सिद्धेश्वर सिंह
 


कुछ और रंग

एक कैनवस है यह
एक चौखुटा आकार
क्षितिज की छतरी
मानो आकाश का प्रतिरूप
जिसकी सीमायें बाँधती है हमारी आँख
और मन अहसूस करना चाहता है अंत का अनंत

दिख रहा है
उड़ रहे हैं रंग
उड़ाए जा रहे हैं रंग
फिर भी
घिस रहा है इरेज़र
लकीरें अब भी हैं लकीर

यह मैं हूँ
कागज के खेत में
शब्दों की खुर्पी से निराई करता
भरसक उखाड़ता खरपतवार
और अक्सर
आईने के सामने
समय के रथ को रोकता - झींकता
अपने बालों में लगाता खिजाब
सफेद को स्याह करता बेझिझक बेलगाम

बारिश में बुद्ध

हिमशिखरों से कुछ नीचे
और उर्वर सतह से थोड़ा ऊपर
अकेले विराज रहे हैं बुद्ध।

उधर दूसरी पहाड़ी ढलान पर
दूर दिखाई दे रहा है गोंपा
किन्तु उतना दूर नहीं
कि जितनी दूर से आ रही है बारिश
अपनी पूरी आहट और आवाज के साथ।
जहाँ से
जिस लोक से आ रही है बारिश
वहाँ भी तो अक्सर आते जाते होंगे बुद्ध
परखते होंगे प्रकृति का रसायन
या मनुष्य देहों की आँच से निर्मित
इन्द्रधनुष में
खोजते होंगे अपने मन का रंग।

कमरे की खिड़की से
दिखाई दे रहे हैं आर्द्र होते बुद्ध
उनके पार्श्व से बह रही है करुणा की विरल धार।
मैं गिनता हूँ उंगलियों पर बीतते जाते दिन
आती हुई रातें
और सपना होता एक संसार।

यहाँ भी हैं वहीं बुद्ध
जिन्हें देखा था सारनाथ- काशी में
या चौखाम - तेजू - इम्फाल में।
वही बुद्ध
जिन्हें छुटपन से देखता आया हूँ
इतिहास की वजनी किताबों में
कविता में
सिनेमा के पर्दे पर
संग्रहालयों के गलियारे में
सजावटी सामान की दुकानों पर
पर उन्हें देखने से बचता रह स्वयं के भीतर
हर जगह - हर बार।

यह चन्द्रभागा है
नदी के नाम का एक होटल आरामदेह
केलंग की आबादी से तनिक विलग एक और केलंग
जैसे देह से विलग कोई दूसरी देह
काठ और कंक्रीट का एक किलानुमा निर्माण
कुछ दिन का मेरा अपना अस्थायी आवास
फिर प्रयाण
फिर प्रस्थान
फिर निष्क्रमण
जग के बारे में भी
ऐसा ही कहते पाए जाते हैं मुखर गुणीजन
और इस प्रक्रिया में बार - बार उद्धृत किए जाते हैं बुद्ध।

बुद्ध बहुत मूल्यवान हैं हमारे लिए
उनके होने से होता है सबकुछ
उनके होने से कुछ भी नहीं रह जाता है सबकुछ।
टटोलता हूँ अपना समान
काले रंग की छतरी बैग में है अब भी विद्यमान
चलूँ तान दूँ उनके शीश पर
बारिश में भीग रहे हैं बुद्ध
और उनके पार्श्व से बह रही है करुणा की विरल धार
मैं इसी संसार में हूँ
और सपना होता जा रहा है संसार।
'ढाई आखर' के लिए चार अक्षर

*
 
निरर्थक हो गई है
उनकी उपस्थिति
कोई मतलब नहीं रह गया है
उनके होने का
नहीं रह गया है कोई उनके संग साथ।
आईने उदास हैं
जबसे उसके हाथ में है मेरा हाथ।

**

जितनी बार देखता हूँ उसे
उतनी बार
दीखता है अपना ही अक्स।
नई परिभाषायें गढ़ता है दिक्काल
पृथ्वी की गति को
अभिनव परिपथ
दिए जाता है कोई शख्स।

***

बदल रहा है मौसम
अपनत्व की ऊष्मा से
बदल रहा है संसार
दबे पाँव चलकर आ रहा है वसंत।
कितनी छोटी हो गई है दुनिया
सबकुछ अपना
अपना जैसे सब
जैसे तुम्हारी हथेलियों में
समा गये हैं दिगंत।

****

शब्द जादू हैं
या कि अर्थों में छिपा है कोई रहस्य
भाषा की अवशता में
जारी है सहज संवाद।
मैं तुममें खोजूँ खुशियाँ
तुम मुझमें
जज्ब कर दो सब विषाद।
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संपर्क :

- सिद्धेश्वर सिंह
ए-०३, ऑफिसर्स कालोनी,टनकपुर रोड, अमाऊँ
पो- खटीमा (जिला -ऊधमसिंह नगर) उत्तराखंड
पिन- २६२३०८ मोबाइल -०९४१२९०५६३२
ईमेल- sidhshail@gmai.com

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