मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
* All the legal application should be filed in Kerala, India, where the Kritya Trust registered.

 

 

 

 

        

 

'किसी पीड़ा को कविता में परवर्तित होने से पहले सान्द्र होने के लिये वक्त की दरकरार होती है,
पीड़ा की तुरन्त प्रतिक्रिया मिर्ची की धाँस से बहे आँसू की तरह आँशिक समय के लिये प्रभावशाली होती है। कविता की आवाज जरूर होती है, लेकिन वह कानों में पहुँचने से पहले आत्मा तक पहुँचती है।
कविता क्रूरता और हैवानियत का प्रतिकार है,
कविता खुबसूरती की पहचान है,
कविता अंधकार का विरोध है
कविता प्रेम का प्रतिरूप है
कविता का बारूद के रूप में उपयोग करने के लिये, उतने ही संयम की जरूरत होती है, जितनी कि एक विस्फोटक के निर्माण के लिये जरूरी है।
कविता को तलवार बनाने के लिये भी धार पर चलना आना चाहिये
कविता के लिये मुखर होना गलत नहीं, लेकिन मुखरता को पहचानना भी कविता का कर्तव्य है, ऐसे वक्त में जब कविता के स्थान पर मशाल हाथ में पकड़नी हो, कविता जगह दे सकती है। यह दैनिकचर्या नहीं जो हम किसी मौके पर हर वक्त किसी भी रूप में थमा दी जाये।
आज हम ऐसे कठिन समय में खड़े हैं, जहाँ पर कविता की जगह मशाल की जरूरत लग रही है, तो कविता शाइस्ता से जगह बनाये, यही अच्छा है, इसका मतलब यह नहीं कि वह चुप्पी साध लेगी, नहीं, वह अपने भीतरह बारुद बनायेगी, अपनी धार को तेज करेगी ,
और फिर कुछ ऐसे बोल कहेगी, जो आत्मा को चीर जाये, जो प्रेम को समझने की ताकत दें, जो क्रुरता का सफाया करने की क्षमता रखें
पिछले आठ सालों में पहली बार दिसम्बर मास में कृत्या ने अपनी अनुपस्थिति दर्ज की
यह अनुपस्थित उन अत्याचारो के विरोध में थी, जिसकी चरम परिणति इस मास में घटने वाले घटना में हुई
कृत्या कविता में पुनः विश्वास करती हुई , क्रूरता का विरोध करते हुए सच की राह का प्रण करते हुए पुनः चल पड़ी है
इस अंक के चित्रकार है, के रवीन्द्र
रति सक्सेना

और »

 

 

बच्चे आये खिलौनों के पास
जैसे माँ - बाप आते हैं
बच्चों के पास

किसी को प्यार से घूरा
किसी को गुस्से से सीधा किया
किसी को दे मारा
किसी को प्यार से पुचकारा
किसी को रास्ते पर पटक दिया
लीलाधर जगूड़ी
*
कोरी डायरी

अक्सर कोरी नहीं होती
उसमे लिखा होता है बहुत कुछ
कुछ भी नहीं लिखे होने के बाद भी

उसके कोरे पन्नो में
दर्ज होते हैं
अपने समय के सबसे खूबसूरत गीत
सबसे उम्दा शेर
सबसे प्यारी कवितायेँ
अंजन कुमार
*
नहीं देखी कभी एक किरण उजाले की
एक कतरा हवा का
सहते रहे सीलनी-अंधेरा
लड़ते रहे कठिन बीवरों से
तलाशते रहे जल
खनिज दल
गहराइयों में पैठकर
टकराए कठोर चट्टानों से भी
महेश पुनेठा
*
इनकी - उनकी
मानने के बीच ही कहीं
किसी लालसा में बहुत कुछ
ख्याली ही रहता यहाँ
जी हाँ
पदार्थ बनते " हम " बेचारे
बनाकर आपकी
सड़कें, संसद और
सरकारें

लेकिन
वे नहीं जानते कि
यहाँ भी
अमित कल्ला
*
पूरा मकान
धूप के कब्जे में है
दीवारें,आमुख,पीठ
और आजु-बाजु
फाटक,कुंदे,दरवाज़े
दरख़्त और खिड़कियाँ
कुछ भी अछूता नहीं
मतलब ढँका हैं
पूरा मकान धूप से

इक्का-दुक्का कौनें छोड़
पसरी है धूप हर तरफ
गोखड़ों से रिसती हुई
उतरती हुई सीढ़ियाँ
आ पहूंची है
धूप

ड्याड़ी वाले ओवरे तक

घर के सभी नहा लिए हैं
धूप के प्रभाव से
न रहा कोई मरहूम
इस मौसम में बस
छांव बन गयी
अतीत का हिस्सा
संस्मरण की विषयवस्तु सी
लगने लगी इतिहास बोध
माणिक
और »

 

मुझे एक लम्बे समय तक शमशेर के सम्पर्क में रहने का सुअवसर मिला है ।  बहुतेरों की तरह उनसे निकटता का दावा भी कर सकता हूं । मैं उनके घर पर गया हूं और वे भी मेरे घर पर आए हैं  दिल्ली विश्वविद्यालय के उनके कार्यालय में और बाहर हुई सभाओं आदि में भी उनसे मुलाकात करने के मुझे सुअवसर मिले हैं । शमशेर जी स्रे मेरा पहला वास्ता 70 के दशक में ही पड़ा था । बहुत ही प्रभावशाली ढ़ंग से । मैं दिल्ली की एक कॉलोनी लाजपतनगर में रहता था । शमशेर जी भी वहीं रह रहे थे । यह बात मुझे कुछ बाद में पता चली थी । आकाशवाणी ने मावलंकार हॉल में, भारी संख्या में उपस्थित श्रोताओं के समक्ष कवि-गोष्ठी का आयोजन किया था । युवा कवियों में मैं भी एक था । कवियों और कविताओं का चयन एक समिति ने किया था जिसमें कवि शमशेर भी एक सदस्य थे । यह बात मुझे आयोजन के समाप्त होने पर पता चली थी । शमशेर जी से तब तक मेरा परिचय भी नहीं था । मंच पर ही पहली मुलाकात में पता चला था कि वे भई लाजपत नगर में ही रहते हैं । उनके चश्में में से प्रॊढ़ता का गाम्भीर्य पूरी तरह झलक रहा था । बोले-’तुम्हारी कविताएं एक साथ पढ़ना चाहूंगा । अच्छा लगा लेकिन बात आई-गई हो गयी । उन दिनों मैं कवि भारतभूषण के सम्पर्क में भी था । एक संदर्भ में भारत जी से शमशेर की बात का ज़िक्र हुआ तो वे तपाक से बोले कि शमशेर आज के बड़े कवि हैं । उन्होंने कविताओं की पांडुलिपि उन्हें तुरन्त दे देने की सलाह दी । मैंने वैसा ही किया । यूं उनसे मिलते रहने का सिलसिला चल निकला । बहुत ही गम्भीरता से लेकिन सहानुभूति के साथ वे मेरी कविताओं को देखते रहे. सुझाव देते रहे और कुछ कविताओं को स्वीकृत-अस्वीकत करते रहे ।साहित्य और दुनिया से जुड़ी कितनी ही बातें होती रहीं । बाद में मॉडल टाउन चले गए तो भी मिलना-जुलना होता रहा । उनके माध्यम से अंग्रेजी और उर्दू के क्लासिकी साहित्य से रू-ब-रू होता रहा । मैंने उनकी सोच औरउ नके व्यक्तित्व में बहुत गहरे तालमेल का अनुभव किया था।

दिविक रमेश
और »  

 

मृत्यु दंड

एक चील चीख उठा दोपहर में ,

बज उठा , बिदाई ,

चतुर दिक् प्रतिध्वनि , बिदाई !

बिदाई , बिदाई !

ट्राम लाइन पर धूप पानी , पेड़ की छाँव में खड़ा था मैं ,

छलनी हुआ नग्न सीना ;

यह पृथ्वी मुझे बुलाकर दिखाती है अचानक ही

आकाश स्मृति में रूपांतरित होता हुआ

रूप के चले जाने पर , सब कुछ रूपांतरित हो जाता है

नींद के भीतर सोई , एक आँख के भीतर की रश्मि देख

अन्धकार के मुख को छुपा लिया एक और अंधकार ने ।

जैसे अचानक ही हवा मेघ धूप बृष्टि एवं

गली के मोड़ का वह घर , एक या दो पक्षी

चलती ट्राम की अनचीन्ही आँखें , जुलुस के नत मुख की शोभा ,

समस्वर में बुलाकर कहा , तुम्हे चिरकाल के लिए बिदा कर दिया

चिरकाल के लिए बिदा कर दिया बिदाई ,

चतुर्दिक प्रतिध्वनि , बिदाई , बिदाई ,बिदाई ।

बंदी , जाग रहे हो ?

चराचर [ जड़ और चेतन ] का अन्धकार , निशब्द

निशीथ [ गहरी रात ] में पुकार उठता है :

बंदी , जाग रहे हो ?

बंदी क्या सो पाता है ? न की जागरण ही है उसकी बंदीशाला

माथे के भीतर की ज्वाला कायम रहती है सारी जिंदगी पल - अनुपल

हर पड़ाव पर जंजीर का स्वर --- उसकी निःसंगता , अँधेरी कोठरी के

भीतर के स्वप्न की तरह धूप आकर

अस्तित्व का एहसास करा जाती है , यह कैसी निष्ठुरता ---- कि
चिरकाल से ही

जागृत रह कर , उसे प्रश्न करता

सुनील गंगोपाध्याय
और »  

 

ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता

तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान, झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता

कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता

ग़म अगरचे जाँ-गुसल है, पर कहाँ बचें कि दिल है
गम-ए-इश्क गर न होता, गम-ए-रोज़गार होता

कहूँ किस से मैं कि क्या है! शब्-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता?

हुए मर के हम जो रुसवा हुए क्यूं न ग़र्क़-ए-दरया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता

ये मसाएल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ग़ालिब
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख्वार होता
*
ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना
बन गया रकीब आखिर,था जो राजदां अपना

मय** वोह क्यूं बोहत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रब
आज ही हुआ मंज़ूर, उनको इम्तिहाँ अपना

मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से इधर होता काश कि मकाँ अपना

दे वोह जिस क़दर ज़िल्लत, हम हंसी में टालेंगे
बारे आशना निकला, उनका पासबां, अपना

दर्द-ए-दिल लिखूं कब तक, जाऊं उनको दिखला दूँ
उंगलियाँ फिगार अपनी, खामा खूं-चकां अपना

ता करे न गम्माज़ी, कर लिया है दुश्मन को
दोस्त की शिकायत में, हमने हमज़बाँ अपना
हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
मिर्ज़ा ग़ालिब
 और »

VOL - VIII/ ISSUE-V
(जनवरी  2013
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए