बशीर अतहर की कविता

बांटता जा



बांट दिया तू ने नभ को
इस बियाबान को भी बांट दिया,
बांट दिया खु़दा को
इन मुल्कों को भी बांट दिया।
बांट दी तुम ने मेरी हरीतिमा,
छायादार पेड़ों को भी बांट दिया,
बांट दी हमारी बहुमूल्य रिवायतें
हमारे मूल्यवान बंधनों को भी बांट दिया।
बांट दिया तुम ने पानी को
हवा को भी बांट दिया,
बांट दिया सुनहरे अतीत को
हमारे वर्तमान को भी बांट दिया।
बांट दिया इंसान को
उसकी इंसानियत को भी बांट दिया,
बांट दिया आत्मा को
हमारे आत्म-दर्शन को भी बांट दिया।
बांट दिया तुम ने प्यार अनमोल
हमारी माताओं का,
बांट दिया प्यार बहनों का
भैया-राजाओं का भी प्यार बांट दिया।
बांटता जा-
जब इस सब से थक जाए
तब बांट के दिखाना
मेरी धरती मां को,मेरी धरती मां को!


मूल कश्मीरी से अनुवाद-

डा0 शिबन कृष्ण रैणा


(बशीर अतहर की अन्य कविताएँ)
 


अग्निशेखर

श्वेतवराह -१


उफनते समुद्र मे तुम
छिपने को आतुर स्वयं में
कभी हिचकोले
कभी लहर सी लौट आती वापस

क्षुब्द इतनी तुम
समय से
दिक् से अपने या कि युगों से..
मै ले आया तुम्हे तुम्हारे मायामय अतल से बाहर
अज्ञात विस्मय के इस पहर में
ओ पृथ्वी मेरी
बरसों से बंद देवालय की
सीढ़ियों पर
कि खुल गए कपाट गर्भ -गृह के
गूढ़ से गूढ़तर पहेली जैसे

फिर भी अनमनी तुम
विश्वास और संशय के बीच
खड़ी अकेली ..
वहां दिखी सीढ़ियों पर
बैठी एक बूढी स्त्री
तुम्हे दिए उसने
पूजा के फूल
मुझे पोपली वत्सल मुस्कान

मैने तुम्हारे अभिभूत नेत्रों से देखा खुद को
अपने श्वेतवराह मन को
फिर तुम को ...

(अग्निशेखर की अन्य कविताएँ)
 


सौमित्र की कविता


बेला


दूसरी सुहागिनों के साथ
घर की वृद्धायें भी
पूजने चली गयीं हैं पेड़ .
लौटने पर
वो ले लेंगी
दूध की थैली
इन्गूर की नयी डिबिया
और कफ़ सिरप भी
घर आ के
कुछ फुलोरियां तलके
वो भी
आँगन में दे आयेगीं अर्ध्य .
आज उनके आदमी भी
नहा-धोके बैठे हैं
वो भी सूख गए थे
उनकी अनुपस्थिति में
अब फिर बोलने लगे हैं .
उन्हें जब अपनी पत्नियों की आवाज आती है तो वो
तसल्ली से खांसने लगते हैं
उनकी खांसी सुनकर
वृद्धायें
बहुत तेजी से
हड़बड़ी में व्रत-कथाएँ बोल जाती हैं .


(सौमित्र की अन्य कविताएँ)


किरण सिक्का की कविता

वसंत

पतझर में भी वसंत ना जाने कैसे आ जाता है ?
कभी कविता बन कर काग़ज पर उतर आता है,
कभीआ जाता है
आखों की कोर पर आंसू बनकरI
कभी घर की चारदीवारी में असीम शांति बनकरI
पता नहीं
वसंत कैसे उतर आता है
मन के आँगन में?
तभी दिल की चिड़िया चहचहानेलगतीहै
और मेरी उम्र
हरबार
एक बरस और छोटी हो जाती हैI

(किरण सिक्का की अन्य कविताएँ)


बागीशा सिंहा की कविता

मेरे एहसास में काश तेरी वो अदा मांग ली होती
तेरी सादगी की छाव में पनाह मांग ली होती

तुम शर्माती पर इंकार न कर पाती
तुम्हारी इजाज़त इस तरह मांग ली होती

हर सवेरे मेरे कंधो पर तुम्हारा सर हो
काश मैंने ऐसे कोई दुआ मांग ली होती

मिलता हू हर रोज़ कहता कुछ भी नहीं
काश तुम हे से कुछ सलाह माग ली होती


घनश्याम त्रिपाठी की कविता

साइकिल सवार

स्त्री मुझे जीवन देती है
वह आरंभ के साथ है सड़क पर
जो गति देती है

साड़ी में लिपटी
साइकिल पर सवार
एक स्त्री
सामने आती है
और निकल जाती है

मै गाड़ी पर सवार
उससे टकराता हूँ
दूर छिटक जाता हूँ

सर पर
सीने पर
बहुत भीतर
चोट के निशान हैं
भयानक दर्द से कांपता हूँ

ऊपर पड़ी धूल को झाड़ता हुआ
उठ कर सोचता हूँ अपनी गति पर
एक साइकिल सवार स्त्री से बचकर
मै आगे नहीं निकल पाऊँगा |
 

(घनश्याम त्रिपाठी की अन्य कविताएँ)


सिद्धेश्वर सिंह

रंग

कुछ रंग हैं -
एक दूसरे से अलग
और एक दूसरे में घुलकर
घोलते जाते हुए कुछ और ही रंग
वे रुकते नहीं हैं
चलते हैं सधे पाँव
छोटे - छोटे डग भर कर
लगभग माप लेना चाहते हैं धरती का आयतन

कुछ लकीरें है -
सरल
वंकिम
अतिक्रमित
समानान्तर
और भी कई तरह की
जिनके लिए ज्यामिति सतत खोज रही है अभिधान

कुछ दृश्य हैं -
देखे
अदेखे
और कुछ -कुछ
कल्पना व यथार्थ के संधिस्थल पर समाधिस्थ

यह दुनिया है एक
इसी दुनिया के बीच विद्यमान
यहीं के स्याह - सफेद में रंग भरती
और यहीं की रंगत को विस्मयादिबोधक बनाती
बारम्बार

(सिद्धेश्वर सिंह की अन्य कविताएँ)


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