माणिक
 

('माँ' शीर्षक वाली क्षणिकाएं )


(1)

किधर करूँ गमन

तुम्ही कह दो


अक्सर होती

घटनाओं की तरह

महिलामित्र से लम्बी बात के

ऐनवक्त

वेटिंग कोल में

माँ का नंबर आता है


जानता हूँ

जिसे लगाने में

माँ ने गाँव के कितने

आते जाते लोगों के नोरे (मनुहार) किये होंगे


जतन से संभाली

पल्लू बंधी परची

से दड़बेदार आखर

फिर हुए होंगे पुलकित



जिन्हें मिलाने से

माँ का मोबाईल नंबर

मेरे सेल पर आता है

और मैं फटाक से

बकरे की गरदन की तरह

महिलामित्र को 'बाई' कह

फोन काट देना चाहता हूँ

माँ से बतियाने की जुस्तजू में


(2)

माँ के मौन को

नहीं समझ पाया

इस बार फिर

कथित तौर पर मैं पढ़ा लिखा

साबित हुआ


बहुत से बेकाम निबटाने की

दुहाई देते हुए

आखिर लौट आया

गाँव से यहाँ

अपनी दुनिया में



जब आया

गाँव छोड़ कर पीछे

एक दिन के फेरे से

वापसी में

केवल एकाएक ठोर

शहर ही दिखा मुझे

अफसोस


मगर

मन फुसफुसाता रहा

माँ की अनकही बातें

मेरे ही कानों में

रातभर

शहरी चकाचौन्धियाते

सन्नाटे

के बीच


मैं करता रहा

असफल कोशिशें

माँ के मौन

का सरलार्थ

समझने की


आकाशवाणी 


(1)

ठुकी हुई है

आँगन बीच एक आरामकुर्सी

टांग पर टांग धरे बैठा है

एक सुस्त रविवार

आँखों में आकाश लटकता है एक

और एक पुरानी दीवार

किले का सारा बोझ धरे

पीठ झुकाए हंस रही हैं

एक दुपहरी आँगन में


(2)

कांपता हुआ एक दरवाज़ा है

जो छोटी फाटक का हाथ थामे खड़ा है

नि:शब्द

ताक रहा है उन्हें

आठ घंटे से एक सचेत चौकीदार

लठ्ठ लिए हाथों में


(3)

बेचारी 6 बाल्टियां हैं

जो सालभर से लटकी हैं कुंदों में

लाल रंग से पूती हुयी वे

रेतभरा बदन लिए अखंड खड़ी हैं

माथे पर लिख कर

आग आग आग

सेवा में तत्पर

अर्धांगिनियों की-सी


(4)

बैठकों के इंतज़ार में

एक फर्श बिछा हुआ है

आँगन में

लगी हुयी हैं कुछ कुर्सियां

दूर से ही हाल पूछती

एक दूजे को सलामती

दूर से ही


(5)

एक लाड प्यार में पली दीवार है

जिस पर बोगोंविलिया खिलता है

हिलती है ज़रूरत के मुताबिक़

डालियाँ यहाँ पेड़ों की

पत्तियाँ उच्चारण का अभ्यास करती हैं

यहाँ आँगन में


(6)

कुछ उतरे हुए रंग के गमले

रखे हैं पंक्तिबद्ध

आवभगत में

सिर पर उठाये भांत भांत पौधे

बगीचा मुस्कुराता है

मेहनताना मांगे बगैर

अन्दर ही अन्दर

खपते हुए मजदूर की तरह


(7)

एक नज़र है जो

दरवाजे तक जाकर

लौट आती दर्ज़नों बार

उसी तरह कुछ उदघोषणाएं हैं

जो बजती है किये हुए वादों की तरह

एक अभियंता है

जो बटन मरोड़ता हैं

तय समय पर

इस आंगन में


(8)

आँगन में

एक लाल मुँही पाईप है

जिसकी पहुँच

पानी के टेंक और कोलोनी की टंकी तक है

टेरेकोटा के कुछ पेनल हैं

जो लगातार आवाज़ देकर बुलाते हैं

आतेजाते राही का

मन बहलाते हैं

गाँव में आयी नौटंकी की तरह


(9)

पहाड़ सी ऊँचाई है

आँगन लगे टावर में

जहां धूप और छांव

छपे हुए कलेंडर की तरह

चिपके है क्षितिज तक


(10)

एक रूठे हुए दोस्त की तरह

पीठ करके इधर

दूर गैराज में खड़ी है

एक सफ़ेद कार

पास खड़े स्कूटर,बाईक को बरगलाती हुयी

और दु:खड़े सुनाती हुयी

पीहर आयी लाडो की-सी

मूंह मचकाती हुयी

एक सफ़ेद कार


(11)

कभी कभार पेड़ों से

लटके परिंडे


हवा से हिल जाते हैं

कुछ चिड़ियाएँ आ जाती

इसी वक़्त

कुछ कबूतर उड़ जाते

बस इतनी सी हलचल हैं

इस आँगन में

(12)

इसी दुपहरी

नीम बर्तन मांझता है

दिन की चाय के

शीशम आँगन बुहारता है

तन्मयता से

यूकेलिप्टस पुताई करता है

इमारतों की


(13)

कुछ फूल

मालाएं बनाकर चलाते हैं

गुज़ारा अपना

इसी दुपहरी

सुस्ताता है

इमारत के खाली हिस्से में

कड़ब-चारे से लदा

एक लापरवाह पिछवाड़ा

(14)

दर्ज़नभर मर्करी बल्ब

ऊंघ रहे हैं

अब भी

रात की ड्यूटी से फारिग होकर

थकहार लेटे हैं मानो

अपने अपने खम्भों पर

अलसाए घंटों की शक्लों में ढले हुए


(15)

और आखिर में

एक पीपल है आँगन में

मुखिया की तरह

ठसक लिए बैठा है कौने में

वहीं से धाक जमाता है

आम, अमलतास और सिताफली पर

यही हैं आँगन आकाशवाणी का


आकाशवाणी चित्तौड़ में नवम्बर,2012 के पहले रविवार ड्यूटी के बाद खाली वक़्त में कुछ बिम्ब रचने की कोशिश की है।)
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