मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   

कृत्या कविता की पत्रिका है, जो हिन्दी सहित सभी भारतीय  एवं वैश्विक भाषाओं में लिखी जाने वाली
आधुनिक एव प्राचीन कविता को हिन्दी के माध्यम से प्रस्तुत करती है। यह इन्टरनेट के माध्यम से
साहित्य को जन सामान्य के सम्मुख लाने की नम्र कोशिश है। इसका उद्देश्य हिन्दी भाषा के प्रति सम्मान जगाना भी है 
* All the legal application should be filed in Kerala, India, where the Kritya Trust registered.

 

 

 

 

        

 

अधिकतर हमारे कदम, किसी ना किसी पदचिह्न के मुहताज होते हैं, ये पदचिह्न कभी दृष्टिगोचर होते हैं तो कभी अदृश्य। कभी हम इन्हें खुले मन से स्वीकारते हैं तो कभी पूरी तरह से नकार देते हैं। हमारे नकारने और स्वीकारने से परे हम ये पदचिह्न अवचेतन में पदप्रदर्शन ही करते हैं। लेकिन अपने को नवीन साबित करने का जुनून हमें अपने पदचिह्नों को स्वीकारने नहीं देता है। संभवतया इसी कशमकश से समसामयिक चेतना गुजर रही है। एक और तो भूत को समझे बिना अंधाधुँध अनुकरण की प्रवृत्ति समाज को जंग लगा रही है, दूसरी और बिना पढ़े, बिना समझे नकारना स्थित को नकारना एक फैशन बन रहा है।

जब यह चलन समाज से ऊपर उठ कर कला और साहित्य तक चला आता है तो चिन्ता का विषय हो जाता है। भारतीय साहित्य कला और धर्म ये तीनों ही तर्क को स्वीकारते रहे, और तर्क को विरोध नहीं अपितु ज्ञान के एक प्रकरण के रूप में देखा गया है। तर्क की उपस्थिति ज्ञान के लोकतन्त्र का सहज मार्ग है।
समसामयिक साहित्य और कला में यह सहज तार्किक भाव नदारत होता जा रहा है और साहित्य से सम्बन्धित लोग किसी ना किसी मार्ग को पकड़ कर आँख बन्द करके चलने में विश्वास करते दिखाई देते है, यदि तर्क होता भी है तो उसकी आवाज इतनी तीखी होती है कि उसका मूल उद्देश्य ही लुप्त हो जाता है। आज साहित्य और समाज में तर्क एक भोथरा हथियार बन गया है, जिसे इतनी तेजी से चलाने की कोशिश की जाती है कि ना तो उसका असर देखा जा सकता है ना ही प्रयोजन।

तर्क को शांतता से समझते हुए उसके प्रयोजन को समझना ही साहित्य का विज्ञान हो सकता है जो शनैः शनैः हमसे दूर होता जा रहा है।

समकालीनता हमारे भूत से काटने का नाम नहीं है, बल्कि यह भूत से सीखने का काम है, यह दोनों तरह से हो सकता है।

रति सक्सेना
और »

 

 

इमारतों से मेरा वादा था
उन इमारतों से मेरा वादा था,
मुझे बचा लेंगी वो,
या कि उनका मुझसे वादा था,
बारिशों के दिनों का,
उससे भी ज्यादा सर्दियों का,
कांपती हुई हमारी आत्माओंको,
ठिठुरती हुई रूहों को हमारी,
दौड़कर आती, आतुर निगाहों को,
थाम लेंगी इमारतें ये,
यहाँ किताबों की पढाई होती है,
बांचे और बेचे भी जाते हैं,
सपने यहाँ,
पन्ना दर पन्ना,
पंखुरी सिन्हा
*
फाइलों पर तो आफिस का
दबाव था
गिरने कैसे देता
प्रमोशन का सवाल था |
लेकिन सोच न पाया
मेरा टिफिन किस अंदरूनी दबाव से
दबा रहा मेरी बगल में
बाएं पिंजर के पास
मेरे दिल की धड़कनों को महसूसती
सूंघती एक मानव गंध
बिलकुल अपनी सी |
मिता दास
*
जन्मो का ऋण अब तक नहीं हुआ है खत्म ।
दबे हुए सीने के भीतर
खुद की सभी इच्छाएं
हीरे के टुकड़े शरीर से शरीर को काट रही ,
सपनो के मध्य दौड़ रही पानी की छुरियां
प्रत्येक आँखों के भीतर यह -वह कितनी ही न जाने बहाने , कितने सपने
जल रहे है हजारो सपने ।
रवीन्द्र गुहा
*
लौट आता हूँ
तुम्हारी आवाज़ सुन
जो इन दरवाज़ों से-
एक महक बन खींचती है
इस आँगन में
सूखे तुलसी के पेड़ों से
प्रशान्त
*
परिवर्तन और मैं
यहाँ रोज़ कुछ नया बनता है |
धूप में, छांव में, शहर में या गांव में,
रोज़ कुछ नया बनता है |
~
मैं सवेरे निकलता हूँ घर से,
सब कुछ देख कर, याद कर |
ये वो नीम का पेड़ है,
जिसके नीचे खेल कर, आराम कर,
बड़ा हुआ, बचपन गुज़रा |
हाँ, ये वो शर्मा जी का घर है,
जिसका कांच तोड़कर,
मारा था छक्का, गली के खेल में |
शिवम सक्सेन
*
माचिस की तीलियाँ बिन बरसात
गीली पड़ी थीं
माचिस की तीलियाँ भीषण गरमी के बावजूद महरायी हुई थीं

अशोक कुमार
और »

 

समकालीनता बोध और समकालीन कविता


समकालीन कविता अपने पूर्ववर्ती अन्य काव्यान्दोलनो की तरह कोई काव्यान्दोलन नहीं है। वह समसामयिक समाज जीवन से उपजे जीवन या आशाओ का बिम्ब है वह एक अतिरिक्त जीवन यथार्थ और अतिरिक्त जीवन है , जिसमे शाश्वत जीवन मुल्यों की मिठास और यथार्थ की कड़वाहट अर्थात दोनों की समरसता विद्यमान है। इसलिए इसमें काव्य का रसानन्द और जीवन सत्य की विभीषिकाओं ​से संघर्ष की प्रेरणा , दोनों मिलती है ।
समकालीन कविता ने अपने काव्य परम्परागत नैतिक दायित्व और सामाजिक प्रतिबद्धता जैसे शाख्य काव्य - मूल्यों को भी नहीं छोड़ा और न ही सामाजिक आर्थिक विषमता के दंश , असमानता ,
विसंगति और विद्रूपताओं के दर्द से ही मुख मोड़ा है । वरन कहीं - कहीं तो एक प्रकार से सामूहिक प्रतिरोध उत्पन्न करने की भी सजगता प्रदान की है:
मुझे कल्पवृक्ष नहीं चाहिए
नहीं चाहिए कामधेनू
इस पृथ्वी पर
​ जिन्दा रहने के लिये उतना ही अन्न चाहिए
जितना चींटी अपनी चोंच में
लेकर चलती है।
उतनी ही ज़मीन कि पसर सके
लौकी की लहर
उतनी ही कपास कि ढक जाए लान
स्मृतियों से कल्पना - लोक के
दरवाजे पर दस्तक देती
एक सड़क और नैतिक होने तक
शिक्षा ।
किसी कुबेर का खज़ाना मुझे नहीं चाहिए
मुझे नहीं चाहिए मगरमच्छों से भरी
घी और दूध की शातिर नदी ।
- गोविन्द दिवेदी ।

इस रचना में आज के सामाजिक जीवन की आर्थिक विषमताओं के दंश और इन विषमताओं में जीवन जी रहे मनुष्य की एक ओर छटपटाहट है तो दूसरी ओर भारतीय अपरिग्रह जैसे शाश्वत जीवन मूल्यों की गुनगुनाहट भी है। -
समकालीन कविता, कविता के ​परंपरागत काव्य शास्त्रीय दायरों में बंधकर लिखी जाने वाली कविता नहीं है । वह आदमी को आदमी बनाये रखने का संवेदनात्मक सम्वाद है।

लेख ------ डॉ .यतीन्द्र तिवारी ।
प्रस्तुति ---- मिता दास ।

और »  

 

गुलज़ार

(१) " मंज़र : शाम "

​मिट्टी गोबर की भीगी खुशबु में
लीपे आँगन पे पोले पोले से
पाँव रखती हुई गयी है बहू ,
कील से लालटेन उतार के उसने
मैले कपड़े से काँच को पोंछा
कल की कालिख को मल के साफ़ किया
तेल बाक़ी था रात भर के लिए !

बाती थोड़ी - सी और ऊपर की
चूल्हे के एक पतले तिंके से
अध जली बाती को जलाया तो
रोशनी से छलक गया आँगन !

लालटेन फिर से कील पर टाँगी
और पिंजरे में लटके मिट्ठू से
भीगी आँखों को पोंछ कर पूछाः
दिल जले तो , धुँआ ही उठता है
क्यूँ कभी रोशनी नहीं होती ?


(२) " कुछ और मंज़र १ "

कभी - कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पेन्सिल को उँगलियों में
मुड़े - तुड़े कागज़ों को घुटनों पे रख के
लिखता हुआ नज़र आता है कहीं,तो ....
ख्याल होता है, गोर्की है!
पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी है
जो म्युनिस्पैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते है किताबे
डिकेन्स के और हार्डी के
नाविल से गिर पड़े है ....
या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क़ है कोई, चिपक गया है
समय पलटता नहीं वहाँ से
कहानी आगे बढ़ती नहीं है .... और कहानी रुकी हुई है।

ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती है , बेस्वादी !
हथेली पर ले के दिन की फक्की
मैं फाँक लेता हूँ ... और निगलता हूँ रात के ठंडे घूँट पी कर
ये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता !

ये ख़ुशक दिन एक गर्मियों का
जस भरी रात गर्मियों की !


​ रचनाकार :- गुलज़ार
​ प्रस्तुति .... मिता दास ।


और »  

 

मीरा के भजन

प्रभु जी तुम दर्शन बिन मोय घड़ी चैन नहीं आवड़े ..टेक ..
अन्न नहीं भावे नींद न आवे विरह सतावे मोय .
घायल ज्यूं घूमूं खड़ी रे म्हारो दर्द न जाने कोय ..१ ..
दिन तो खाय गमायो री, रैन गमाई सोय .
प्राण गंवाया झूरतां रे, नैन गंवाया दोनु रोय ..२ ..
जो मैं ऐसा जानती रे, प्रीत कियां दुख होय .
नगर ढुंढेरौ पीटती रे, प्रीत न करियो कोय ..३ ..
पन्थ निहारूं डगर भुवारूं, ऊभी मारग जोय .
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, तुम मिलयां सुख होय ..४ ..
****
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा ..
तन मन धन सब भेंट धरूंगी भजन करूंगी तुम्हारा .

म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा ..
तुम गुणवंत सुसाहिब कहिये मोमें औगुण सारा ..
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा ..
मैं निगुणी कछु गुण नहिं जानूं तुम सा बगसणहारा ..
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा ..
मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे तुम बिन नैण दुखारा ..
म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा ..
***
हरि तुम हरो जन की भीर .
द्रोपदी की लाज राखी, चट बढ़ायो चीर ..
भगत कारण रूप नर हरि, धर््यो आप समीर ..
हिरण्याकुस को मारि लीन्हो, धर््यो नाहिन धीर ..
बूड़तो गजराज राख्यो, कियौ बाहर नीर ..
दासी मीरा लाल गिरधर, चरणकंवल सीर ..
****
तुम सुणो जी म्हांरो अरजी .
भवसागर में बही जात हूं काढ़ो तो थांरी मरजी .
इण संसार सगो नहिं कोई सांचा सगा रघुबरजी ..
मात-पिता और कुटम कबीलो सब मतलब के गरजी .
मीरा की प्रभु अरजी सुण लो चरण लगावो थांरी मरजी .
****
कोई कहियौ रे प्रभु आवनकी,
आवनकी मनभावन की .
आप न आवै लिख नहिं भेजै ,
बाण पड़ी ललचावनकी .
ए दोउ नैण कह्यो नहिं मानै,
नदियां बहै जैसे सावन की .
कहा करूं कछु नहिं बस मेरो,
पांख नहीं उड़ जावनकी मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे,
चेरी भै हूं तेरे दांवनकी .****
 और »

VOL - VIII/ ISSUE-VIX
(जून2013
)

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए