मातृ भाषा में कविता का पाठन करते, तत्काल उनकी कविता का अंग्रेजी रूपान्तर परदे पर आ जाता और हर कविता के उपरान्त युवा कवि मलयालम में अनुवाद पढ़ते। मंच पर एक के बाद एक, जापानी, तुर्की , हिब्रू आदि भाषाओं के साथ तेलुगु, तमिल उर्दू आदि में कविता पाठ हो रहा था।

करीब छह बजे हमारे चार सत्र पूरे हो चुके थे, और संध्या का वक्त था कविता फिल्मों का. जिन्हे ओदवे क्लीवे अपने साथ नोर्वे से लाईं थीं। साथ ही में भारतीय फिल्मकार गीतांजली राव के लघु फिल्में भी थीं, जिन्हे केंसास पुरस्कार तक मिल चुका है। रेनबो नामक फिल्म देख कर सबकी आँखें भीग गई, जिसमें एक एकाकी वृद्धा की कल्पना की उड़ान को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया था।

दूसरे दिन का आरम्भ पुनः कविता पाठ हुआ, पुनः वहीं कविता का मंजर और भाषाओं का सम्मेलन। दो मिलेजुले सत्रों के उपरान्त दुपहर के भोजन के बाद मलयालम भाषा का सत्र आरम्भ हुआ। हालाँकि अभी तक सभी कवियों का अनुवादकों के माध्यम से मलयालम भाषा से अच्छा खासा परिचय हो गया था, लेकिन मलयालम कवियों के मुँह से कविता सुनना एक अलग आनन्द था। सबसे बड़ी उपलब्धि थी कवयित्री सुगत कुमारी जी के मुँह से कविता सुनने की। जैसे ही उनकि कविता समाप्त हुई, कई देशों के कवियों ने उन्हें मंच पर ही घेर लिया, वे कुर्सी पर बैठी थी और उन्हे घेर कर सब जमीन पर बैठे थे, उनसे उनके जीवन की कविता सीख रहे थे। सुगत कुमारी कर्म से भी कवि हैं, आप ने पर्यावरण के लिए संघर्ष किया है, लेकिन आज वे जो सबसे महत्वपूर्ण काम कर रही हैं, वह यह है कि महानगरों की सड़कों पर भिखमंगी और वैश्यावृत्ति के लिए छोड़ी हुई लड़कियों, मानसिक रोगियों, कुष्ठ रोगियों को सहारा देकर अपने आश्रम में लाती हैं, और उन्हे शिक्षा देकर समाज में रहने योग्य बनाती हैं। किसी ने उनसे सवाल किया कि क्या उनकी आश्रमवासी लड़कियाँ कविता रचती हैं, तो उनका जवाब था कि .. नहीं, मैं उन्हें कराटे सिखाती हूँ, उन लड़कियों को अपने अस्तित्व के लिए जिन्दगी भर संघर्ष करना पड़ता हैं , अतः उनके लिए अपनी रक्षा के लिए कराटे सीखना जरूरी है।

इस रोमंचक सत्र के उपरान्त पुनः कविता फिल्मों का प्रदर्शन था, जिसमें प्रमुख रूप ओ एन वी कुरुप की कविता पर रची फिल्म दर्शाई गई।

तीसरे दिन 18 जनवरी को सत्र का आरम्भ रवीन्द्रनाथ टैगोर के गीतों के पाठ के साथ बी डी दत्तन द्वारा मंच पर ही चित्र रचना की गई, देखते ही देखते 20 मिनट में जिस तरह से चित्र रचा गया, वह बेहद सुन्दर अहसास था।

फिर पुनः कविता सत्र आरम्भ हुए जिनका समापन काव्य प्रस्तुति एवं ओपन माइक से हुआ़

साँझ को केरल के सांस्कृतिक मंत्री ने सब कवियों का स्वागत किया। सबसे लुभावना कार्यक्रम था कूट्टियाट्टम की प्रस्तुति जिसमें बालिवध दर्शाया गया था। कुट्टियाट्टम देश सबसे प्राचीन जीवित शास्त्रीय नाट्य कला है जिसे यूनेस्को ने भी प्राचीन वैभव के रूप में अंगीकृत किया है।

रात को सांस्कृतिक मंत्री की तरफ से रात्री भोज की व्यवस्था थी।

19 जनवरी को कृत्या के कवियों को कवि कुमाराशान के जन्म स्थली ले गए, जहाँ कवियों का हजारों स्कूली बच्चों के साथ संवाद हुआ। सरकारी स्कूल के बच्चे, जिन्हें मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा को सुनने का अवसर तक नहीं मिला था, हिब्रू, तुर्की, कोरियन , जापानी आदि अनेक भाषाएं सुनकर बेहद प्रसन्न हुए, यहाँ भी उनकी सुविधा के लिए मलयालम अनुवाद पढ़ा गया। पूरा दिन कविगण बच्चों के चहलपहल के बीच चहकते रहे। ना जाने कितने बच्चों ने कविताएँ समझी, ना जाने कितनों ने कवि को जाना, लेकिन इतना अवश्य हुआ कि उन्होंने अनेक भाषा के संगीत को सुना और अनजाने में अपने हृदय में कविता के बीज को रोपा।

अब हमारी यात्रा का अन्तिम चरण था। हम सब आदि गुरु, कवि शंकराचार्य की जन्मभूमि कालडि के लिए रवाना हुए, जहाँ पर समीक्षा आश्रम में वास किया। पूर्ण नदी के तट पर बैठ कर हमने भारतीय और वैश्विक दर्शन के परिपेक्ष्य में संवाद किया। फिर देसी नौका पर सवारी कर पूर्णा नदी पर विहार किया। रात को सब लोग स्थानीय कैथोलिक चर्च की शोभा यात्रा देखने गए और दूसरे दिन सुबह सवेरे शंकराचार्य की जन्म स्थलि और उनकी माँ के आराध्य कृष्ण मन्दिर के दर्शन को गए। अन्तर्राष्ट्रीय कवियों के लिए समाज को नजदीक से देखने का मौका था, वे भारतीय कविता की पैठ को जीवन में देख रहे थे। संवाद के लिए हमें किसी स्थान की आवश्यकता नहीं थी, हम लोग चलते चलते या मन्दिर के द्वार पर बैठे बैठे संवाद कर रहे थे। बहुत सी बाते निकल कर आई कि किस तरह से नोर्वे में बाइबिल का हर चालिस वर्ष के बाद नए सिरे से अनुवाद होता है और किस तरह से हर संस्कृति का सिरा कहीं ना कहीं किसी अन्य संस्कृति से जुड़ा होता है।

रात्री को फ्रांसिका राय और रकेल मेरे घर ही रुक गई क्यों कि उनकी रात को ही वापसी की उड़ान थी , कुछ कवि इधर उधर ब्रमण के लिए चल दिए.....

कृत्या का यह सत्र यही पर समाप्त हुआ, लेकिन इस सत्र ने जिस तरह से हमे कविता को समझने का मौका दिया वह अद्भुत था....

रति सक्सेना

     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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