जीवनानंद दास

पथ भ्रमण


ना मालूम क्या सोच कर एकाकी मै , शहर के इस पथ से उस पथ पर
खूब चला हूँ ; अनेक बार देखा है मैंने
बस --ट्राम सब कुछ नियमित चलते रहते हैं ;
फिर पथ से हट कर चले जाते हैं
अपनी अपनी निद्रा के जगत में :

सारी रात गैस लाइट अपनी जिम्मेदारी भली भांति समझ कर
अच्छी तरह से रौशन होते है
कोई भूल नहीं करता ,  ईंट के घर ,साइनबोर्ड , खिडकियों के कपाट ,छत सभी
नींद की खुमारी में वे सब प्रयोजन बोध करते हैं
चुपचाप शांत हो आराम करने को आकाश का तल |

एकाकी पथ भ्रमण कर , उन सब की शांति की गहनता को करीब से अनुभव किया है ;
उस वक़्त --- रात -- गहरी तब अनेक तारों के समूह मोनुमेंट के माथे पर
निर्जनता में घेरा सा डाल देते hain
लगता है जैसे कोई भी दिन इस से सहज संभव है क्या ?

और कुछ देखा है क्या : ढेर सारे तारे और मोनुमेंट से भरा हुआ कलकत्ता ?
आँखों में उतर आती है, वह चुरूट जो नीरवता में जलती है
हवा में भरा ढेरों धुल धक्कड़ ;
आँखे बंद कर एक तरफ हट जाता हूँ
पेड़ से अनेक बादामी रंग के जीर्ण पत्तों की तरह

उड़ गया , बेबीलोन से एकाकी
इसी तरह से भ्रमण किया मैंने रातभर
ना जाने क्यूँ ; आज भी मै नहीं जानता
हजार - हजार व्यस्त वर्षों के बाद भी |


अनुवाद ----- मिता दास |


भिखारी


एक पैसा मुझे मिल गया है अहिरी टोला में ,
एक पैसा मुझे मिल गया है बादुड बागान से ,
एक पैसा अगर और मिल जाये
तब मैं चल कर यहाँ से चला जाऊंगा ख़ुशी - ख़ुशी !
कह कर उसने बढ़ा दिया हाथ अन्धकार में |
सम्पूर्ण शरीर को वह एक बहरे की तरह बुन रहा था जैसे ताँत ;
फिर भी शाखा [बंगालियों का सुहाग चिन्ह ] बनाने वाले के हाथ का बन गया वह आरी |

एक पैसा मुझे मिल गया है मैदान का पूरा चक्कर लगा कर
एक पैसा मुझे मिल गया है पथुरिया घाटा से ,
तब ढेंकी के चांवल कल छाटूंगा |
-कह कर उसने बढ़ा दिया गैस लाइट की तरफ अपना चेहरा |
भीड़ के भीतर फिर भी -हेरिसन रोड -और भी गहरी बीमारी ;
एक पृथ्वी की भूल से ,भिखारी की भूल से ;
एक पृथ्वी की भूल - चूक |


अनुबाद ---- मिता दास |



खेतों की कहानी [ खेतों का चाँद ]



खेतों का चाँद देख रहा है
मेरे मुख की तरफ, दाहिने और बाएं
जली हुई जमीन, भूसा ,फसल के कट जाने पर बचा हुआ ठूंट , फटी- पड़ी खेत
शिशिर का जल |

खेतों का चाँद, हंसिये की तरह टेढ़ा ,धारदार, ताक रहा ; कितनी ही रात काटी
हिसाब नहीं
खेतों का चाँद कहता है,
आकाश के तले
खेतों में हल की धार
भोंथरी हो गई है,फसल काटने के बाद
समय आ गया है , फसल पक चुके हैं
तब तुम क्यूँ रुके हुए हो
अकेले -अकेले ! दायें और बाएं
भूसा  फसल कटने के बाद बचे ठूंट,जली जमीन
-धंसी , फटी पड़ी खेत ,
शिशिर का जल !
मै उससे कहता हूँ :
'' फसल कितने पक गए हैं '' और बीज झरे है कितने
बूढ़े हो गए हो तुम इस बूढी पृथ्वी की तरह !
खेत-खलियानों में हल की धार
भोथरी हो गई है कितनी बार -कितनी बार
फसल के कट जाने के बाद
समय आ गया है, चला भी गया कब का !
बीज फल गए हैं  फिर तुम क्यूँ
रह गए खड़े
अकेले - अकेले ! दायें और बाएं
जली जमीन -भूसा -फसल कट के बाद बचा ठूंट --
खेतों की फटन ,--
शिशिर का जल !"

अनुवाद ------ मिता दास |

 


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