अनूप भार्गव की कविताएँ  --- जीवन के गणित पर

सबसे कठिन सवाल

अंको की गणित
और तर्क की
ज्यामिती के दायरे
में कैद ज़िन्दगी
एक कठिन समीकरण
बन गई थी ।

तुम चुपके से आईं
और मेरे कान में
प्यार से
बस इतना ही कहा
'सुनो' .....

मैं मुस्कुरा दिया
और अचानक,
ज़िन्दगी के
सभी कठिन सवाल
बड़े आसान
से लगनें लगे ।

अनूप भार्गव की अन्य कविताएँ‍ )


पवन करण की कविताएँ - जिद पर

उसकी जिद

(छह कविताएँ)

एक

जूते से निकलकर एड़ी ऐसी टूटी कि नहीं बची
जुड़ने लायक फिर से
कोई था भी नहीं वहाँ जोड़ देता जो उसे
अब मेरे पैर में एक जूता एड़ी वाला था
और एक बिना एड़ीवाला

जब मैं खिसिया कर बैठ गया एक तरफ
तब वह उठी और उसने अपनी चप्पलों में से
एक की एड़ी तोड़ कर निकाली
और उसे मेरे बिना एड़ी वाले जूते में लगा कर लगी देखने
मैंने उससे कहा ये तुम क्या कर रही हो
तुम सुनती नहीं क्यों मेरी बात

फिर उसने एक एक कर चप्पल से
निकली हुई पुरानी कीलों के टेड़ेपन को किया ठीक
और अपनी चप्पल की एड़ी को
जूते में जोड़ कर कर दिया उसे तैयार

मेरे पैरों अब एड़ीदार जूते थे और उसकी स्थिति
अब मेरी जैसी थी एक पैर में बिना एड़ी वाली चप्पल
फिर उसे ना जाने क्या सूझा उसने अपने
दूसरे पैर की चप्पल की भी एड़ी निकाली
और यीक वहीं उछाल दी जहाँ
मेर जूते की टूटी एड़ी पड़ी थी

और ऐसा करके वह इतना खुश थी कि बार बार
मुझे बता रही थी कि इस वक्त वह जमीन पर
बिना एड़ीवाली चप्पल के चल नहीं रही बल्कि फिसल रही है.


( पवन करण की अन्य कविताएँ )


श्रीप्रकाश मिश्र की कविताएँ - पेड़ों पर
 

पीपल

जहाँ कसैली नीम की
मेरे और उसके खेतों का सीमंकन करती
उसी के धोँधड़ में
के जानी चिड़िया कि बन्दर कि हवा ने
गिरा दिया था एक बीज यूँ ही
कि जिसकी जड़े चीरती चली गईं थीं
नीम को खोखल करती
आपस में साँप की तरह लिपटती
पृथ्वी नहीं एक गात की तलाश में
कुंडली मारकर बैठती
मैथुन में लिप्त सरिसृप की तरह

और तना जिसका मस्तूल की तरह खड़ा
धीरे धीरे नीम को मिटाकर
हवा में टहनियों का जाल बुनता
एक दिन बन गया था बोधि
जिसकी जड़ों पर बैठकर एक अदृश्य गौतम
आज भी बटोरता है ज्ञान
घंट बंधे डालो की उलट गई खोपड़ी से
पीता है कापालिक सूरज रोज ही देवत्व
उसकी कोटर में बैठा किशो कृष्ण
चीर हरण के बाद देखता है
गोपियों का असंमजस

औरतें उसके तने में
जैसे ही लपेटती हैं जनेऊ
श्रीचक्र से उतरकर अदृश्य
पार्वती सिल्ली से धसती हैं योनि
हवा वारों तरफ से चिल्लाती है


वासुदेव वासुदेव!!


( श्रीप्रकाश मिश्र की अन्य कविताएँ.. )


अजेय की कविताएँ---कविताओं के बारे में

  

वक्त आया है ,
हम कविताएँ लिखें कविताओं के बारे में
खूब
इतनी कि
कविताएँ हमारी जेबों से निकल
बाजार में फैल जाएँ

मूँगफली की रेड़ियों पर
चाय की थड़ियों पर
पनवाड़ियों की पेटियों में
माचिस, बीड़ी और सुपारी के साथ सजी नजर आए।
 

( अजेय की अन्य कविताएँ )


राधेलाल विजघावने की कविता


स्मृतियों के दाने चुगती चिड़िया

तुम जिन फूलों ‌और चिड़ियों के नाम
बार बार दोहराती हो
उनके नाम मुझे कभी याद नहीं रहते
शायद तुम सोचती हो कि
मेरी याददाश्त बहुत कमजोर हो गई।

पर तुम यह भी दावा करती हो कि
मुझे पूरे ब्रह्माण्ड का भूगोल याद है
याद है तमाम स्मृतियाँ
जो समय बीतते बीतते जवान हो गईं।

तुम यह भी जानती हो कि
मैं बहुत आसानी से बता सकता कि
गाँव शहर ‌और कस्बे में कितने लोग रहते हैँ
उनकी क्या पहचाने हैं
उनके साथ कब कैसी कैसी घटनाएँ घटित हुईं
देश की महत्वपूर्ण और सनसनी खेज घटनाएँ
किस तारीख को अखबार में आईं
किस लड़की ने कब किससे प्यार किया और फिर तलाक दे दिया
मैं उस समय बेहद दुखी और उदास हो जाता हूँ
जब समय के आँगन में खिलता विसँता महक बिखेरता फूल
कुम्हालाकर रंग बदल लेता है
और मन के आँगन में प्यार का दाना चुगती चिड़ियाएँ
बिना सूचना के फुर्र से न जाने कहाँ उड़ जाती हैं।
वक्त की लहरें चट्टानों से टकरा टकराकर
अपने अस्तित्व मिटा लेती हैं।

मुझे उन तमाम रहस्यों घटनाओं दुर्घटनाओं से कोई लगाव नहीं
कोई प्रेम नहीं किसी सौन्दर्य बोधी युवा लड़की से
जो बार बार प्रेम से झूठ बोलती है
और धोखा देकर पाला बदल लेती है।

यह भी जानता हूँ कि जवान लड़कियाँ
जितना ज्यादा झूठ बोलेंगी
तमाम बदनामियों विपत्तियों से अपने को सुरक्षित बचा लेंगी
पर कई बार झूठ के भीतर बी उनकी मौत हत्या और बदनामी छिपी होती है
जिसके बारे में वे जानकर भी कुछ नहीं जानती।

अक्सर भरोसे बार बार डूब के कारण बनते हैं।
आस्था और विश्वास भी दबे पाँव धोखा और फरेबी करने लगते हैं।

ईमान किसी की स्थाई संपत्ति नहीं
जो आदमी विशेष के गले का ताबीज बन
मंदिर की घंटी की तरह टुनटुनाती रहे

शायद इसलिए मैं अपनी याददाश्त को भी
संदेहों के खड्ड में दफन कर देता हूँ
हत्या कर देता हूँ
अपनी ही इच्छाओं आकाँक्षाओं और तमन्नाओं को ताकि
उनकी संभावनाओं का जंगल विस्तरित न हो सके।

इसलिए मैं तुम्हारे भरोसेदार विश्वासों से दूर
आकांक्षाओं के घेरे में हूँ
ताकि आँगन की फुर्र से उड़ती मन की चिड़िया
मेरे विचारों और स्मृतियों के दाने चुगकर
कहीं उजाड़ जंगल में गुम न हो जाए।

(राधेलाल विजघावने की अन्य कविता)


इकबाल दीप के पंजाबी मुक्तक

सरमायेदार

समन्दर ने
दरिया से कहा
आ, जले लग जा
और
दरिया बेचारा
गरक गया
सारा कि सारा

(
इकबाल दीप के अन्य मुक्तक .. )


प्रदीप भट्ट की कविताएँ

माँ की लालटेन


साँझ ढलते ही
दिया बाती के समय
लगा देती थी माँ
लालटेन

मैंने सीखा है
अक्षरों को माण्डना
उसी के प्रकाश में

उसी लालटेन की लौ में
मेरी मुलाकात हुई थी
लेन्ज , आरेस्तेड, फेराडे
फिर
सार्त्त, स्पनोजा, शंकर
‌और कान्ट से

जब कभी भी
भभकती थी लौ
मुझे लगता था
ब्रह्माण्ड ने
कहीं न कहीं से
अंगड़ाई ली होगी
आज जब कविता में
उतरते डीबते
शब्दातीत होता हूँ
तो दिखाई देती है
माँ के लालटेन की वही लौ
ध्रुव सी अटल

और जब
उस ठौर के करीब से
गुजरता हूँ तो
याद आती है
माँ

जहाँ से फैलता था
उजाला पूरे घर में
वो ठौर मौजूद है
मेरे भीतर
जिसे मैं
जीवन के अंधेरे पलों में
अक्सर याद करता हूँ
‌‌और उदास हो जाता हूँ

यूँ बचपन की यादें
यादों के उजाले और
उजालों के ठौर
चलते हैं साथ साथ
माँ के नहीं रहने पर
जिन्दगी की तमाम
तंग गलियों में
एक बेटे की पूरी उम्र तक।


(
प्रदीप भट्ट की अन्य कविताएँ .. )  


रति सक्सेना की कविताएँ --- कुछ अनपहचानों के लिए‍

ऊँचाइयों के ढहने के किस्से

नीले अंधेरे में
अपने तन को कुतरते
कमजोर पीले दरख्त
चींटियों , कीड़ों , बिच्छुओं से
किस्से सुनते रहते हैं
उस आसमान के
जहाँ भरपूर रोशनी है
उस हवा के
जो पत्ते पत्ते को नचा देती है
उस बरसात के
जो चिड़ियों सा घोंसला बना लेती है
जब कोई तूफान गुजरता है तो
वे पूरे मन से प्रार्थना करते हैं
रुकने की
जो उन्हें दिलवा सके
उनके हिस्से की ऊँचाई

अजगर सा आसमान पर पसरा
विशाल पेड़ ढ़हने लगता है तो
उत्सव सा ललक उठता है उनका मन
वे दौड़ उठते हैं आसमान की ओर
किसी ओर के हिस्से की रोशनी , हवा
बरसात हथियाते हुए
ऊँचे उठते दरख्त तब तक भुला बैठते हैं
ऊँचाइयों के ढहने के किस्से।


(
रति सक्सेना की अन्य कविताएँ )

 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ