महेश पुनेठा

गौरव


बंधनों पर कभी
एक भी शब्द नहीं फूटा मुँह से जिनके


वे बहुत चैकन्ने हो गए
चिता पर रखने से पहले
रह न जाय उसके शरीर में कोई बंधन
चूड़ी....चरेऊ.....पायेज .......


सभी बंधनों से मुक्त कर मुर्दे को
मुक्तिदाता सा गौरव
झलक गया चेहरों में उनके।


बशर्ते कि .........


कोई आलोचना नहीं रोक सकती है
कविता का लिखा जाना
वह लिखी जाएगी
वैसी ही लिखी जाएगी
जैसी लिखी जानी है
बशर्ते की उसे एक कवि लिख रहा हो।


खिनुवा


खिनुवा का पेड़ हूँ मैं
तुम कहाँ पहचानोगे मुझे


मैं नहीं दे सकता हूँ तुम्हें
सरस-स्वादिष्ट फल
नहीं बन सकता हूँ तुम्हारी हवेली की
दरवाजे-खिड़कियों की चैखट
मेरे पास नहीं हैं
चित्ताकर्षक और सुगंधित फूल
जिन्हें सजा सको तुम अपने फूलदानों में


न मैं कोई पवित्र पेड़ हूँ।


तुम्हारे व्यवहार पर
मुझे न आश्चर्य है और न अफसोस
मैं अच्छी तरह पहचानता हूँ तुम्हें


तपती दुपहरी बिच
बीहड़ में भटकते को
मैं दे सकता हूँ गझिन छाया
ठंड में ठिठुरते की रात को

गरमा सकता हूँ
लौकी-ककड़ी-तोरई की बेलों के लिए
बन सकता हूँ माकूल ठाड.रा ।


काट कर फेंक दो मुझे
तमाम उपेक्षाओं के बावजूद
जरा सी मिट्टी और नमी पाकर
फिर से खड़ा हो सकता हूँ
फैला सकता हूँ अपनी भुजाएं


खुशी है मुझे
शामिल हो सकता हूँ
पक्षियों के मुक्ति समूहगान में
दूर आसमान की उड़ान में ।


तुम नहीं पहचानोगे मुझे
मैं खिनुवा का पेड़ हूँ।


संक्रमण


वे केवल हमारी जेबें ही खाली नहीं करते
जेब के रास्ते दिल-दिमाग तक भी पहुँच जाते हैं
खाली कर उन्हें
अपने मतलब के साॅफ्टवेयर लोड कर देते हैं वहाँ


सूखे काठ में बदल देते हैं हमारी आत्मा को


एक औचित्य प्रदान करते हैं वे
अपने हर काम को
जैसे वही हों सबसे जरूरी
और
सबसे लोक कल्याणकारी ।


वे जोकों से भी खतरनाक होते हैं


केवल खून ही नहीं चूसते
खतरनाक वायरस भी छोड़ जाते हैं हमारे भीतर
जिसके खिलाफ
कारगर नहीं होता है कोई भी एंटी वायरस

रीढ़ और घुटने तक नहीं बच पाते साबूत


पता तक नहीं चलता
कि
कब सरीसृप में बदल गए हम
कब संवेदनाओं की धार कुंद हो गयी।


गरियाते रहें उन्हें दिन-रात भले
मौका मिलते ही
खुद भी चूसने में पीछे नहीं रहते हैं हम


और
फिर हम भी
उसे औचित्य प्रदान करने में लग जाते हैं।


उदास दिनों की कविता


दिन हो गए हैं लंबे
रातें और भी लंबी दो हाथ
रिश्ते निरर्थक
हवा बिल्कुल शुष्क
पानी फीका-फीका
मन चट्टान
खून बर्फ


डर लगता है बहुत
ऐसे में
कोई कविता लिखने पर
आने-वाले दिनों की।


संपर्क- महेश चंद्र पुनेठा जोशी भवन निकट लीड बैंक पिथौरागढ़ 262501
 


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