लीलाधर जगूड़ी

आज का दिन


क्या यकीन किया जा सकता है

की आज का दिन एतिहासिक हो सकता है


अगर आज कहीं नहीं हुई कन्या भ्रूण हत्या

अगर किसी डाक्टर ने

कन्या भ्रूण गिराने से इंकार किया है

तो आज का दिन एतिहासिक हो सकता है


आज का दिन इसलिए भी ऐतिहासिक हो सकता है

क्योंकि अकेली औरत ने अनजान शहर में

आफिस जाती किसी अकेली औरत से

ऐसे पुरुष से पता पूछा

जिसे पूछने वाली के सिवा कोई नही जानता


आज का दिन इसलिए भी ऐतिहासिक हो सकता है

क्यूंकि दांत खोल कर हंसती हुई ,

ग्यारह बरस की एक एक लड़की

अकेले साइकल सीखने निकली है


विश्वस्त सूत्रों से मिली एक और खबर से भी

आज के दिन को ऐतिहासिक मन जा सकता है


खबर है की पांच महीने की एक बच्ची ने

आधी पल्टी ली और चोट नहीं खाई

दूसरे दिन उसी बच्ची ने पहली बार में ही पल्टी ले ली

और बताते हैं की बिना दांतों की वह लड़की

रोते - रोते हंस भी दी


साइकल सीखने वाली ग्यारह बरस की वह अकेली लड़की

चोट खाकर भी मुस्कुराती हुई लौटी है

पंक्चर साइकल ठीक करने के बाद

हर जगह से खुद को बेफिक्र झाड़ती हुई

यकीन मानिये आज का दिन सचमुच ऐतिहासिक है ।


फिर से पाषाण काल


याद करता हूँ वे भारी - भरकम पत्थर

जो अपने नीचे प्यारी समतल जगहों को

अकोड़े हुए थे


पहले वे मुझे शक्ति के अवतार लगे

फिर शांति के

फिर लगा की अपने पथराने के विरोध में

उनमे कोई चेतना क्यूँ नहीं है

हो सकता है अपनी मुक्ति के लिए

खुद ही वे एक दिन फट पड़ें ........


जड़ता के अवतार सी

मुझे अशांत करने लगी उनकी शांत अकड़


मैंने उनके जीवन में आग लगा दी

मैंने उन्हें घन से तोड़ना शुरू किया

जब ठन्डे पत्थर गर्म हुए वे टूटने लगे

तब भी उन्होंने कोई प्रतिकार नही किया


अब उन्ही के छोटे - छोटे टुकड़े से

लड़े जा रहे हैं मोहल्ला छाप युद्ध

जिनमे पुलिस से भिडंत भी शामिल है


इस तरह लोग खंडित एकता को उठाये फिर रहे हैं

सामाजिक जड़ता को विखंडित करने के लिए


इतना आगे का भी कितना पीछे मेरे साथ मौजूद था

कभी अकेले कभी सामूहिक बेवकूफी की तरह


क्या इतिहास मेरे बिना बन सकता था ?


प्रस्तुति ---------- मिता दास ।
 


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