बांग्ला कविताओं का अनुवाद


नासमझ


किसी ने मुझे सपनों का मुट्ठी भर चूरा दिया था

मैं नासमझ जीवन के जल में उसे घोलने गई।

पानी में इतना कुछ घुल जाता ,

दुःख - सुख आस पास घुलता हैं।

मैं उसे इतना हिलाती डुलाती और घोलती रही तब भी

सपनों का चूर्ण जीवन के जल में जरा नहीं घुला ।

प्यार का चम्मच हिलाती मैं रात - दिन

घुलने का इंतजार करती हूँ

लेकिन यह घुलता नहीं मिलता नहीं ।


कितनो ने दिया था , दिया था सतरंगी चूर्ण

घुलता नहीं मिलता नहीं ।


दरअसल सपनों का सारा चूर्ण किसी आखरी शाम को

फूंक मार कर हवा में उड़ा देना ही बेहतर है।

हवा में खो जायेगा , शून्य आसमान देख

रह - रह कर होगा सुन्दर स्वप्न - मंथन ।


जीवन को महज मोटे तौर पर जीने के सिवा

ज्यादा कुछ करने को नहीं है ।

तीसरी दुनिया के एक अनाथ आदमी के बस में ।



कष्ट की कस्तूरी


कुछ ऐसे कष्ट हैं

कि जख्म पर कोई मरहम नहीं लगता

किसी की देख भाल नहीं , जतन नहीं

गाढ़ी ममता में जागी हुई रात नहीं

आबोहवा बदलने जैसी कोई बात नहीं

यूँ ही ठीक हो जाते हैं ।


कुछ कष्ट हमेशा जलाते हैं

कुछ ऐसे हलके हो जाते हैं

कि फूंक मार कर उड़ा दिए जाएँ

लेकिन कष्ट के सूक्ष्म शरीर में भी

आग की लपटें रहती हैं ।



ऐसे सारे कष्ट

बरछी नहीं मारते

आँखें ही नहीं फोड़ते आपकी दोनों

जलाते - जलाते

दहकते अंगार में कर देते हैं तब्दील ।


कुछ कष्ट ऐसे भी हैं

जो रात बीतने से पहले

हवा में घुल जाते हैं ,

कुछ कष्ट घर कर जाते हैं

प्यार करते रह जाते हैं आजीवन ।


ऐसे जीवन की चाह


ऐसे रहते हैं कुछ लोग

जिनका कोई घर नहीं होता , आँगन नहीं होता ।


ऐसे भी रहते हैं कुछ लोग

कि शहर - भर मनुष्य ,

लेकिन प्यार करने वाला एक आदमी नहीं जुटता ।


क्या इस तरह नहीं रहते हैं कुछ लोग

जो जिंदगी भर पंछी और आकाश

मनुष्य और जंगल

समुद्र और शून्यता

देखते - देखते बूढ़े हो जाते हैं ।


और उम्र बढ़ते - बढ़ते क्या ऐसा नहीं होता

कि ढह जाने के ठीक पहले

और एक जीवन जीने की चाह होती है ।


ऐसा तो नहीं

कि नहीं होती

होती है !

रचना ----------- तसलीमा नसरीन ।

अनुवाद --------- मून मून सरकर ।

प्रस्तुति --------- मिता दास ।

 


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