बसन्त जैतली  की कविता

मृत्यु के बाद प्रेम


एक दिन
सब की तरह
मर गया मैं
और जैसा होना था
ठीक वैसे ही
जिस्म से कट गयी रूह |

एक प्रकाश,
एक पुरसुकून उजाला
लेने भी आया मुझे |

मैं कहीं गया नहीं,
मंडराता रहा
तुम्हारे ही चारों ओर|

मैंने थपथपाए
तुम्हारे गाल,
हौले से छुआ
तुम्हारे होठों को,
कुछ कहा धीमे से
तुम्हारे कानों में,
सहलाया बालों को,
तुम्हारी पलकों पर
मारी एक फूँक,
कोशिश की बाहों में
समेटने की |

कुछ नहीं हुआ,
तुम निर्निमेष देखती रहीं
मेरी निष्प्राण देह,
नहीं सुन पाईं
वह आवाज़
जो कह रही थी बार-बार
" मैं तो मर कर भी
मेरी जान तुझे चाहूँगा |"

मुझे जाना ही नहीं था कहीं
तुम्हे यों ही
यहाँ छोड़ कर |

(बसन्त जैतली  की अन्य कविताएँ )


अमित कल्ला की कविता

 
इनकी - उनकी
मानने के बीच ही कहीं
किसी लालसा में बहुत कुछ
ख्याली ही रहता यहाँ
जी हाँ
पदार्थ बनते " हम " बेचारे
बनाकर आपकी
सड़कें, संसद और
सरकारें

लेकिन
वे नहीं जानते कि
यहाँ भी

पेड़ों को फैलने के लिए आसमान
पशुओं को चरने का चरागाह
मछली को गहरा पानी
महिलाओं को इंधन और
शौचालय
बुजुर्गों को ऐनक चाहिए

कहते हैं कि
ये नये समय की नई बात है
क्या कभी आप ने गाँव देखा है
कुछ सयाने लोग
सिविल लाइन से
उन्हें देखते और नापते भी
हमें बना बनाकर ।
कुछ सयाने लोग
सिविल लाइन से
उन्हें देखते और नापते भी
हमें बना बनाकर ।

पेड़ों को फैलने के लिए आसमान
पशुओं को चरने का चरागाह
मछली को गहरा पानी
महिलाओं को इंधन और
शौचालय
बुजुर्गों को ऐनक चाहिए


(अमित कल्ला की अन्य कविताएँ)


महेश पुनेठा की कविता


जड़े


नहीं देखी कभी एक किरण उजाले की

एक कतरा हवा का

सहते रहे सीलनी-अंधेरा

लड़ते रहे कठिन बीवरों से

तलाशते रहे जल

खनिज दल

गहराइयों में पैठकर

टकराए कठोर चट्टानों से भी



तब कहीं जाकर

पलुराए कोमल-कोमल पत्ते

सुशोभित हुए सुरभित सुमन

लकदक लदे मीठे-सरस फल



सहस्रबाहु की तरह भुजाएं फैलाए

आसमान से सिर लड़ाए

खड़ा हुआ पेड़



गाए सभी ने गुण

पत्ती-फूल-फल-तने के

जड़ें याद नहीं आई किसी को।

(महेश पुनेठा  की अन्य कविताएँ)


माणिक की कविता
 

धूप के आगोश में


पूरा मकान

धूप के कब्जे में है

दीवारें,आमुख,पीठ

और आजु-बाजु

फाटक,कुंदे,दरवाज़े

दरख़्त और खिड़कियाँ

कुछ भी अछूता नहीं

मतलब ढँका हैं

पूरा मकान धूप से


इक्का-दुक्का कौनें छोड़

पसरी है धूप हर तरफ

गोखड़ों से रिसती हुई

उतरती हुई सीढ़ियाँ

आ पहूंची है

धूप

ड्याड़ी वाले ओवरे तक

 
घर के सभी नहा लिए हैं

धूप के प्रभाव से

न रहा कोई मरहूम

इस मौसम में बस

छांव बन गयी

अतीत का हिस्सा

संस्मरण की विषयवस्तु सी

लगने लगी इतिहास बोध

का आँगन अब


धूप वहाँ भी आ पहुँची

जहां आलियों में

दीवाली के दीप

रखते थे

हमारे नन्हें हाथ

सींचते थे तुलसी के क्यारे


अफसोस

धूप के तपीश में

वे नन्हीं कलियाँ,पराग

भी आ चुके हैं

जो हाल उगे हैं

मुंडेर से सटे

गमलों में कहीं-कहीं


यूं

पूरी छत आग उगलती है

अब पीड़ा सीमापार हुई

कब तक मौन धरें

बैठें हाथ पे हाथ धरे

कब तक न कहे

कुछ भी अपशब्द जैसा कुछ

धूप के मौसम में


(  माणिक की अन्य कविताएँ)


अंजन कुमार  की कविता

कोरी डायरी


अक्सर कोरी नहीं होती

उसमे लिखा होता है बहुत कुछ

कुछ भी नहीं लिखे होने के बाद भी


उसके कोरे पन्नो में

दर्ज होते हैं

अपने समय के सबसे खूबसूरत गीत

सबसे उम्दा शेर

सबसे प्यारी कवितायेँ

और जीवन की सबसे उम्दा बातें


उसके कोरे पन्नो में

इंतजार के लम्बे - लम्बे दिन होते हैं

मिलन की छोटी - छोटी घड़ियाँ

जागी हुई कई उदास रातें

चाँद , तारे , फूल , पत्तियां ,

पेड़ , पहाड़ , नदी , झरने


उसके कोरे पन्नो पर

सदियों पुरानी दीवारें होती हैं

दीवारों के साथ कुछ अदृश्य जंजीरें

जो खिडकियों से झांकती हैं

और दरवाज़ों - सी

सिर्फ भीतर ही खुलती हैं


उसके कोरे पन्नो पर

एक अधूरा घोंसला होता है

आंसुओं में भीगे हुए

कुछ टूटे हुए पर

और पेड़ से उड़ कर

पहाड़ों में कहीं खो चुका

चिड़ियों का एक जोड़ा


ये कोरे पन्ने

मन के उस कोने से कम नहीं

जहाँ किसी और को जाने की

इजाजत नही

कोरी डायरी

अक्सर कोरी नही होती

उसमे दबे हों अगर

सूखे हुए फूल ।


( अंजन कुमार की अन्य कविता)


संतोष (सारंगपाणि) की कविता

कुछ यूँ ही


जब तेरी मखमली उँगलियों की छुवन से,
दिल की धड़कनों का ताप बढ़ जाता है ,
कसम से,
क्रांति और विद्रोह के उबाल से
ये दिल लबरेज हो जाता है ;
चमड़ी-चमड़ी , खून-खून का भेद मिट जाता है, और
दिल को दिल से प्यार हो जाता है;
उस पल को इस दिल से बड़ा साम्यवादी ,
इस जहाँ में कोई और नहीं होता है !
कसम से,
दिल का मिजाज़ भी अजीब होता है,
सुबह सुबह मोहबत्त की यादों को बाथरूम में धो डालता है, और
दिन भर उन फैक्ट्रियों में गुम हो जाता है,
जहाँ लेन देन तो इंसानी जरूरियात का होता है ,

मगर कारोबार तो आदमियत के एहसास का होता है !
फिर भी, कसम से,
कई बार तो दिल दिन भर घुमड़ घुमड़ के घुमड़ता है,
हवाई जहाज से सड़कों का सफ़र करने वाली,
उस नीली आँखों वाली लडकी के साथ,
नग्न होकर आलीशान ओनसेन के पारदर्शी गर्म पानी में,
घंटों गुजार देने के हसीन चाह में,
दिल मानता ही नहीं कि क्रांति तो एक सपना भर है, और
बिना डॉलर के इस नयी दुनिया के रास्ते कठिन हुआ करते हैं !
कसम से ,
फिर तो दिल गजब की पलटी मारता है,
उसका जानेमन को बागी बना देने का दिल करता है,
पुकारता है वो बड़ी उम्मीद से,
आ ! चल, छोड़ दें इन इंसानों की दुनिया को ,
और साथ साथ किसी जंगल में रायफल लिए भटकते हैं,
हर एक आदिम जात को आधुनिकता से मुक्त करते हुए,
एक-एक गोली अपने सदियों पुराने कंडीशंड दिमाग में दागते हैं,
फिर हड़प्पा युग से भी पहले मौजूद किसी झरने के नीचे बैठ के,
दुनिया की परिभाषा फिर से गढ़ते हुए एक-एक जाम टकराते हैं !
कसम से ! "

* ओनसेन= गर्म पानी के सोते का जापानी नाम!

((संतोष (सारंगपाणि) की अन्य कविता)


लीलाधर जगूड़ी की कविता


खिलौने


बच्चे आये खिलौनों के पास

जैसे माँ - बाप आते हैं

बच्चों के पास



किसी को प्यार से घूरा

किसी को गुस्से से सीधा किया

किसी को दे मारा

किसी को प्यार से पुचकारा

किसी को रास्ते पर पटक दिया


माँ - बाप आये और बच्चों को डांटने लगे

ऐसे फैंके जाते हैं खिलौने ?


डांट लगे बच्चे आये

गलत जगह छूटे खिलौनों के पास

और खिलौनों को पटक - पटक कर डांट लगाई

जैसे की वे ही उन खिलौनों के माँ - बाप हों


फिर ईश्वर आया सपने में बच्चों के पास

गलत जगह खिलौनों की तरह पड़े हुए

बच्चों के पास

किसी को धौल मारी

किसी को धक्का

किसी का अंग - भंग किया

किसी को अधिक बीमार

किसी को मौत के घाट उतारा

हर कोई ऐसे ही खेलता है अपने खिलौनों से


(लीलाधर जगूड़ी की अन्य कविता)


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