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उदयन वाजपेयी की रवीन्द्र स्वप्निल से
बातचीत
लेखन दो स्वतन्त्रताओं का मिलन है:-
०
आप कविताएँ कहानी फिल्म रिपोतार्ज आदि विधाओं में लिखते हैं,
सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य और साहित्यकारों पर आपकी क्या राय है?
सम्पूर्ण परिदृष्य निराशाजनक है, हमने एक भारतीय लोक की विदेशी
विचारधारा के आधार पर एक डमी बना ली इसे लेकर हमारा साहित्यिक समाज
रचना कर रहा है। यही कारण है कि हम अपने पाठकों को आकर्षित नहीं कर
पा रहे हैं। उसमे मैं ये सब कारण देखता हूँ, आप नकली चीजों के पास
जीवन्त रचना नहीं कर सकते हैं, संवाद नहीं होने के कारण आज साहित्य
एक बड़ी ऊब बन गया है।
०
आपका कहना है कि हम भारतीय संस्कृति को अपील कर पाने में असमर्थ
हैं?
हाँ हम अपने लोगों को अपील नहीं कर पा रहे हैं, हमारी कहानियाँ,
हमारी कविताएँ हमारे लोक से जुड़ी नहीं हैं। हमने वैश्विक आदमी को
लेकर स्थानीय बुन्देलखण्डी कपड़े पहने दिए हैं, यह लोक की स्थापना
नहीं है। हमने कला अकादमियाँ गठित की हैं। इन अकादमियों में लोक के
वे नृत्य कहाँ हैं, जो लोक की धरोहर हैं। जो बिना संरक्षण के अब तक
जीवित है। हमारा साहित्यकार विश्व
की बात करता है किन्तु उसे यह पता
नहीं कि हमारे यहाँ भुजरियाँ क्यों बोई जाती है। हमारे आदिवासी
गीतों का प्रतिनिधित्व हमारे साहित्य और कला अकादमियों में नहीं के
बराबर है।
०
युवा लेखन की हिन्दी में क्या स्थिति है, आज सभी पत्रिकाएँ युवा
लेखन विशेषांक निकाल रहीं हैं।
हिन्दी में कोई युवा लेखन नहीं है। आज का युवा लेखन में ऐसे प्रवेश
करता है, मानो कोई नौकरीकरने आया हो। युवा का मतलब है जो प्रश्न
उठाए और आगे आकर बोले। कम से कम हिन्दी साहित्य में तो ऐसा कुछ भी
नहीं है। युवा लेखन के नाम पर बने बनाए फ्रेमों में रचना की जा रही
है। युवाओं का विद्रोही,
रेडिकल,
नई संभावनाओं से भरा लेखन नहीं हो पा रहा है। जो युवा लेखन आज
हमारे सामने है, वह संगठनों द्वारा नपुंसक बनाए, नाथे गए युवाओं का लेखन है। आज के युवा के पास अपनी
आँख नहीं है। वह फ्रेम्ड विचारों का लेखन है, इसके पाठक भी संगठनों
द्वारा प्रयोजित पाठक हैं।
०
आपका कहना है कि संगठनों ने युवा लेखन की उर्जा को नष्ट किया है?
संगठनों ने युवा लेखन की ऊर्जा को नष्ट नहीं किया है सम्पूर्ण
साहित्य को बेकार कर दिया है। आज ऐसे हालात है जिनमें दो तरह की
असमानताएँ हमारे सामने रख दी गईं है। और उनमें से एक का चयन आपके
लिए अनिवार्य है। ये सारी चीजें साहित्य में उत्साह और ऊर्जा को
नष्ट करने का काम करी हैं। यह
ध्रुवीकरण
असामनताओं से भरा है।
०
आपके अनुसार लेखन की स्वतन्त्रता का क्या मतलब है?

लेखन कोई स्वतन्त्रता नहीं है, लेखन व्यक्ति की दो परम दिशाओं का
मिलन है। इन दो स्वतन्त्रता में एक है नितांत अकेले होने की
स्वतन्त्रता, और दूसरी सम्पूर्ण लोक से जुड़ने की आकांक्षा। लोक से
मेरा आशय केवल मनुष्य नहीं, पशु, पक्षी, पेड़ पौधे, धरती आकाश सब
कुछ समाहित है। लोक के अन्दर ये दो स्वत्नत्रता घटित होना ही
चाहिए। अगर लेखन में ये सब शामिल नहीं होते तो लेखन इकहरा हो जाता
है।
०
क्या हमारी परम्परा में इन बातों का उल्लेख है?
परम्परा में उल्लेख मिलने का सवाल नहीं, सवाल अपनी परम्परा को
जानने का है। अपनी परम्परा की जो सुगन्ध है उसे पहचानने का है। आज
हम नहीं जानते कि मारे आदिवासी मेहनत करने के बाद क्यों नाचते गाते
हैं? हम नहीं जानते कि वे प्रेम गीत क्यों गाते हैं. उस राग को
हमने नहीं जाना। मुझे आश्चर्य होता है कि साहित्यकार इसको क्लास
कहते है। वे बने बनाए विचारों के आधार पर साहित्य का सृजन कर रहे
हैं। विचारों की दम पर रचना का फ्रेम तो अच्छा बनता है पर कुछ खो
जाता है।
०
कुछ ऐसे विचार आ रहे हैं कि स्थानीयता ही वैश्वीकरण का उत्तर है।
आप इस स्थानीयता की व्याख्या कैसे करेंगे?
स्थानीयता वैश्वीकरण का उत्तर नहीं है, दोनों एक दूसरे का
प्रतिनिधित्व करते हैं। स्थानीयता वैश्वीकरण का पहला चरण है। दोनो
आपस में विरोधी नहीं हैं। हम स्थानीयता के माध्यम से वैश्वीकरण का
उत्तर दे सकते हैं।
०
हमारे साहित्य में वैश्वीकरण का कोई उदाहरण है?
हाँ है, कालीदास जब बात करते हैं तो पूरे पहाड़ों की बात करते हैं।
लेकिन जिस पहाड़ के माध्यम से उन्होने पहाड़ जाने वो विन्ध्याचल था।
उन्होंने उसका वर्णन किया है। उन्होंने शृंगार रस का पूरे काव्य
में वर्णन किया है। कालीदास विश्व कवि इसलिए हुआ कि उसने स्थानिकता
को जाना। अपनी कविता में उसका उपयोग किया। दूसरा उदाहरण गालिब का
है। उन्होंने फारसी परम्परा को अपनी स्थानीयता से जोड़ कर हमें जो
दिया वह आज भी सुगन्धित है। निराला इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। लेकिन
शृंगार की गहराई नहीं है, उनमें वह भराव नहीं आया जो कालीदास और
गालिब में था।
०
कविता का अर्थ जानने के लिए आजकल देरिदा लोर्का जैसे विद्वानों के
उद्धरण प्रचलन में हैं, क्या भारतीय विद्वान कुछ नहीं कहते?
कहते हैं, और ज्यादा अच्छा कहते हैं। काव्य को समझने के लिए
आनन्दवर्धन ने जो सिद्धान्त दिया वह बेजोड़ है। वह कहते हैं कि
शब्दों के अर्थों में काव्य नहीं होता, शब्दों की ध्वनि में, उसकी
अनुगूंज में काव्य होता है। उनका एक उदाहरण है कि लड़की उपवन में
पंडित से कह रही है कि शेर ने कुत्ते को मार दिया , अब आप आराम से
बैठ कर ध्यान कर सकते हैं। यहाँ लड़की अपने प्रेमी से मिलना चाहती
है। अब इस वाक्य से जो एक अनुगूंज है, एक के बाद एक जो वर्तुल उठता
है, वह काव्य है। लेकिन नहीं, हमने अपने लोगो को नहीं देखा, देरिदा
आदि पाश्चात्य विद्वानों का उद्धरण को लेकर कविता की आलोचना और
व्याख्या करते हैं।
०
आप किसी संगठन में नहीं हैं इससे आप एक तरह की स्वतन्त्रता महसूस
करते होंगे, इसके अलावा आपको कोई दिक्कत हुई?
जो लोग किसी संगठन में नहीं हैं उनको दिक्कत होती है, लेकिन इस
दिक्कत का अपने मजा है। जब कांग्रेस का शासन आया तो हमे कहा गया कि
वामपंथी नहीं हो और आज कहा जा रहा है कि तुम भाजपा की विचारधारा से
जुड़े नहीं हो। लेखक को इस अकेलेपन की सख्त जरुरत होती है। मैं इस
उपेक्षा को भुगतता हूँ किन्तु एक सन्तुष्टि भी मिलती है, कि मेरा
जो कद साहित्य में है वह मेरा अपना बनाया है, प्रायोजित नहीं है।
०
भारतीय
और पश्चिम की सभ्यता में क्या अंतर है?
मुझे भारतीय से ज्यादा एशियाई सभ्यता कहना ज्यादा सही लगता है।
दोनों में फर्क है, एशियाई सभ्यता में मनुष्य को प्रकृति के साथ
देखा गया है। जब हम बीमार होते हैं तो यह नहीं कहते हैं कि प्रकृति
हमें मारना चाहती है, हम कहते हैं कि हमारी प्रकृति वात पित्त कफ
में असन्तुलन आ गया है। हमारी बीमारी की परीक्षा में तीनों दोषों
का महत्वपूर्ण स्थान है़। इस सन्तुलन को ठीककर लिया जाए हम ठीक हो
जाएंगे। पश्चिम में ऐसा नहीं है, वहाँ प्रकृति को दोषी मान कर इलाज
किया जाता है। वहाँ चिकित्सा एक फौजी कार्यवाही की तरह होता है।
०
आज साहित्य की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

सबसे बड़ी तो मुझे नहीं मालूम है , लेकिन एक है कि वह साहित्यकारों
में जानने की इच्छा खत्म होना। साहित्यकारों में यह इच्छा ही नहीं।
यदि विज्ञान में कोई विज्ञान की परम्परा जाने बिना पहुँच जाए तो
उसे भगा दिया जाता है। जब हमारे साहित्यकार कहते हैं कि वे अपनी
परम्परा नहीं जानते तो मुझे दया आती है। हजारों साल से हमारे
आदीवासी गीत गा रहे हैं, उनके नृत्य और दूसरी कलाएँ भी सहजता से
जीवित हैं। यह अधिक अच्छा है। जब देखने की इच्छा सड़ जाती है तो
साहित्यकार खिड़की से झाँकने लगता है। देखने की सहजता खो बैठता है।
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हिन्दी के साहित्यकार परम्परा की सुगन्ध क्यों नहीं समेटता?
कहाँ से समेटेगा? आपने संस्कृत ग्रन्थों के अनुवाद देखें हैं वे
बिल्कुल अपाठ्य और अनुपयोगीं हैं। इतने बुरे हैं कि कोई पढ़ना नहीं
चाहता। स चीज को हम प्राप्त नहीं कर सके, हमने दूसरों का अध्ययन
किया, लेकिन अपना अध्ययन नहीं किया। जो अध्ययन उपलब्ध है वह भी
किसी अंग्रेज या जर्मन द्वारा कया गया है। आप नाम सुनते हैं लोर्का
या दैरिदा, लेकिन हम अपने लोगों का अनुवाद नहीं कर सके। काफ्का से
किसी ने पूछा कि आप क्या पढ़ते हैं, तो उसने जवाब दिया कि मैं अपने
पुराने ग्रन्थ पढ़ता हूँ। लोगों को निराला के बारे में पता होना
चाहिए कि वे राम की शक्ति पूजा क्यों लिख सकें। वे परम्पराओं का
अध्ययन करते थे, संस्कृत ग्रन्थ पढ़ते थे।
हम विद्रोह तभी ला सकते हैं जब गहरे अध्ययन से उर्जा लें।
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हमें वैश्वीकरण में स्थान बनाने के लिए क्या करना चाहिए?
हमे लोकल की खिड़की से विश्व और वैश्वीकरण देखना चाहिए। मैं ऊपर कह
चुका हूँ कि हर कण विश्व का प्रतिनिधि है। बड़ी मजेदार बात है, कि
वैश्वीकरण से वे ज्यादा डर रहे हैं जिन्होने अपने विचार पश्चिम से
लिए हैं। वे हमारे डर का भी ठेका ले लेते हैं।
आधुनिक
यूरोप की कविता- श्रीप्रकाश मिश्र
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