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मेरी
बात
नए साल के साथ कृत्या का पता भी बदल रहा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे
कि किराये के घर से अपने घर में आने पर गली नम्बर बदल जाता है। अब
www.kritya.org की जगह www.kritya.in पर पत्रिका उपलब्ध है। जिस
तरह से पता घर में रहने वालों की पहचान नहीं बदलता उसी तरफ कृत्या
के नए पते में भी उसका अपना वही पुराना वजूद बना रहेगा, इसी आशा
और विश्वास के साथ नये साल का नया अंक आपके सामने प्रस्तुत है।
पिछले दिनों कृत्या की सहयोगिनी पत्रिका म्यूज इण्डिया ने हैदराबाद
में अपना पहला साल पूरा किया। यह एक उदाहरण है कि भारत में किस तरह
से जाल पत्रिकाएँ अपना स्थान बना रहीं हैं। इस अवसर पर एक संगोष्ठी
का आयोजन हुआ जिसका विषय था -"संस्कृति,
तकनीक और कला"। कृत्या ने भी अपने अनुभव व विचार रखेः--
हालाँकि संस्कृति, कला और कला की सटीक परिभाषा संभव नहीं है
किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ये तीनों ही प्रकृति से
कृत्रिमता की ओर कुछ कदम हैं। यह अवश्य है कि इस कृत्रिमता में
प्रकृति की अनुकृति होती है और इनका उद्देश्य मानवता का
परिमार्जन होता है। किसी समाज की बाह्य उन्नति के लिए तकनीक और
आन्तरिक उन्नति के लिए कला का समृद्ध होना आवश्यक है। तकनीक सदैव
नवीनता की ओर अग्रसर होती है. कला में नवीनता और पुरातन का महत्व
नहीं होता, किन्तु संस्कृति दोनो के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश
करती है। कला सत्य नहीं है, किन्तु असत्य भी नहीं, दरअसल यह सत्य
का अनुकरण है। यहीं कारण कला मानव को मानव होना सिखलाती है, पतन से
बचाती है। तकनीक का प्रयोग मानव जीवन को सरलतम बनाने के हेतु किया
जाता है, अतः इसे विज्ञान का एक अंग माना जाता है किन्तु तकनीक को
यदि कला के संवर्धन में प्रयुक्त किया जाए तो संस्कृति के प्रति
उपकार का हेतु बन सकती है। साहित्य कला का उपांग है, अतः निरन्तर
विकास के लिए आवश्यक है कि साहित्यिक समाज तकनीक को खुले दिल से
अपनाएँ । नेट पर निकलने वाला साहित्य तकनीक के साथ स्वस्थ संबन्ध
है, अतः आवश्यकता है कि देश का साहित्य समाज इसे खुले दिल से
स्वीकारें। "
इस अंक में समकालीन कविता के खण्ड में चुनी गई कविताएँ वर्तमान
कविता के चेहरे को स्पष्ट उजागर करतीं हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं।
लीक से हट कर चुने गए विषयों को माध्यम बना कर रची गई कविताएँ हमे
बाध्य करती हैं कि हम अपने को परिवेश में समाहित करें। प्रिय कवि
के रूप में ईरान के रूमी को क्यों चुना गया है, इसका जवाब पाठक
रूमी को पढ़ने से ही पा लेंगे। हमारे अग्रज के रूप में मराठी के
महान कवि विचारक नामदेव जी के कुछ पदों को प्रस्तुत किया जा रहा
है। इस बार पहली बार कृत्या के हिन्दी विभाग में साक्षात्कार
प्रस्तुत किया जा रहा है, निसन्देह पाठकों के लिए यह एक उपलब्धि
होगी।

कृत्या के इह अंक के चित्र विख्यात चित्रकार निकोलस रौरिच की
कलाकृतियों के संक्षिप्त रूप हैं। निकौलस का प्रकृति व भारत से जो
सम्बन्ध रहा है वह हम भारतीयों को उनकी कला के प्रति और मोहित करता
है। रेखाचित्र प्रभाकर व उनके पुत्र रोशन द्वारा बनाए गए हैं।
आशा है पाठकों को यह अंक पसन्द आएगा
नव वर्ष की शत शत शुभकामनाओं सहित
रति सक्सेना
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