मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

तकनीक सदैव नवीनता की ओर अग्रसर होती  है. कला में नवीनता ‌और पुरातन का महत्व नहीं होता, किन्तु संस्कृति दोनो के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश करती है। कला सत्य नहीं है, किन्तु असत्य भी नहीं, दरअसल यह सत्य का अनुकरण है। यहीं कारण कला मानव को मानव होना सिखलाती है, पतन से बचाती है। तकनीक का प्रयोग मानव जीवन को सरलतम बनाने के हेतु किया जाता है, अतः इसे विज्ञान का एक अंग माना जाता है किन्तु तकनीक को यदि कला के संवर्धन में प्रयुक्त किया जाए तो संस्कृति के प्रति उपकार का हेतु बन सकती है। साहित्य कला का उपांग है, अतः निरन्तर विकास के लिए आवश्यक है कि साहित्यिक समाज तकनीक को खुले दिल से अपनाएँ ।
रति सक्सेना
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मैं मुस्कुरा दिया
और अचानक,
ज़िन्दगी के
सभी कठिन सवाल
बड़े आसान
से लगनें लगे ।

अनूप
अनूप भार्गव

और ऐसा करके वह इतना खुश थी कि बार बार
मुझे बता रही थी कि इस वक्त वह जमीन पर
बिना एड़ीवाली चप्पल के चल नहीं रही बल्कि फिसल रही है.

 पवन करण

औरतें उसके तने में
जैसे ही लपेटती हैं जनेऊ
श्रीचक्र से उतरकर अदृश्य
पार्वती सिल्ली से धसती हैं योनि
हवा वारों तरफ से चिल्लाती है


वासुदेव वासुदेव!!

श्रीप्रकाश मिश्र

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 हिन्दी में कोई युवा लेखन नहीं है। आज का युवा लेखन में ऐसे प्रवेश करता है, मानो कोई नौकरीकरने आया हो। युवा का मतलब है जो प्रश्न उठाए और आगे आकर बोले। कम से कम हिन्दी साहित्य में तो ऐसा कुछ भी नहीं है। युवा लेखन के नाम पर बने बनाए फ्रेमों में रचना की जा रही है। युवाओं का विद्रोही, रेडिकल, नई संभावनाओं से भरा लेखन नहीं हो पा रहा है। जो युवा लेखन आज हमारे सामने है, वह संगठनों द्वारा नपु्सक बनाए, नाथे गए युवाओं का लेखन है। आज के युवा के पास अपनी आँख नहीं है। वह फ्रेम्ड विचारों का लेखन है, इसके पाठक भी संगठनों द्वारा प्रयोजित पाठक हैं।

 उदयन वाजपेयी  ....और »  

 

मुहब्बत अमरता है, रहेगी अमरत्व तक
प्रेमी छूट जाता है जिन्दगी और मुहब्बत के बन्धन से
कल जब कयामत आएगी
हर दिल जो प्रेम डूबा नहीं, छूट जाएगा

*

वह खूबसूरत फुसफुसाई मन्दिम आवाज में
और तुम हो गए पागल, बिना किसी कारण
ओ खुदा! यह कौन सा मंन्त्र, कौन सा जादू
जो पत्थर दिल पर भी चल जाता है ?
 

मौलाना जलालुद्दिन रूमी
 

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***

सत गुरू ने पूर्ण कृपा कर।
मुझे दी दृष्टि समझने को निज वस्तु ।।१।।
मेरी आँखों ने देखा निज सुख।
दी दान प्रेमकला ज्ञान मुद्रा की।।२।।
किन गुणों से मैं हूँ, उनरिन।
न होवे पुनर्जन्म, कुछ ऐसा किया।।३।।
नामदेव कहे , भला साधन देखा।
न भूल पावूँ निकटता विठोवा की।।

***

फुस कूटे न निकले चावल।
भूहर के फल क्या होवें अमृत।।१।।
कनेर की मूल में न होवे गंध।
गाय बचे कैसे कहाई के संग।।२।।

नामदेव

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VOL - 1 / PART -8
(जनवरी-2006 )

संपादक :  रति सक्सेना


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