पवन करण

पवन करण की कविताएँ  

पवन करण की कविता में जिन्दगी बोलती है, जो कुछ वह रच रहे हैं वह जब पाठक के करीब पहुँचता है तो एक अजीब सी करीबी का अहसास होता है। स्त्री उनके लिए उनका अपना हिस्सा है, स्त्री के प्रति इतनी संवेदनशीलता शायद ही किसी के पास हो, स्त्री संबन्धित कविताओं में वे बस दृष्टा है, और पाठक उनकी निगाह से स्त्री को को देखता परखता है,  कवि कुछ नहीं कहता, जो कहना या करना है कवि के भीतर बैठी स्त्री करती है, फिर भी पाठक न जाने कैसे और कब उससे सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। यही पवन की कविता की शक्ति है। छह भागों मे बँटी यह लम्बी कविता इस बात को पुख्ता करती है।
 

दो


हेन्ड बैग को एक तरफ रखते हुए वह बोली
मैं इस बारीश को अपने बैग में भर लेना चाहती हूँ
मैंने कहा बिल्कुल तुम्हें किसने रोका है
उसने कहा नहीँ तुम्हारे साथ भीगते हुए
इस बैग में बारिश को भरना चाहती हूँ मैं

मैंने देखा कि बाहर धूप खिली हुई थी
मुझे उस पर हँसी आई लेकिन वह नहीं मानी
और मुझे खींचते हुए बाहर ले आई
कुछ देर मैं हँसता रहा उस पर
मगर धीरे- धीरे मुझे महसूस हुआ
जैसे मैं सचमुच बरसात में खड़ा हूँ
और भीग रहा हूँ बारिश में
और वह तो भीगने में मगन थी ही

फिर हम दोनो देर तक बारीश में भीगते
और अपने हाथों से उसे बैग में भरते रहे
फिर हम बैग और खुद को तर बतर लिए पानी से
लौट आए भीतर , भीतर आकर
सबसे पहले उसने अपने बालों का पानी झटका
और मैंने हथेलियों से अपने गीले मुँह को साफ किया

यह सुन कर किसी को आश्चर्य हो सकता है
कि मैंने इस तरह कितनी ही दफे उसकी जिद पर
उसके बैग में भरा ऐसी बारीश को
जिसका दूर- दूर तक नामोनिशान नहीं था

सिरफ भरा ही नहीं कई दफे तो मैंने
बचाकर उसकी आँख उसके बैग में भरे पानी को
सूख से जूझते पड़ोसी देश में उलट भी दिया

तीन

तुम अपने आप को क्या समझते हो
पीछे से कमर को जोर से पकड़ते हुए उसने पूछा
मैँने उत्तर दिया तुम्हारा प्रेमी

नहीं, नही तुम मुझे सच सच बताओ
तुम अपने आप को क्या समझते हो
कहा न तुम्हारा प्रेमी मैने दोहराया

कैसे मान लूँ,  तुम मेरे प्रेमी हो
मुझे सच्चा प्रेम करते हो
बात खींचते हुए उसने कहा
मैंने पूछा अच्छा तुम्ही बताओ मैं तुम्हे
किस तरह बताऊँ कि मैँ तुम्हे प्रेम करता हूँ

मैं नहीं मानती कि तुम मुझे प्रेम करते हो
अच्छा एक काम है जिसे तुम इसी वक्त सको
तो मुझे लगेगा कि तुम मुझ से प्रेम करते हो
मैंने कहा बताओ, मुझे क्या करना है

तुम इसी तरह मोटर साइकिल को चलाते हुए
पीछे मेरे होंठों को चूम कर दिखाओ तब मानूँगी
मैंने कहा नहीं ऐसा नहीं हो सकता
उसने कहा ठीक है गाड़ी रोको ,  मुझे उतारो
मैंने कहा ठीक चलो कोशिश करके देखता हूँ
फिर मैंने जैसे ही उसके होंठों को चूमने के लिए
अपने सिर को घुमाया पीछे की तरफ
वह चीखते हुए बोली क्या करते हो
मरना चाहते हो क्या,  क्या मेरे कहने पर कुँए में कूद जाओगे
कोई जरूरत नहीं कुछ करने की
मैं जानती हूँ मुझे बेहद प्यार करते हो

चार

अच्छा बताओ तो सही आज मैं इतनी खुश क्यों हूँ
मैंने कहा , मुझे क्या पता इस बारे में
मैं किसी के मन की थोड़े ही जानता हूँ

नहीं , उसने ठुनकते हुए कहा, बताओ
आज मैं इतनी खुश क्यों हूँ
मेरे मन मे क्या है यह तुम क्यों नहीं जानते
फिर मेरे मन में क्या है ये तुम नहीं जानोगे तो कौन जानेगा

मैंने कहा अच्छा ठहरों, मैं अन्दाज लगाता हूँ
मैं देर तक सोचता रहा
जब कुछ समझ में नहीं आया तो हार मानते हुए
मैंने कहा उससे, नहीं यार, तुम्हारी खुशी का कारण
नहीं ढ़ूँढ़ पा रहा हूँ मैं
मगर तुम इस तरह खुश अच्छी लग रही हो मुझे

नहीं बताओ, आज क्या काण है जो इतनी खुश हूँ मैं
उसने मेरे काम में बाधा पहुँचाते हुए कहा
मैंने हल्का सा खीजते हुए जवाब दिया क्या बताऊँ तुम्हें
जब मुझे कुछ सूझ नहीं रहा तो
होगा कोई कारण तुम्हारी खुशी का
बड़े आए कुछ सूझ नहीं रहा
होगा कोई कारण कहने वाले
क्यों नहीं सूझ रहा तुम्हे कुछ
चलो मैं ही बताती हूँ तुम्हे
कोई कारण नहीं है मेरी खुशी का, बस
आज मैँ खुश हूँ तो खुश हूँ

मगर मैं इतना जरूर चाही हूँ कि तुम मेरी
आज की इस खुशी को कोई नाम जरूर दो


पाँच

किसी बात पर नाराज वह बैठी सामने
मैंने घबराहट छुपाते हुए अपनी उससे पूछा
कोई ऐसी वैसी बात
उसने अपना सिर न में हिला दिया

वह देर तक उसी तरह बैठी रही
मैं उससे देर तक वजह पूछता रहा
मगर मैं जानता था कहीं न कहीं कुछ है

काम बन्द करते हुए मैंने उससे पूछा
अच्छा चाय पीकर आते हैं
वह बैठ कर चुपचाप चाय पीती रही
मैंने पूछा कुछ खाओगी उसने कहा नहीं

मैं लगातार उसे कुछ न कुछ बताता रहा
वह लगातार बिना कुछ बोले अपना सिर हिलाती रही
जब असहनीय हो गया मेरे लिए सब
मैंने खिसियाते हुए कहा आखिर बात क्या है
कुछ तो बोलो ऐसा कैसे चलेगा

अच्छा मैं चलती हूँ कहकर वह जाने लगी उठकर
अब यह पीड़ादायक था मेरे लिए
मैंने रास्ता रोकते हुए उसका उससे जाने को कहा
पहले बात बताओ तब जाने दूँगा

क्या फायदा बताने से वह बोली
तुम्हे कुछ याद भी रहता है
मैंने तुमसे कहा था न
आज लाल रंग की शर्ट पहन कर आने के लिए
उसका क्या हुआ भूल गए
चलो हटो मुझे जाने दो

छह

कुछ याद आते ही वह मेरी बात काटते हुए बोली
पहले मेरी बात सुनो
मैं तुम्हे कुछ बताना चाहती हूँ
कल रात मैंने एक सपना देखा उस बारे में

वह बोली मैंने देखा मैं गेंद हो गई हूँ
और तुमने मेरी जिद पर उछाल दिया है मुझे आकाश में
वहाँ पहुँचकर इधर उधर ढरक रही हूँ मैं
कभी कभी तारे से टकराती हूँ तो कभी किसी ग्रह से
और चाँद तो पीछै पड़ कर रह गया मेरे

मैं ऊपर से तुम्हे धरती पर आकाश की तरफ
मुँह करके खड़े मुझे खोजते देख पा रही हूँ
मैं तुम्हे आवाज दे देकर बुला रही हूँ
मगर तुम नहीं सुन पा रहे हो मुझे

अचानक चाँद ने रोक लिया है मेरा रास्ता
मुझसे करने लगा है प्रणय निवेदन
मैं घबरा रही हूँ
मैं किसी भी तरह उससे बचकर
तुम्हारे पास पहुँचना चाहती हूँ
अब तुम बताओ, मेरे सपने में आगे क्या हुआ होगा
उसने हँसते हुए मुझसे पूछा
मैने कहा मुझे क्या पता

फिर वह बोली
जब मुझे कोई रास्ता नहीं सूझा बचने का
तब मैंने चाँद को धरती पर तुम्हे दिखाते हुए कहा
वो देखो, वो नीचे, जो मुझे खोज रहा है
मुझे लगता है कि वह तुमसे भी ज्यादा ताकतवर है
उसी ने एक झटके में मुझे उछाल कर यहाँ तक पहुँचा दिया
क्या तुम उसी तरह एक बार में
नीचे धरती पर उछाल सकते हो

कितना मूरख था चाँद जो उसने भी
वही गलती दोहराई जो तुमने
सोचा ना समझा तुम्हारी तरह उसने भी
उछाल दिया मुझे धरती पर

फिर उसने भर्राती हुई आवाज में कहा
मैं चाहे कितनी भी जिद करूँ तुसे
तुम मेरी एक ना मानना जरूरी नहीं कि चाँद
हर बार मेरे कहने पर मूर्खता करे

 


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