कृत्या प्रकाशन की  पुस्तकें
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किसी पीड़ा को कविता में परवर्तित होने से पहले सान्द्र होने के लिये वक्त की दरकरार होती है,
पीड़ा की तुरन्त प्रतिक्रिया मिर्ची की धाँस से बहे आँसू की तरह आँशिक समय के लिये प्रभावशाली होती है। कविता की आवाज जरूर होती है, लेकिन वह कानों में पहुँचने से पहले आत्मा तक पहुँचती है।


कविता क्रूरता और हैवानियत का प्रतिकार है,
कविता खूबसूरती की पहचान है,
कविता अंधकार का विरोध है
कविता प्रेम का प्रतिरूप है

कविता का बारूद के रूप में उपयोग करने के लिये, उतने ही संयम की जरूरत होती है, जितनी कि एक विस्फोटक के निर्माण के लिये जरूरी है।

कविता को तलवार बनाने के लिये भी धार पर चलना आना चाहिये

कविता के लिये मुखर होना गलत नहीं, लेकिन मुखरता को पहचानना भी कविता का कर्तव्य है

ऐसे वक्त में जब कविता के स्थान पर मशाल हाथ में पकड़नी हो, कविता जगह दे सकती है। यह दैनिकचर्या नहीं जो हम किसी मौके पर हर वक्त किसी भी रूप में थमा दी जाये।

आज हम ऐसे कठिन समय में खड़े हैं, जहाँ पर कविता की जगह मशाल की जरूरत लग रही है, तो कविता शाइस्ता से जगह बनाये, यही अच्छा है, इसका मतलब यह नहीं कि वह चुप्पी साध लेगी, नहीं, वह अपने भीतरह बारुद बनायेगी, अपनी धार को तेज करेगी ,

और फिर कुछ ऐसे बोल कहेगी, जो आत्मा को चीर जाये, जो प्रेम को समझने की ताकत दें, जो क्रूरता का सफाया करने की क्षमता रखें

पिछले आठ सालों में पहली बार दिसम्बर मास में कृत्या ने अपनी अनुपस्थिति दर्ज की

यह अनुपस्थित उन अत्याचारो के विरोध में थी, जिसकी चरम परिणति इस मास में घटने वाले घटना में हुई

कृत्या कविता में पुनः विश्वास करती हुई , क्रूरता का विरोध करते हुए सच की राह का प्रण करते हुए पुनः चल पड़ी है


इस अंक के चित्रकार है, के रवीन्द्र


आप सबको नये वर्ष की शुभ कामनायें

रति सक्सेना


     पत्र-संपादक के नाम                                                  
 


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