मिर्ज़ा ग़ालिब

ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते, यही इंतज़ार होता

तेरे वादे पर जिए हम, तो ये जान, झूट जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर एतबार होता

कोई मेरे दिल से पूछे, तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये खलिश कहाँ से होती, जो जिगर के पार होता

ग़म अगरचे जाँ-गुसल है, पर कहाँ बचें कि दिल है
गम-ए-इश्क गर न होता, गम-ए-रोज़गार होता

कहूँ किस से मैं कि क्या है! शब्-ए-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता?

हुए मर के हम जो रुसवा हुए क्यूं न ग़र्क़-ए-दरया
न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता

ये मसाएल-ए-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ग़ालिब
तुझे हम वली समझते, जो न बादाख्वार होता

*

ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना
बन गया रकीब आखिर,था जो राजदां अपना
[raqeeb=rival in love]
मय** वोह क्यूं बोहत पीते बज़्म-ए-ग़ैर में या रब
आज ही हुआ मंज़ूर, उनको इम्तिहाँ अपना
[**liquor]
मंज़र एक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श से इधर होता काश कि मकाँ अपना

दे वोह जिस क़दर ज़िल्लत, हम हंसी में टालेंगे
बारे आशना निकला, उनका पासबां, अपना

दर्द-ए-दिल लिखूं कब तक, जाऊं उनको दिखला दूँ
उंगलियाँ फिगार अपनी, खामा खूं-चकां अपना

ता करे न गम्माज़ी, कर लिया है दुश्मन को
दोस्त की शिकायत में, हमने हमज़बाँ अपना

हम कहाँ के दाना थे, किस हुनर में यकता थे
बे-सबब हुआ ग़ालिब दुश्मन आसमां अपना

*

बाज़ीचा-ए-अत्फाल* है दुनिया मेरे आगे
होता है शब्-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

ईमाँ मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र
काबा मेरे पीछे है कलीसा मेरे आगे

आशिक हूँ पे माशूक-फरेबी है मेरा काम
मजनूं को बुरा कहती है लैला मेरे आगे

गो हाथ को जुंबिश* नहीं आँखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे

सच कहते हो खुद-बीन-ओ-खुद-आरा हूँ, न क्यूँ हूँ
बैठा है बुत-इ-आइना-सीमा* मेरे आगे

वो फ़िराक और वो विसाल कहाँ
वो शब्-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहाँ

फुर्सत-ए-कारोबार-ए-शौक़ किसे
ज़ौक-ए-नज़ारा-ए-जमाल कहाँ

थी वो एक शख्स के तसव्वुर से
अब वो रानाई-ए-ख़याल कहाँ

ऐसा आसान नहीं लहू रोना
दिल में ताक़त जिगर में हाल कहाँ

फिक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूँ
मैं कहाँ और यह वबाल कहाँ

*

बस कि दुशवार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्सां होना

गिरया, चाहे है खराबी मेरे काशाने की
दर-ओ-दीवार से टपके है बियाबां होना

वाए-दीवानगी-ए-शौक़ कि हर दम मुझको
आप आ जाना इधर, आप ही हैराँ होना

जलवा अज़-बस-कि तकाज़ा-ए-निगाह करता है
जौहर-ए-आईना* भी चाहे है मिज़्गाँ होना
 [मिज्ह्गां=पलकें]

इशरत-ए-क़त्ल गह अहल-ए-तमन्ना मत पूछ
ईद नज़ारा है शमशीर का उरयां होना

की मेरे क़त्ल के बाद उसने जफ़ा से तोबा
हाए उस ज़ूद-पशेमां का पशेमां होना
[ज़ूद=जल्दी, ज़ूद पशेमां=शीघ्र लज्जित होने वाला]

हैफ उस चार गिरह कपड़े की क़िस्मत गालिब
जिस की किस्मत में हो आशिक़ का गिरेबां होना

*[जौहर-ए-आईना=आईने का जौहर, फौलाद के आईने साफ कर के छाने जाते थे, इस तरह उन पर जो लकीरें पड़ती थीं उनको जौहर कहते थे]


न गुल-ए-नग़्मा हूं न परदा-ए-साज़
मैं हूं अपनी शिकस्त की आवाज़

तू और आराईश-ए-ख़म-ए-काकुल
मैं और अंदेशए-हाए-दूर-दराज़

लाफ़-ए-तमकीं फ़रेब-ए-सादा-दिली
हम हैं और राज़हाए सीना-ए-गुदाज़

हूं गिरफ़्तार-ए-उल्फ़त-ए-सय्याद
वरना बाक़ी है ताक़त-ए-परवाज़

नहीं दिल में मेरे वह क़तरा-ए-ख़ूं
जिस से मिश्गां हुई न हो गुलबाज़

मुझको पूछा तो कुछ ग़ज़ब न हुआ
मैं ग़रीब और तू ग़रीबनवाज़

अस'अदुल्लाह ख़ां तमाम हुआ
ए दरेग़ा वह रिंद-ए-शाहिद-बाज़

मिर्ज़ा ग़ालिब
 


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