अंजन कुमार

तुम्हारे साथ रहकर


मेरे पाँव इतने गहरे धंसे हैं जमीन में

की छू सकता आकाश

देख सकता हूँ उसके पार भी


कोई भी चिड़िया

अब बना सकती है घोंसला

निडर होकर मेरे कन्धों पर



कोई भी थका हारा

देर तक सुस्ता सकता है मेरी छावं में

बच्चे डाल सकते हैं मुझमे झूला

बूढ़े टिका सकते हैं अपनी पीठ


मै सूखने के बाद भी

हरा रह सकता हूँ

दे सकता हूँ उर्जा

संचित होकर पृथ्वी के गर्भ में



मैंने पाने से अधिक

देना सीख लिया है

मरने से अधिक जिन्दा रहना



हाँ !

मैंने प्रेम करना सीख लिया है

तुम्हारे साथ रहकर ।



000

मैं नहीं जानता था


मैं नहीं जनता था

की इस तरह भी कोई

मेरी देह की परतें उतारकर

झाड़कर मेरी आत्मा में पड़ी गर्द

बना देगा मुझे इतना पारदर्शी

की हवा मेरे भीतर से गुजरकर

गुदगुदाने लगेगी मुझे



पत्तों का हरापन

मेरी आँखों में उतरकर

बदल देगा मुझे

एक हरे भरे दरख़्त में

जिसकी शाखों पर

चाँद का घोंसला होगा

और टहनियों पर

सूरज के फूल खिलेंगे

जिसकी जड़ों से

बहेगी ऐसी नदी

जो मुझे इतनी मिठास

और नमी से भर देगी

की धूप भी जिससे मिलकर

मीठी छावं में बदल जाएगी

जिसकी शाखों में बैठी हर चिड़िया

सुबह का गीत गाएगी ।


रचनाकार ----- अंजन कुमार ।

प्रस्तुति ------- मिता दास ।
 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ