छायावाद की प्रासंगिकता
 

रमेश चन्द्र शाह


प्रत्येक कवि में विशिष्टता का तत्व पहले अनगढ़ होता है | धीरे -धीरे ही उसमे पकाओ -मंझाओ आता है | पहले व्यक्तिगत प्रतिभा अपना अलग वैशिष्ट स्थापित करती है | धीरे -धीरे वह उस चीज को जज्ब करती है जिसे हम '' जातीय प्रतिभा '' कह सकते हैं | यह कविता की, कवि-कर्म की अनिवार्य दिशा है | यह प्रक्रिया कवि के अनजाने चलती रहती है| व्यक्तिगत विशिष्टता का और संवेदना का महत्व कभी घटता नहीं, वह तो उलटे बढ़ता ही जाता है | उसमे उत्तरोत्तर तीखापन आता है| पर अब उसमे ज्यादा - से - ज्यादा भाषा का इतिहास बोलने लगता है | बकौल एलियट, कवि के पुरखे भी बोलने लगते है और कवि का समूचा युग - परिवेश भी उस संवेदना की नोक में अधिकाधिक एकाग्र होकर बिंध जाता है | प्रसाद और निराला के कृतित्व में यह प्रक्रिया ज्यादा गहरे स्तरों पर अनुभव की जा सकती है | पन्त में अपेक्षाकृत कम और महादेवी में सबसे कम | पन्त की काव्य संवेदना का विस्फोटक नयापन जरा जल्दी चुक जाता है और संघर्षशील व्यक्तित्व तथा इतिहास-- बोध के अभाव में वह असमय ही मद्धिम चिन्तनशीलता की लय में ढलने लगता है | जबकि प्रसाद और निराला का उत्कृष्ट काव्य हमेशा विशिष्ट आवेग की जीवित क्रियाशीलता में घटित होते महसूस किया जा सकता है| महादेवी के कृतित्व को उनकी कविता से ज्यादा उनके में गद्य निकास मिला है और उनके चिंतन को भी उनकी कविता के बजाय कविता की भूमिकाओं में | सम्वेदना ,चिन्तना और कवि - कर्म की स्थितियां महादेवी के यहाँ अलग- थलग है | कवि के आत्मिक उलझाव से स्वतंत्र भाव और अभिव्यक्ति की तराश वाला यह शिल्प - कर्म भी कविता के कारखाने की एक अतिरिक्त उपज है जो नितांत अनुपयोगी नहीं कहा जा सकता | यह एक प्रकार का प्रत्यावर्तन है रीतिकाल में ,---जिसके रोचक नमूने कई कविता में भी -सिर्फ गिरिजा कुमार माथुर या प्रभाकर माचवे के यहाँ ही नहीं , अपेक्षाकृत बेहतर कवियों की भी अनेक कविताओं में ढूंढे जा सकते हैं | इसे आप हासौन्मुख प्रवित्ति कहकर नही टाल सकते | हिंदी साहित्य के विशेष परिदृश्य में इस कोटि की कविता का भी अपना महत्व है | क्यूंकि वह एक अधिक ' साहित्यिक ' युग में सचेत ढंग से प्रवेश कर जाने की सूचना है |
हम ने जातीय प्रतिभा की बात यूँ ही नहीं उठाई है | क्या हम ऐसा महसूस नही करते कि जिस सहज आत्मविश्वास के साथ छायावादी कवि जातीय स्मृति के साथ अपना रचनात्मक सम्बन्ध जोड़ सकते थे , वह आज दुर्लभ होता जा रहा है ? यूनानी कवि जोर्ज सेफरिस कि तरह आज का हिंदी कवि अपनी आत्म स्थिति के बारे में सोचे तो अपने को अपनी जातीय - स्मृति से कुछ कम कटा हुआ नहीं पायेगा | न सही सामान्य भारतीय प्रजा, मगर भारतीय लेखक कहीं न कहीं जरूर यह आत्म निर्वासन अपने लेखन में महसूस करता है | निस्संदेह यह भीतरी और बाहरी परिस्थितियों के एक ऐसे दबाव का प्रतिफल है जो इस मानी में अभूतपूर्व हो सकता है कि उसकी प्रतिछाया आज के कवि को आसानी में अपनी काव्य परम्परा में कहीं नही मिलती और वह नहीं जानता कि उसके विशिष्ट मानसिक संघर्ष का प्रतिरूप उसकी अपनी जातीय स्मृति में कहां है | परन्तु अगर वह है भी तो उसके लिए जिस प्रकार के आत्म - सजग अध्यवसाय कि - अज्ञेय के शब्दों में ' पूरी संस्कृति के आत्म दर्शन ' की  जरूरत होती है , वह हमारे यहाँ ज्यादातर निष्क्रिय ही रहा है | बाल्मीकि,व्यास और कालिदास अदि ने जो केन्द्रीय हैसियत कविता को और कवि को दिलाई भी अपनी सभ्यता और संस्कृति के इतिहास में, उसे ,ऐसा प्रतीत होता है कि बाद के कवि निभा नही पाये | परिवर्ती युगों की कविता उस दायित्व से स्थलित हो गई | उसकी वह महिमा नही ऱ्ही | भक्ति काल मी उसका दुष्चक्र भंग हुआ तो सही, पर स्वतन्त्र चेष्टा के अभाव मी वह फिर हावी हो गया |
उन्नीसवी सदि के पुनर्जागरण का इतना महत्व तो स्वीकारना ही होगा कि हमारी सदियो से अवरुद्ध आत्मालोचना का विष्फोट संभव बनाया | जातीय स्मृति के प्रति हमारी उस अनेकविध , अंतर्विरोध सम्पन मानसिक विरासत के प्रति उस वक़्त की दृष्टिकोण सामने आये जो मात्र पुनारूत्थानवादी न होकर अलोचानात्मक ,संशोधन वादी ओर परिष्कार परक थे | उनमे सबसे कम साम्यवादी ,सबसे अधिक आलोचना प्रखर दृष्टि स्वामी दयानंद की थी जो जातीय स्मृति को उसके मूल स्त्रोत पर ही पकडना चाहती थी |
किंत्तु शायद अत्यधिक शुद्धि‍ परक ओर प्रतिक्रियात्मक होणे के कारण ही आर्य समाज हमारी तत्कालीन चेतना और उसके सबसे सचेत बिन्दु अर्थात कविता मी गहरे नही भेद सका | उसकी काव्य-संभवता इसलिये भी शायद बहुत कम थी कि वह हमारी जातीय स्मृति के एक बहुत बडे अंश का बलिदान कर देती थी |
शायद इसलिए वह हमारे कवियों को प्रभावित नही कर सका | निराला ने तारीफ दयानंद की भी की है पर कवि के रूप में उनके असली प्रेरणा स्रोत रामकृष्ण और विवेकानंद ही है | प्रासाद की प्रतिभा श्री अरविंद की समग्रता के अधिक समीप है, हालाँकि प्रसाद जी के श्री अरविंद से उस तरह प्रभावित होने का शायद प्रश्न ही नहीं उठता | यह इस पुनर्जागरण की ही महिमा है जिसने श्री अरविन्द को पहले वेदों के और फिर उसी अनिवार्य तर्क से उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत ,वैष्णव और शासन परम्पराओं के नवीन अध्ययन की ,और आलोचनात्मक पुनः परीक्षा की, पुनर्वाख्या की गंभीर प्रेरणा दी | स्वामी दयानंद और विवेकानंद के बाद श्री अरविन्द का यह कार्य भारतीय भाव बोध के इतिहास में दूसरी बड़ी घटना थी , जिसका कोई खास असर हिंदी कविता पर पड़ा नहीं दीखता | पन्त जी जरूर उस तरफ आकर्षित हुए पर इस आकर्षण के उनकी कविता के लिए कोई खास नतीजे नही निकल पाए | उन्हें वहां सिर्फ एक' ' यूटोपिया ' ' मिला जिसने उनकी असाध्य स्वप्नशीलता को एक टेक और दे दी | मगर उस प्रेरणा देने वाले यूटोपिया के पीछे जो दिमाग कम कर रहा था‍, समूची परंपरा के पुनः परीक्चा और साक्षात्कार का जो गंभीर प्रयत्न उसमे सक्रिय था, उससे टकराने का धीरज और उत्साह उसमे नही दिखा | कैसे दिखता ? पन्त जी प्रसाद नहीं थे |इसी तरह इस युग में भारतीय भाव बोध के इतिहास की जो बड़ी घटना है -गाँधी जी ,उससे भी हमारे कवियों के वेदना तंत्र में कोई खास हलचल हुई नहीं दिखती | गद्य के लिए जरूर उसके कुछ अछे नतीजे निकले पर कविता में गाँधी जी सिर्फ '' निर्वार्णोन्मुखी आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय '' ही बनकर रह गए | इससे तो '' तुम बापू मुर्गी खाते यदि '' ही ज्यादा दिलचस्प है | यहाँ कम से कम गाँधी जी के साथ कवि का रिश्ता सीधे सीधे कविता का रिश्ता तो है -तीखी संवेदनात्मक प्रतिक्रिया का रिश्ता तो है | जबकि पन्त जी की कविता का रिश्ता गाँधी के साथ '' चिंताशीलता'' का रिश्ता है | इसलिए अपेक्षाकृत ठंडा रिश्ता है | कविता का रिश्ता नहीं है |
सोचना पड़ेगा की यूनानी कवि कवाफी के कदोकामत का एक भी कवि हमारे बीच जिसके बारे में हम यह दावा कर सके की इस आदमी ने नितांत आधुनिक और जटिल संवेदना के भीतर से जातीय स्मृति के जीवंत बिंबों - प्रतीकों द्वारा अपनी आत्मस्थितियों को और उनके माध्यम से अपने समय की उलझी हुई सचाइयों को कविता में सामने लाया है ? अपनी तमाम सीमाओं और आत्मातुष्टियों के बावजूद तथाकथित छायावादी युग का कुछ काव्य इस समस्या से जूझने का , इस सार्थक संघर्ष का कुछ अंत तह प्रमाण सुलभ कराता है | वह क्या हमारे लिए प्रासंगिक नहीं हो सकता ? वह आवश्यक संघर्ष आगे बढ़ा है या वहीँ का वहीँ ठप्प है , इस पर विचार करना जरूरी है | हमारे अन्दर आज भी अपने जातीय स्वभाव की सारी व्याधियां - से अनुपातहीनता , गड्ड-मड्डपन ,अनेकता और अतिश्योक्ति आज भी उतनी ही - सक्रिय हैं | अगर कुछ सक्रिय नहीं है तो केवल यह सर्जनात्मक उत्साह , वह भारतीय रचना - दृष्टि ,जो इन अवगुणों को भी गुण में बादल देती है |
उस तथाकथित पुनर्जागरण युग में चिंतन और विद्वता के स्तर पर जो कुछ ठोस कम हुआ था - वैचारिक और कल्पनात्मक उद्यम द्वारा उस जातीय स्मृति से जुड़ने की दिशा में -समसामयिक जीवन प्रवाह को उस खोज से जोड़ने का जो संघर्ष उस वक़्त किया गया था , उसके हमारे साहित्य के लिए ,हमारी कविता के लिए कुछ नतीजे निकले थे और बाद में भी निकलने चाहिए थे | क्यूँ नहीं निकले ? क्या हमने तब अपनी काव्य परंपरा के प्रति यथोचित दृष्टि अर्जित कर ली थी आगे के कवियों के भी कम की होती ? क्या वह दृष्टि अर्जित करने का संघर्ष उसी पुनरुत्थान युग के साथ समाप्त हो गया ? ठीक उसी तरह जिस तरह की उस समय का कुछ ठोस सामाजिक - आर्थिक चिंतन स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही बिला गया ? आज जातीय स्मृति की बात उठाते हुए हम इतने असहज और संकुचित क्यूँ अनुभव करते हैं ?
या फिर क्या वास्तविकता यह है की उस युग में वास्तविक मौलिक दूरगामी चिंतन हुआ ही नहीं , केवल सुधारवादी आंदोलनों की बाढ़ रही ,जिसमे की एक ओर हमारी प्रजा की प्राण शक्ति को और दूसरी ओर हमारे लेखकों - बुद्धजीवियों को बहुत भीतर तक उद्वेलित और प्रभावित करने की शक्ति नहीं थी |


साभार -विकल्प [बीकानेर]

प्रस्तुति मीता दास


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